इतिहास

 















महाराज पृथ्वीराज सिंह कछवाह (1502-1527)


कछवाहा राजवंश


         क्षत्रिय कछवाह राजपूतों को 53 तड़, 12 कोटड़ी और 65 खापो में विभाजित किया है।

राजस्थान (राजपूताना) में 53 तड़ कछवाहा राजपूतों की निम्न है

⚔️ कछवाहा राजपूतों की 12 कोटड़ी (वंश शाखाएँ) – राजस्थान

राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी (राज्यकाल: 1502–1527) ने अपने राज्य को अपने बारह पुत्रों के मध्य समान रूप से विभाजित किया। इन 12 वंशों को आज भी “बारह कोटड़ियाँ” के रूप में राजपूताना में सम्मानपूर्वक जाना जाता है।

🔸 12 कोटड़ी – राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी के पुत्रों से उत्पन्न

  1. पिचानोत कछवाहा
    ➤ पुत्र: पाचयण सिंह कछवाहा
    ➤ माता: बीकानेर राठौड़ राजा राव लूनकरण सिंह जी की पुत्री अपूर्वा कँवर (बाला बाई)
    ➤ वंश: पिचानोत

  2. जगमालोत / खगालोत कछवाहा
    ➤ पुत्र: जगमाल सिंह कछवाहा
    ➤ माता: अपूर्वा कँवर (बाला बाई)
    ➤ वंश: जगमालोत / खगालोत

  3. सांगानेर कछवाहा
    ➤ पुत्र: सांगा सिंह कछवाहा
    ➤ माता: अपूर्वा कँवर (बाला बाई)
    ➤ उपलब्धि: सांगानेर नगर की स्थापना

  4. बालभदरोत कछवाहा
    ➤ पुत्र: बलभद्र सिंह कछवाहा
    ➤ माता: अपूर्वा कँवर (बाला बाई)
    ➤ वंश: बालभदरोत

  5. साईंदासोत कछवाहा
    ➤ पुत्र: साईंदास सिंह कछवाहा
    ➤ वंश: साईंदासोत

  6. चतुर्भुजोत कछवाहा
    ➤ पुत्र: चतुर्भुज सिंह कछवाहा
    ➤ माता: अपूर्वा कँवर (बाला बाई)
    ➤ वंश: चतुर्भुजोत

  7. नाथावत कछवाहा
    ➤ पुत्र: गोपाल सिंह कछवाहा
    ➤ माता: अपूर्वा कँवर (बाला बाई)
    ➤ वंश: नाथावत

  8. पूरणमलोत कछवाहा
    ➤ पुत्र: राजा पूरणमल सिंह कछवाहा
    ➤ वंश: पूरणमलोत
    ➤ विशेष: आमेर के राजा (1527–1534)

  9. सुलतानोत कछवाहा
    ➤ पुत्र: सुरतान सिंह कछवाहा
    ➤ माता: अपूर्वा कँवर (बाला बाई)
    ➤ वंश: सुलतानोत (या सुलतानोता)

  10. रामसिंघोत कछवाहा
    ➤ पुत्र: राम सिंह कछवाहा
    ➤ वंश: रामसिंघोत

  11. प्रतापपोता कछवाहा
    ➤ पुत्र: प्रताप सिंह कछवाहा
    ➤ वंश: प्रतापपोता

  12. कल्याणोत कछवाहा
    ➤ पुत्र: कल्याण सिंह कछवाहा
    ➤ वंश: कल्याणोत


🏰 आमेर के उत्तरवर्ती शासक – राजा पृथ्वीराज जी के उत्तराधिकारी

  • 👑 राजा पूरणमल सिंह कछवाहा
    ➤ राज्यकाल: 1527–1534
    ➤ राजा पृथ्वीराज जी के पुत्र

  • 👑 राजा भीम सिंह कछवाहा
    ➤ राज्यकाल: 1534–1537
    ➤ पुत्र: राजा रतन सिंह कछवाहा
    ➤ राजा रतन सिंह का राज्यकाल: 1537–1548

  • 👑 राजा भारमल सिंह कछवाहा
    ➤ राज्यकाल: 1548–1574

आमेर राजा भारमल कछवाहा जी (1548-1574) बारह कोटड़ी को इस प्रकार से विभाजित कर दिया। 

🔷 चार कोटड़ियाँ – राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी से पूर्व की (पूर्वजों से)

  1. कुंभाणी
    जोनसी कछवाहा जी के तीसरे पुत्र कुंभा कछवाहा जी द्वारा स्थापित।
    ➤ प्रमुख स्थान: बांसखो

  2. स्योबहमापोता (शिवब्रह्मपोता)
    राजा उदयकर्ण कछवाहा जी के पाँचवे पुत्र शिवबहमा कछवाहा जी द्वारा स्थापित।
    ➤ प्रमुख स्थान: निदड़

  3. बणवीरपोता
    बणवीर कछवाहा जी के पाँचवे पुत्र बरोजी द्वारा स्थापित।
    ➤ प्रमुख स्थान: वाटका

  4. (चंद्रसेन कछवाहा जी की कोटड़ी)
    राजा चंद्रसेन कछवाहा जी के तीसरे पुत्र कुमाजी द्वारा स्थापित।


🔷 आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी की 8 पुत्र-वंशज कोटड़ियाँ

  1. पिचानोत
    ➤ पुत्र: पाचयण सिंह कछवाहा जी
    ➤ माता: बीकानेर राठौड़ राव लूनकरण सिंह जी की बेटी अपूर्वा कँवर (बाला बाई)
    ➤ वंश: पिचानोत कछवाहा

  2. नाथावत
    ➤ पुत्र: गोपाल सिंह कछवाहा जी
    ➤ माता: अपूर्वा कँवर
    ➤ वंश: नाथावत कछवाहा

  3. सुलतानोत
    ➤ पुत्र: सुरतान सिंह कछवाहा जी
    ➤ माता: अपूर्वा कँवर
    ➤ वंश: सुलतानोत (सुलतानोता) कछवाहा

  4. जगमालोत / खगालोत
    ➤ पुत्र: जगमाल सिंह कछवाहा जी
    ➤ माता: अपूर्वा कँवर
    ➤ वंश: जगमालोत – खगालोत कछवाहा

  5. बलभदरोत
    ➤ पुत्र: बलभद्र सिंह कछवाहा जी
    ➤ माता: अपूर्वा कँवर
    ➤ वंश: बलभदरोत कछवाहा

  6. चतुर्भुजोत
    ➤ पुत्र: चतुर्भुज सिंह कछवाहा जी
    ➤ माता: अपूर्वा कँवर
    ➤ वंश: चतुर्भुजोत कछवाहा

  7. कल्याणोत
    ➤ पुत्र: कल्याण सिंह कछवाहा जी
    ➤ वंश: कल्याणोत कछवाहा

  8. प्रतापपोता
    ➤ पुत्र: प्रताप सिंह कछवाहा जी
    ➤ वंश: प्रतापपोता कछवाहा


🏰 राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी के उत्तराधिकारी

  • राजा पूरणमल सिंह कछवाहा (1527–1534) – पुत्र

  • राजा भीम सिंह कछवाहा (1534–1537) – पुत्र

  • राजा रतन सिंह कछवाहा (1537–1548) – राजा भीम सिंह के पुत्र

  • राजा भारमल सिंह कछवाहा (1548–1574) – पुत्र

⚔️ राजस्थान के 65 खाप कछवाहा राजपूत

  1. देलणोत

  2. झामावत

  3. घेलणोत

  4. राल्णोत

  5. जीवळपोता

  6. आलणोत (जोगी कछवाहा)

  7. प्रधान कछवाहा

  8. सावंतपोता

  9. खीवाँवात

  10. बिकसीपोता

  11. पीलावत

  12. भोजराजपोता (राधर का, बीका पोता, गढ़ के कछवाहा, सावतसीपोता)

  13. सोमेश्वरपोता

  14. खींवराजपोता

  15. दशरथपोता

  16. बधवाड़ा

  17. जसरापोता

  18. हम्मीरदेका

  19. भाखरोत

  20. सरवनपोता

  21. नपावत

  22. तुग्या कछवाहा

  23. सुजावत कछवाहा

  24. मेहपाणी

  25. उग्रावत

  26. सीधादे कछवाहा

  27. कुंभाणी

  28. बनवीरपोता

  29. हरजी का कछवाहा

  30. वीरमपोता

  31. मेंगलपोता

  32. कुंभावत

  33. भीमपोता / नरवर के कछवाहा

  34. पिचानोत (पिचयानोत)

  35. खंगारोत

  36. सुल्तानोत

  37. चतुर्भुज

  38. बलभद्रपोत

  39. प्रतापपोता

  40. नाथावत

  41. देवकरणोत

  42. कल्याणोत

  43. रामसिंहहोत

  44. साईंदासोत

  45. रूपसिंहसोत

  46. पूर्णमलोत

  47. बाकावत

  48. राजावत

  49. जगन्नाथोत

  50. सल्देहीपोता

  51. सादुलपोता

  52. सुंदरदासोत

  53. नरुका

  54. मेलका

  55. बालापोता

  56. शेखावत

  57. करणावत

  58. मोकावत

  59. भिलावत

  60. जितावत

  61. बिंझाणी (बिंझावत)

  62. सांगाणी (सांगावत)

  63. शिवब्रह्मपोता

  64. पीथलपोता

  65. पातलपोता

इतिहास का विस्तार से अध्ययन:

साहित्य में इतिहास का योगदान

संसार के साहित्य में इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है। इसके माध्यम से हमें अपने पूर्वजों की जीवनशैली, संस्कृति, और परंपराओं की सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। इतिहास न केवल अतीत को समझने का माध्यम है, बल्कि यह वर्तमान को दिशा देने और भविष्य को मार्गदर्शन प्रदान करने का सशक्त स्रोत भी है।

रामजन्मभूमि विवाद की सुनवाई के दौरान एक ऐतिहासिक तथ्य ने विशेष ध्यान आकर्षित किया। सुप्रीम कोर्ट ने प्रारंभिक सुनवाई में पूछा था कि क्या आज भी अयोध्या में भगवान श्रीराम के वंशज जीवित हैं? इस पर राजस्थान की उपमुख्यमंत्री और आमेर-जयपुर राजवंश की राजकुमारी दीया कुमारी सिंह ने दावा किया कि उनका परिवार भगवान श्रीराम के पुत्र कुश के वंशज हैं। उन्होंने इसके समर्थन में एक ऐतिहासिक वंशावली प्रस्तुत की, जिसमें अयोध्या के राजा श्रीराम के वंशजों के नाम क्रमवार दर्ज हैं।

कछवाहा (या कुशवाहा) वंश की इस वंशावली के अनुसार, राजा दशरथ 62वें, श्रीराम 63वें, और कुश 64वें वंशज थे। इसी क्रम में 209वें वंशज के रूप में आमेर और जयपुर के राजा सवाई जयसिंह, ईश्वरी सिंह, माधव सिंह, और पृथ्वी सिंह के नाम आते हैं। मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब की मृत्यु के पश्चात, सवाई जयसिंह द्वितीय ने हिन्दू धार्मिक स्थलों में व्यापक भूमि संपत्ति अर्जित की थी, जो उनके धार्मिक एवं सांस्कृतिक संरक्षण के दृष्टिकोण को दर्शाता है।

यह प्रकरण दर्शाता है कि इतिहास केवल घटनाओं की श्रृंखला नहीं है, बल्कि यह वर्तमान समाज की जड़ों से जुड़ा हुआ एक जीवंत दस्तावेज़ है, जो हमारी पहचान, परंपरा, और संस्कृति को जीवित रखने में सहायक है




श्रीराम वंशज, अयोध्या, और सूर्य वंशीय क्षत्रिय राजपूतों का इतिहास

साहित्य और इतिहास एक-दूसरे के पूरक हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से यदि हम भारत की सांस्कृतिक विरासत पर दृष्टिपात करें, तो रामायण और श्रीराम का व्यक्तित्व न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और वंश परंपरा का एक मजबूत आधार भी है।

1717 से 1725 के बीच, आमेर-जयपुर के तत्कालीन शासक सवाई जयसिंह द्वितीय ने अयोध्या में राम जन्म स्थान मंदिर का निर्माण करवाया था। इस तथ्य की पुष्टि प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. आर. नाथ की पुस्तक "The Jayasinghpura of Sawai Raja Jaysingh at Ayodhya" में भी होती है। इस ग्रंथ के Annexure-2 में यह स्पष्ट रूप से उल्लिखित है कि अयोध्या के राम जन्म स्थान पर कछवाहा (कुश वंशी) वंश का आधिपत्य था।

जयपुर राजवंश के इस दावे के बाद, देशभर के अनेक सूर्यवंशी क्षत्रिय राजपूत वंशों ने भी अपने वंश का ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत किया। इससे यह तथ्य और अधिक पुष्ट हो गया कि श्रीराम के वंशज आज भी उपस्थित हैं, और वे क्षत्रिय राजपूत के रूप में जाने जाते हैं। इन वंशजों में आज भी परंपरागत रूप से अन्य राजपूतों को "जय श्री रघुनाथ जी" कहकर संबोधित किया जाता है — यह उनके वंश गौरव और श्रीराम से जुड़ी विरासत का प्रतीक है।

श्रीराम के पुत्रों का राज्य विभाजन

ऐतिहासिक और पौराणिक साक्ष्यों के अनुसार, जब भगवान श्रीराम ने वानप्रस्थ लेने का निर्णय किया, तब उन्होंने अपने पुत्रों लव और कुश को क्रमशः उत्तर कोशल (वर्तमान पाकिस्तान का क्षेत्र, विशेषतः लाहौर) और दक्षिण कोशल (वर्तमान छत्तीसगढ़) का शासक नियुक्त किया।

कालिदास के ‘रघुवंश’ महाकाव्य के अनुसार:

  • लव को शरावती क्षेत्र (जो आगे चलकर लवपुरी या लाहौर कहलाया) सौंपा गया।

  • कुश को कुशावती (वर्तमान बिलासपुर, छत्तीसगढ़) और अयोध्या का उत्तराधिकारी बनाया गया।

कहा जाता है कि कुश की राजधानी कुशावती विंध्याचल पर्वत के दक्षिण में स्थित थी। इसके भौगोलिक प्रमाण छत्तीसगढ़ में आज भी मिलते हैं। अयोध्या की सीमाओं का विस्तार करते हुए कुश ने दक्षिण कोशल तक राज्य फैलाया, जो उनकी प्रशासनिक दूरदर्शिता को दर्शाता है।

लव और कुश के वंशज और राजपूतों की उत्पत्ति

समय के साथ-साथ लव और कुश के वंशजों ने अपने-अपने क्षेत्रों में राज्य का संचालन किया और सनातन धर्म की रक्षा की। ये वंशज भारत के विभिन्न हिस्सों में बिखर गए और राजपूत वंशों के रूप में विकसित हुए। यही कारण है कि आज भी अनेक राजपूत वंश स्वयं को सूर्यवंशी मानते हैं और श्रीराम को अपने कुलदेवता के रूप में पूजते हैं।

राजपूत शब्द की उत्पत्ति "राजपुत्र" (अर्थात राजा का पुत्र) से हुई है, जो वैदिक ग्रंथों में भी संदर्भित मिलता है। यह न केवल एक जातिगत पहचान है, बल्कि एक सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था है जो वीरता, स्वाभिमान और धर्म-रक्षा के मूल्यों पर आधारित रही है। पितृसत्तात्मक गोत्र व्यवस्था पर आधारित राजपूत समाज विभिन्न क्षेत्रीय वंशों से मिलकर बना है, जिनका मुख्य लक्ष्य अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा करना रहा है।

इतिहासकार यह भी मानते हैं कि दक्षिण-पूर्व एशिया के कई स्थानों जैसे लाओस और थाईलैंड के लोबपुरी नगर का नामकरण भी लव और कुश के वंशीय प्रभाव से जुड़ा हुआ है। इससे स्पष्ट होता है कि रामायण की सांस्कृतिक छाया केवल भारत तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसका प्रभाव अंतरराष्ट्रीय स्तर तक फैला।

 

क्षत्रिय राजपूत समाज

इस संस्कृत शब्द में 'क्षत्रिय', वैदिक काल के समाज के सन्दर्भ में वर्णित है। जब पूरा समाज क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य व शूद्र नामक चार वर्गों में विभक्त था। 

प्राचीन भारतीय समाज चार वर्णों में विभाजित था, जिन्हें क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कहा जाता था।

  • ब्राह्मण : ज्ञान, शिक्षा, वेद-पुराणों के अध्ययन-अध्यापन और पूजा-पाठ का कार्य करते थे।

  • क्षत्रिय : राज्य संचालन, युद्ध और रक्षा का दायित्व इनके पास होता था।

  • वैश्य : व्यापार, कृषि, गौ-पालन और अर्थव्यवस्था से संबंधित कार्यों में संलग्न रहते थे।

  • शूद्र : सेवा कार्य एवं समाज की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति में योगदान देते थे।

यह वर्ण-व्यवस्था 'गुण' और 'कर्म' के आधार पर निर्धारित मानी गई थी, जैसा कि श्रीमद्भगवद्गीता में उल्लेख है 

"चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः"
(अर्थ: मैंने चार वर्णों की रचना गुण और कर्म के आधार पर की है।)

क्षत्रिय समाज पारम्परिक रूप से शासक व सैनिक क्षत्रिय वर्ग का हिस्सा होते थे, जिनका कार्य युद्ध काल में समाज की रक्षा हेतु युद्ध करना व शांति काल में सुशासन प्रदान करना था। क्षत्रिय शब्द का उद्गम "क्षत्र" से है। जिसका अर्थ लौकिक प्राधिकरण और शक्ति है, इसका संबंध युद्ध में सफल नेता से कम तथा एक क्षेत्र पर संप्रभुता का दावा करने की मूर्त शक्ति पर अधिक है। वर्तमान ब्राह्मणवादी परंपरा का क्रम - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र, धर्मशास्त्र काल के बाद स्थिर हो गया। बौद्ध काल में प्रायः क्षत्रिय उत्कृष्ट वर्ग माना गया।

आज भी राम के बेटे कुश के वंशज कछवाहा राजपूत अपने सम्बोधन मैं ‘‘जय श्री रघुनाथ जी’’ की अर्ज करते हैं। इस तरह से जब दो कछवाहा राजपूत मिलते हैं, तो एक-दूसरे का अभिवादन ‘‘ जय श्री रघुनाथ जी कहकर अर्ज करते है। सूर्यवंश में एक महान् प्रतापी चक्रवर्ती सम्राट महाराज रघु हुए थे । महाराज रघु भगवान विष्णु के परम भक्त थे। महाराज रघु के नाम पर इनके कुल का नाम रघुकुल भी पड़ा। इस कुल में स्वयं रामचन्द्र जी का जन्म हुआ। महाराज रघु द्वारा भगवान विष्णु की घोर अराधना के आधार पर भगवान श्री हरी विष्णु का एक नाम रघु के नाथ (रघुनाथ) भी पड़ा । जब हम रघुनाथ का नाम संबोधन में प्रयुक्त करते हैं तो हम उसी प्राण पुरूषोतम ब्रह्म परमात्मा सृष्टि के पालनकर्ता श्री विष्णु की जय घोषण करते है।

ढूंढाड़ के लोग आज भी जय रघुनाथजी सा...के साथ करते हैं अभिवादन

मर्यादा पुरुषोत्तम राम की गद्दी का खुद को सेवक मानने वाले ढूंढाड़ के कछवाहा और अन्य लोग जय रघुनाथजी के संबोधन से अभिवादन करते है। राम के जयेष्ठ पुत्र कुश की वंश परंपरा के कारण ढूंढाड़ के राजा कछवाहा कहलाए। पृथ्वीराज रासो में राजपूतों के छत्तीस कुलों में कछवाहों की गणना छत्तीस राजकुलों में एक प्रमुख राजवंश के रूप में की है। अयोध्या पर शासन करने के बाद राम के पुत्र कुश के वंशजों का ग्वालियर और बाद में राजा नल के बसाए नरवर पर राज रहा। नरवर के दूल्हे राय ने ढूंढाड़ में शासन की नींव डाली। दूल्हेराय ने माच पर कब्जा करने के बाद कुलदेवी जमवाय माता और पूर्वज अयोध्यापति राम के नाम पर जमवारामगढ़ बसाया। रियासत के आदेश में सीतारामों जयति लिखा जाता रहा। अष्ट सिद्धि और नव निधि के आधार पर बसाए जयपुर में बड़ी चौपड़ के नीचे के राम के नाम पर एक हिस्से का नाम चौकड़ी चौकड़ी रामचंद्र जी रखा। जयपुर की स्थापना के बाद छोटी चौपड़ पर सीतारामजी मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा हुई जिसमें सवाई जयसिंह खुद बैठे सिटी पैलेस में सीतारामजी का मंदिर बनाया जिसे सीताराम द्वारा कहते हैं। सूर्यवंशी होने के कारण सूर्य भगवान के साथ घोड़े की तर्ज पर सूरजपोल और रामपोल सहित सात दरवाजे और सूर्य मंदिर बनवाया। शास्त्रों के हिसाब से होली दिवाली दशहरा आदि के त्यौहार भी अयोध्या के धार्मिक रिवाज के मुताबिक मनाने की परंपरा रही। दिवाली पर घास की रोटी का पूजन और दशहरे पर हाथी, घोड़ों व शस्त्रों व शास्त्रों का पूजन होने लगा। अयोध्या की तर्ज पर नीलकंठ पक्षी को आजाद किया जाता है। सवाई जयसिंह के निर्देश पर राजकवि श्री कृष्ण भट्ट से कृष्ण की तरह भगवान राम की रासलीला के ऐतिहासिक काव्य की रचना करवाई । युद्ध में सबसे आगे सीताराम जी का झण्डा चलता था।

क्षत्रिय राजपूतोँ के वँश

"दस रवि से दस चन्द्र से बारह ऋषिज प्रमाण, चार हुतासन सों भये कुल छत्तिस वंश प्रमाण, भौमवंश से धाकरे टांक नाग उनमान, चौहानी चौबीस बंटि कुल बासठ वंश प्रमाण."

अर्थ:- दस सूर्य वंशीय क्षत्रिय, दस चन्द्र वंशीय, बारह ऋषि वंशी एवं चार अग्नि वंशीय कुल छत्तिस क्षत्रिय वंशों का प्रमाण है।, बाद में भौमवंश नागवंश क्षत्रियों को सामने करने के बाद जब चौहान वंश चौबीस अलग अलग वंशों में जाने लगा तब क्षत्रियों के बासठ अंशों का प्रमाण मिलता है।

सूर्य वंश की दस शाखायें:-

१.कछवाह  २.राठौड ३.बडगूजर ४.सिकरवार ५.सिसोदिया ६.गहलोत ७.गौर ८.गहलबार ९.रेकबार १०.जुनने

चन्द्र वंश की दस शाखायें:-

१.जादौन, २.भाटी, ३.तोमर, ४.चन्देल, ५.छोंकर, ६.होंड, ७.पुण्डीर, ८.कटैरिया, ९.स्वांगवंश, १०.वैस

अग्निवंश की चार शाखायें:-

१.चौहान, २.सोलंकी, ३.परिहार, ४.पमार

ऋषिवंश की बारह शाखायें:-

१.सेंगर, २.दीक्षित, ३.दायमा, ४.गौतम, ५.अनवार, ६.विसेन, ७.करछुल, ८.हय, ९.अबकू तबकू १०.कठोक्स, ११.द्लेला, १२.बुन्देला चौहान वंश की चौबीस शाखायें:- 

(१.हाडा २.खींची ३.सोनीगारा ४.पाविया ५.पुरबिया ६.संचौरा ७.मेलवाल ८.भदौरिया ९.निर्वाण १०.मलानी ११.धुरा १२.मडरेवा १३.सनीखेची १४.वारेछा १५.पसेरिया १६.बालेछा १७.रूसिया १८.चांदा १९.निकूम २०.भावर २१.छछेरिया २२.उजवानिया २३.देवडा २४.बनकर)

क्षत्रिय राजपूतो का धर्म "सर्व जन हिताय, सर्व जन सुखाय" था और आज भी क्षत्रिय राजपूत इसी धर्म का पालन करता हैं। क्षत्रिय राजपूतो ने अपना बलिदान दिया है और उस समय अपनी प्रजा (जनता) के लिए मर मिटे तो आज अनेको क्षत्रिय राजपूत योद्धा भारत देश के लिए मर मिटने को सदेव तैयार रहते हैं । राजपूत भारत का एक क्षत्रिय कुल माना जाता है जो कि 'राजपुत्र' का अपभ्रंश है। राजस्थान को ब्रिटिशकाल में 'राजपूताना' भी कहा गया है। राजपूत को तीन शब्दों में प्रयोग किया जाता है, पहला "क्षत्रिय", दूसरा "राजपूत" और तीसरा "ठाकुर"। राजपूत भारतीय उपमहाद्वीप (भारत, पाकिस्तान, बाँग्लादेश और नेपाल) की बहुत ही प्रभावशाली जाति है। पुराने समय में आर्य जाति में केवल चार वर्णों की व्यवस्था थी। राजपूत काल में प्राचीन वर्ण व्यवस्था समाप्त हो गयी थी तथा वर्ण के स्थान पर कई जातियाँ व उप जातियाँ बन गईं थीं। कवि चंदबरदाई के कथनानुसार राजपूतों की 36 जातियाँ थी।

क्षत्रियों के प्रसिद्ध ३६ राजवंशों में कछवाहा वंश के कश्मीर, राजपूताने (राजस्थान) में जयपुर, अलवर, मध्यप्रदेश में ग्वालियर, मईहर, अमेठी, दार्कोटी आदि राज्य थे। इनके अलावा राज्य, उडीसा मे मोरमंज, ढेकनाल, नीलगिरी, बऊद और महिया राज्य कछवाहो के थे। कई राज्य और एक गांव से लेकर पाँच-पाँच सौ ग्राम समुह तक के ठिकानें, जागीरे और जमींदारीयां थी क्षत्रिय राजपूताने में कछवाहो की १२ कोटडीया और ५३ तडे, ६५ खाप प्रसिद्ध थीं।

सनातन धर्म

वैदिक काल में भारतीय उपमहाद्वीप के धर्म के लिए 'सनातन धर्म' नाम मिलता है। 'सनातन' का अर्थ है - शाश्वत या 'सदा बना रहने वाला', अर्थात् जिसका न आदि है न अन्त। सनातन धर्म जिसे वैदिक धर्म भी कहा जाता है।

“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।”

कृष्ण ने महाभारत के इस श्लोक में कहा है, “जब-जब इस पृथ्वी पर धर्म की हानि होती है, विनाश का कार्य होता है और अधर्म आगे बढ़ता है, तब-तब मैं इस पृथ्वी पर आता हूं और इस पृथ्वी पर अवतार लेता हूं।” इसका अर्थ तो यही है कि धर्म का नाश होने पर भगवान स्वयं ही पृथ्वी पर आते हैं। 

धृतराष्ट्र उवाच (पहला अध्याय, श्लोक 1)

 धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।

मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय

धृतराष्ट्र बोले , हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से इकट्ठे हुए मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने भी क्या किया? महाभारत के इस श्लोक में पहले ही धृतराष्ट्र ने युद्धभूमि को धर्म भूमि बताया है। यानी धृतराष्ट्र मानते हैं कि महाभारत का युद्ध धर्म और अधर्म का युद्ध का जिसका फैसला कर्मभूमि में होना था। यही कारण है कि युद्धभूमि को धर्म भूमि कहा गया है।

सुप्रीम कोर्ट में लिखे हुए संस्कृत श्लोक को देखा है, तो वहां लिखा है ‘यतो धर्म: ततो जय: (जहां धर्म है वहां जीत है)’। यह श्लोक महाभारत में कुछ 11 बार आता है और अपने धर्म का पालन करने को कहता है।

महाभारत के कई श्लोकों में देखा है कि श्री कृष्ण स्वयं ही कहते हैं कि कर्म ही धर्म है-

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।2.47।।

महाभारत के दूसरे अध्याय के 47वें श्लोक में लिखा है कि कृष्ण अर्जुन को सिर्फ कर्म करने को कहते हैं क्योंकि फल देने वाले ईश्वर खुद हैं। ऐसे में अगर हम पुराणों के बारे में देखें, तो यही पाएंगे कि कर्म को ही वहां धर्म बताया गया है।

सनातन' का अर्थ है - शाश्वत या 'सदा बना रहने वाला', अर्थात् जिसका न आदि है न अन्त। सनातन धर्म एक संस्कृत शब्द है जिसे अब हिंदी के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। धर्म की बात करें, तो यह शब्द संस्कृत की 'धृ' धातु से बना है। इसका मतलब है धारण करना या पालन करना। अब इस शाब्दिक अर्थ को देखा जाए, तो सामने आएगा कि 'धारण करने योग्य आचरण ही धर्म है।' अगर सनातन और धर्म दोनों शब्दों को जोड़ा जाए, तो अर्थ निकलेगा, सदा बना रहने वाला आचरण ही धर्म है।

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।

धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत।।1.40।।

गीता के पहले अध्याय के 40वें श्लोक में अर्जुन ने सनातन शब्द का प्रयोग किया है। अर्जुन ने कहा है कि जब कुल में दोष लगता है, तो कुल के धर्म का भी नाश हो जाता है। गीता में कई बार सनातन शब्द सामने आया है जहां उसका अर्थ सदा चलने वाला ही बताया है। कृष्णा ने भी गीता में ही कहा है कि आत्मा सनातन है। धर्म ही कर्म है।


हिन्दू धर्म

भारतवर्ष को प्राचीन ऋषियों ने "हिन्दुस्थान" नाम दिया था, जिसका अपभ्रंश "हिन्दुस्तान" है। "बृहस्पति आगम" के अनुसार:

हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्।

तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते॥

अर्थात् हिमालय से प्रारम्भ होकर इन्दु सरोवर (हिन्द महासागर) तक यह देव निर्मित देश हिन्दुस्थान कहलाता है।

"हिन्दू" शब्द "सिन्धु" से बना माना जाता है। संस्कृत में सिन्धु शब्द के दो मुख्य अर्थ हैं - पहला, सिन्धु नदी जो मानसरोवर के पास से निकल कर लद्दाख़ और पाकिस्तान से बहती हुई समुद्र में मिलती है, दूसरा - कोई समुद्र या जलराशि। ऋग्वेद की नदीस्तुति के अनुसार वे सात नदियाँ थीं : सिन्धु, सरस्वती, वितस्ता (झेलम), शुतुद्रि (सतलुज), विपाशा (व्यास), परुषिणी (रावी) और अस्किनी (चेनाब)। एक अन्य विचार के अनुसार हिमालय के प्रथम अक्षर "हि" एवं इन्दु का अन्तिम अक्षर "न्दु", इन दोनों अक्षरों को मिलाकर शब्द बना "हिन्दु" और यह भू-भाग हिन्दुस्थान कहलाया। हिन्दू शब्द उस समय धर्म के बजाय राष्ट्रीयता के रूप में प्रयुक्त होता था। चूँकि उस समय भारत में केवल सनातन धर्म को ही मानने वाले लोग थे, बल्कि तब तक अन्य किसी धर्म का उदय नहीं हुआ था इसलिए "हिन्दू" शब्द सभी भारतीयों के लिए प्रयुक्त होता था। भारत में केवल वैदिक धर्मावलम्बियों (हिन्दुओं) के बसने के कारण कालान्तर में विदेशियों ने इस शब्द को धर्म के सन्दर्भ में प्रयोग करना शुरु कर दिया।

आम तौर पर हिन्दू शब्द को अनेक विश्लेषकों ने विदेशियों द्वारा दिया गया शब्द माना है। इस धारणा के अनुसार हिन्दू एक फ़ारसी शब्द है। हिन्दू धर्म को सनातन धर्म या वैदिक सनातन वर्णाश्रम धर्म भी कहा जाता है। ऋग्वेद में सप्त सिन्धु का उल्लेख मिलता है - वो भूमि जहाँ आर्य सबसे पहले बसे थे। भाषाविदों के अनुसार हिन्द आर्य भाषाओं की "स्" ध्वनि (संस्कृत का व्यंजन "स्") ईरानी भाषाओं की "ह्" ध्वनि में बदल जाती है। इसलिए सप्त सिन्धु अवेस्तन भाषा (पारसियों की धर्मभाषा) में जाकर हफ्त हिन्दु में परिवर्तित हो गया (अवेस्ता: वेन्दीदाद, फ़र्गर्द 1.18)। इसके बाद ईरानियों ने सिन्धु नदी के पूर्व में रहने वालों को हिन्दु नाम दिया। जब अरब से मुस्लिम हमलावर भारत में आए, तो उन्होंने भारत के मूल धर्मावलम्बियों को हिन्दू कहना शुरू कर दिया। चारों वेदों में, पुराणों में, महाभारत में, स्मृतियों में इस धर्म को हिन्दु धर्म नहीं कहा है, सनातन धर्म कहा है।

हिन्दू-कौन? -- गोषु भक्तिर्भवेद्यस्य प्रणवे च दृढ़ा मतिः। पुनर्जन्मनि विश्वासः स वै हिन्दुरिति स्मृतः।। अर्थात-- गोमाता में जिसकी भक्ति हो, प्रणव जिसका पूज्य मन्त्र हो, पुनर्जन्म में जिसका विश्वास हो--वही हिन्दू है। मेरुतन्त्र ३३ प्रकरण के अनुसार ' हीनं दूषयति स हिन्दु ' अर्थात जो हीन (हीनता या नीचता) को दूषित समझता है (उसका त्याग करता है) वह हिन्दु है। लोकमान्य तिलक के अनुसार- असिन्धोः सिन्धुपर्यन्ता यस्य भारतभूमिका। पितृभूः पुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरिति स्मृतः।। अर्थात्- सिन्धु नदी के उद्गम-स्थान से लेकर सिन्धु (हिन्द महासागर) तक सम्पूर्ण भारत भूमि जिसकी पितृभू (अथवा मातृ भूमि) तथा पुण्यभू (पवित्र भूमि) है, (और उसका धर्म हिन्दुत्व है) वह हिन्दु कहलाता हैं। 

इतिहास सार

क्षत्रिय कछवाहा (कुशवाहा) राम वंशज राजपूत प्राचीन वर्णन

परमेश्वर (पीढ़ी १) वह सर्वोच्च परालौकिक शक्ति है जिसे इस संसार का स्रष्टा और शासक माना जाता है। हिन्दी में परमेश्वर को भगवान, परमात्मा या परमेश्वर भी कहते हैं। अधिकतर धर्मों में परमेश्वर की परिकल्पना ब्रह्माण्ड की संरचना से जुडी हुई है। परमेश्वर के तीन (त्रिमूर्ति) मुख्य रूप हैं।

01 – ब्रह्मा, 02 – विष्णु, 03 – शिव

ब्रह्मा जी (पीढ़ी २) ने अपने मानसिक संकल्प से दस प्रजापतियों को उत्पन्न करके उनके द्वारा सम्पूर्ण प्रजा और सृष्टि की रचना है। इसलिये ब्रह्मा जी प्रजापतियों के भी पति कहे जाते हैं। ब्रह्मा जी द्वारा उत्पन्न 17 मानस पुत्रों में से ये दस मुख्य प्रजापति कहे जाते हैं उनका विवरण इस प्रकार हैं:- 01 – मरीचि (पीढ़ी 3) - मन से मारिचि, 02 – अत्रि - नेत्र से अत्रि, 03 – अंगिरा - मुख से अंगिरस, 04 - पुलस्त्य - कान से पुलस्त्य, 05 - पुलह - नाभि से पुलह, 06 – क्रतु (यज्ञ) - हाथ से कृतु, 07 – भृगु - त्वचा से भृगु, 08 – वसिष्ठ, 09 - दक्ष - अंगुष्ठ से दक्ष, 10 – कर्दम - छाया से कंदर्भ, ब्रह्मा के शेष मानस पुत्र :- 11 - गोद से नारद, 12 – सनक, 13 – सनन्दन, 14 – सनातन, 15 – सनतकुमार - इच्छा से चार पुत्र १- सनक, २ - सनन्दन, ३ - सनातन ४ - सनतकुमार, - ब्रह्मा ने सर्वप्रथम जिन चार-सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार पुत्रों का सृजन किया। उनकी सृष्टि रचना के कार्य में कोई रुचि नहीं थी। वे ब्रह्मचर्य रहकर ब्रह्म तत्व को जानने में ही मगन रहते थे। इन वीतराग पुत्रों के इस निरपेक्ष व्यवहार पर ब्रह्मा को महान क्रोध उत्पन्न हुआ। ब्रह्मा के उस क्रोध से एक प्रचंड ज्योति ने जन्म लिया। उस समय क्रोध से जलते ब्रह्मा के मस्तक से अर्धनारीश्वर रुद्र उत्पन्न हुआ। ब्रह्मा ने उस अर्धनारीश्वर रुद्र को स्त्री और पुरुष दो भागों में विभक्त कर दिया। पुरुष का नाम 'का' और स्त्री का नाम 'या' रखा। प्रजापत्य कल्प में ब्रह्मा ने रुद्र रूप को ही स्वयंभु मनु और स्त्री रूप में शतरूपा को प्रकट किया। 16 - शरीर से - स्वायंभुव मनु तथा शतरुपा, 17 - ध्यान से चित्रगुप्त। इस प्रकार से ब्रह्माजी से मरीचि हुए।, मरीचि (पीढ़ी ३) के पुत्र कश्यप (पीढ़ी ४) हुए। 

विवस्वान् {सूर्यदेव} (पीढ़ी ५) –

कश्यप के पुत्र विवस्वान {सूर्यदेव} थे। विवस्वान् को सूर्यदेव (प्रत्यक्ष सूर्य नहीं) भी कहा जाता था। विवस्वान से ही सूर्यवंश चला। कश्यप के पुत्र विवस्वान (इनका दूसरा नाम जो प्रसिद्ध हुआ वो सूर्यदेव था, आज भी इने विवस्वान से ज्यादा सूर्यदेव के नाम से ही जाना जाता हैं और इनके इस नाम से सूर्यवंश का नाम चला हैं)

वैवस्वत मनु (पीढ़ी ६) –

वैवस्वत मनु सनातन धर्म के अनुसार मानव जाति के प्रणेता व प्रथम पुरुष स्वायंभुव मनु के बाद सातवें मनु थे। हरेक मन्वंतर में एक प्रथम पुरुष होता है, जिसे मनु कहते हैं। वर्तमान काल में ववस्वत मन्वन्तर चल रहा है, जिसके प्रथम पुरुष वैवस्वत मनु थे, जिनके नाम पर ही मन्वन्तर का भी नाम है। भगवान सूर्य का विवाह विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा से हुआ। विवाह के बाद संज्ञा ने वैवस्वत और यम (यमराज) नामक दो पुत्रों और यमुना (नदी) नामक एक पुत्री को जन्म दिया। यही विवस्वान (सूर्यदेव) के पुत्र वैवस्वत मनु कहलाये। वैवस्वत मनु के नेतृत्व में त्रिविष्टप अर्थात तिब्बत या देवलोक से प्रथम पीढ़ी के मानवों (देवों) का मेरु प्रदेश में अवतरण हुआ। वे देव स्वर्ग से अथवा अम्बर (आकाश) से पवित्र वेद भी साथ लाए थे। इसी से श्रुति और स्मृति की परम्परा चलती रही। वैवस्वत मनु के समय ही भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार हुआ। इनकी शासन व्यवस्था में देवों में पाँच तरह के विभाजन थे: देव, दानव, यक्ष, किन्नर और गंधर्व। वेद, पुराणों और अन्य धर्मग्रंथों के साथ वैज्ञानिक शोधों व अध्ययनों से ज्ञात होता है कि मनुष्य व अन्य जीव-जंतुओं की वर्तमान आदि सृष्टि हिमालय के आसपास की भूमि पर हुई थी जिसमें तिब्बत का सर्वधिक महत्त्व है। हिमालय के पास होने के कारण पूर्व में भारत वर्ष को हिमवर्ष भी कहा जाता था। वेद-पुराणों में तिब्बत को त्रिविष्टप कहा गया है। महाभारत के महाप्रस्थानिक पर्व में स्वर्गारोहण में स्पष्ट किया गया है कि तिब्बत हिमालय के उस राज्य को पुकारा जाता था जिसमें नंदनकानन नामक देवराज इंद्र का देश था। इससे सिद्ध होता है कि इंद्र स्वर्ग में नहीं धरती पर ही हिमालय क्षेत्र में रहते थे। पूर्व में यह धरती जल प्रलय के कारण जल से ढँक गई थी। कैलाश, गोरी-शंकर की चोटी तक पानी चढ़ गया था। इससे यह सिद्ध होता है कि संपूर्ण धरती ही जलमग्न हो गई थी। कई माह तक वैवस्वत मनु द्वारा नाव में ही गुजारने के बाद उनकी नाव गौरी-शंकर के शिखर से होते हुए नीचे उतरी। गोरी-शंकर जिसे माउंट एवरेस्ट शिखर भी कहा जाता है, विश्व में सबसे ऊँचा, बर्फ से ढँका हुआ और ठोस पहाड़ है। तिब्बत में धीरे-धीरे जनसंख्या वृद्धि और वातावरण में तेजी से होते परिवर्तन के कारण वैवस्वत मनु की संतानों ने अलग-अलग भूमि की बढ़ना आरंभ किया। विज्ञान के अनुसार भी पहले पृथ्वी के सभी महाद्वीप इकट्ठे थे। अर्थात अमेरिका द्वीप इधर अफ्रीका और उधर चीन तथा रूस से जुड़ा हुआ था। अफ्रीका भारत से जुड़ा हुआ था। धरती की घूर्णन गति और भू-गर्भीय परिवर्तन के कारण धरती द्वीपों में बँट गई। इस जुड़ी हुई धरती पर ही हिमालय की निम्न श्रेणियों को पार कर मनु की संतानें कम ऊँचाई वाले पहाड़ी विस्तारों में बसती गईं। फिर जैसे-जैसे समुद्र का जल स्तर घटता गया वे और भी मध्य भाग में आते गए। दक्षिण के इलाके तो जलप्रलय से जलमग्न ही थे। लेकिन बहुत काल के बाद धीरे-धीरे जैसे-जैसे समुद्र का जलस्तर घटा मनु का कुल पश्चिमी, पूर्वी और दक्षिणी मैदान और पहाड़ी प्रदेशों में फैल गए। जो हिमालय के इधर फैलते गए उन्होंने ही अखंड भारत की सम्पूर्ण भूमि को ब्रह्मावर्त, ब्रह्मार्षिदेश, मध्यदेश, आर्यावर्त एवं भारतवर्ष आदि नाम दिए। जो इधर आए वे सभी मनुष्य आर्य कहलाने लगे। यही लोग साथ में वेद लेकर आए थे। 

वैवस्वत मनु के दस पुत्र हुए  01 – इल (‘‘इला), 02 – इक्ष्वाकु (पीढ़ी ७), 03 - कुशनाम (नाभाग), 04 – अरिष्ट,  05 – धृष्ट,  06 – नरिष्यन्त,  07 – करुष,  08 – महाबली, 09 – शर्याति, 10 - पृषध।

वैवस्वत मनु के दस पुत्रों में से दूसरे पुत्र का नाम इक्ष्वाकु (पीढ़ी ७) था। इसमें इक्ष्वाकु कुल का ही मुख्यतः विस्तार हुआ।

वैवस्वत मनु के पुत्र इक्ष्वाकु (पीढ़ी ७)

ये परम प्रतापी राजा थे, इनसे इस वंश का एक नाम इक्ष्वाकु वंश हुआ। इक्ष्वाकु, प्राचीन भारत के इक्ष्वाकु वंश के प्रथम राजा थे। 'इक्ष्वाकु' शब्द 'इक्षु' से व्युत्पन्न है, जिसका अर्थ ईख होता है।

पौराणिक परंपरा के अनुसार इक्ष्वाकु, विवस्वान् (सूर्य) के पुत्र वैवस्वत मनु के पुत्र थे। पौराणिक कथा इक्ष्वाकु को अमैथुनी सृष्टि द्वारा मनु की छींक से उत्पन्न बताती है। वे सूर्यवंशी राजाओं में पहले माने जाते हैं। उनकी राजधानी कोसल (अयोध्या) थी। उनके १०० पुत्र बताए जाते हैं जिनमें ज्येष्ठ विकुक्षि था। इक्ष्वाकु के एक दूसरे पुत्र निमि ने मिथिला राजकुल स्थापित किया। साधारणत: बहुवचनांतक इक्ष्वाकुओं का तात्पर्य इक्ष्वाकु से उत्पन्न सूर्यवंशी राजाओं से होता है, परंतु प्राचीन साहित्य में उससे एक इक्ष्वाकु जाति का भी बोध होता है। इक्ष्वाकु का नाम, केवल एक बार, ऋग्वेद में भी प्रयुक्त हुआ है जिसे मैक्समूलर ने राजा की नहीं, बल्कि जातिवाचक संज्ञा माना है। इक्ष्वाकुओं की जाति जनपद में उत्तरी भागीरथी की घाटी में संभवत: कभी बसी थी। कुछ विद्वानों के मत से उत्तर पश्चिम के जनपदों में भी उनका संबंध था। सूर्यवंश की शुद्ध अशुद्ध सभी प्रकार की वंशावलियाँ देश के अनेक राजकुलों में प्रचलित हैं। उनमें वैयक्तिक राजाओं के नाम अथवा स्थान में चाहे जितने भेद हों, उनका आदि राजा इक्ष्वाकु ही है। इससे कुछ अजब नहीं, जो वह सुदूर पूर्वकाल में कोई ऐतिहासिक व्यक्ति रहे हों।

इक्ष्वाकु के ज्येष्ठ पुत्र विकुक्षि हुए और विकुक्षि के पुत्र पुरंजय पैदा हुए।

विकुक्षि (शशाद) (पीढ़ी ८)

शशादइसका पहिला नाम विकुक्षि था। एक बार इसने यज्ञ के लिये जो पशु मारे गये थे उनमें से एक शश (खरहा) भूनकर खा लिया इससे नाम शशाद पड़ गया।

पुरंजय (पीढ़ी ९)

शशाद का पुत्र परंजय हुआ। एक बार देवासुर संग्राम में इसने इन्द्ररूपी बैल के ककुत् (डील) पर बैठकर असुरों को परास्त किया; तबसे यह ककुत्स्थ कहलाया।

पुरंजय इक्ष्वाकू के पौत्र विकुक्षि का पुत्र था। वह एक मन्द-प्रसूत राजपूत्र था। उसे योद्धा और यशभागी होने के कारण ‘इन्द्रवाह और ‘ककुत्स्थ भी कहा जाता है। देवासुर संग्राम में पुरंजय की सहायता से ही देवताओं को विजयश्री प्राप्त हुई थी। इसीलिए देवताओं ने उसे 'पुरंजय' (पुरों को जीतने वाला) कहकर सम्बोधित किया।  देवताओं की सहायता - सतयुग-त्रेता के संधि काल में दीर्घ कालीन देवासुर संग्राम में अंतत: देवगण परास्त होने लगे। पुरंजय ने शर्त रखी कि यदि देवराज इन्द्र उसके वाहन बनेंगे तो वह देवासुर संग्राम में उनकी मदद कर सकता है। इन्द्र पहले तो सोच में पड़ गये। अंतत: उन्होंने पुरंजय की शर्त को स्वीकार कर लिया। उन्होंने पुरंजय की सवारी के लिए विशाल दिव्य वृषभ का रूप धारण कर लिया। विष्णु ने पुरंजय को दिव्य शस्त्रास्त्र प्रदान किये। इस प्रकार पुरंजय के पराक्रम तथा युद्ध कौशल से देवताओं को विजय प्राप्त हुई और असुरों को परास्त होकर भागना पड़ा।

अनेना (अनरण्य) (पीढ़ी १०)

पृथु (पीढ़ी ११)

वाल्मीकि रामायण में इन्हें अनरण्य का पुत्र तथा त्रिशंकु का पिता कहा गया है। ये भगवान विष्णु के अंशावतार थे। स्वयंभुव मनु के वंशज अंग नामक प्रजापति का विवाह मृत्यु की मानसी पुत्री सुनीथा से हुआ था। वेन उनका पुत्र हुआ। सिंहासन पर बैठते ही उसने यज्ञ-कर्मादि बंद कर दिये। त्र+षियों ने मंत्रपूत कुशों से उसे मार डाला। सुनिथा ने पुत्र का शव सुरक्षित रखा, जिसकी दाहिनी जंघा का मंथन करके त्र+षियों ने एक नाटा और छोटा मुखवाला पुरुष उत्पन्न किया। उसने ब्राह्मणों से पूछा, कि ``मैं क्या करूं?'' ब्राह्मणों ने ``निषीद'' (बैठ) कहा। इसलिए उसका नाम निषाद पड़ा। उस निषाद द्वारा वेन के सारे पाप कट गये। बाद में ब्राह्मणों ने वेन की भुजाओं का मंथन किया, जिसके फलस्वरूप स्त्री-पुरुष का जोड़ा प्रकट हुआ। पुरुष का नाम पृथु तथा स्त्री का नाम अर्चि हुआ। अर्चि पृथु की पत्नी हुई। यह लक्ष्मी का अवतार थी। पृथु का राज्याभिषेक हुआ।

वेन के पापाचरणों से पृथ्वी धन-धान्यहीन हो गई थी। प्रजा का क्लेश मिटाने के लिए पृथु अपना अजगर लेकर पृथ्वी के पीछे पड़े तो वह कांप उठी और गौ-रूप धारण कर शरण के लिए भागी, पर कहीं भी उसे रक्षा नहीं मिली। उसने राजा से प्रार्थना की कि वह अपने उदर में पचे धन-धान्य को दूध के रूप में दे देगी, बशर्ते कि एक बछड़ा दें। स्वायंभुव मनु को बछड़ा बनाकर पृथ्वी दुही गयी। अंत में राजा ने पृथ्वी को कन्या-रूप में ग्रहण किया। पृथु बड़े धर्मात्मा एवं भगवद्भक्त थे। इन्होंने ब्रह्मावर्त प्रदेश में पुण्यतोया सरस्वती के तट पर सौ यज्ञ किये। सौवां यज्ञ चलते समय ईर्ष्यालु इंद्र ने इनका अश्व चुरा लिया तो ये कुपित हों गये और धनुष पर अपना बाण चढ़ा लिया। ऋषियों के  मना करने पर भी वे इंद्र को होम करने लगे तो ब्रह्मा ने उन्हें रोका। इस पर धर्मात्मा पृथु ने अपना यज्ञ ही रोक लिया। पृथु ने प्रयाग को निवासभूमि बना लिया। स्वयं सनकादि इनके यहां उपस्थित हुए। अंतिम दिनों में पृथु अर्चि सहित तपस्या के लिए वन में चले गये। वहां योग-ध्यान में शरीर-त्याग किया। पृथु तथा अर्चि के पांच पुत्र हुए थे – विष्टराश्व (विजिताश्व), धूम्रकेश, हर्यक्ष, द्रविण और वृक। अर्चि पति की चिता पर चढ़कर सती हुई थी। इस प्रकार से पृथु के पांच पुत्रो मेसे सबसे बड़े पुत्र विष्टराश्व (विजिताश्व) हुआ विष्टराश्व (विजिताश्व) (पीढ़ी १२),चदं (पीढ़ी  १३),युवनाश्व (पीढ़ी १४), श्रावस्त (पीढ़ी १५),बृहदश्व (पीढ़ी १६),धुँधमारचकवे (कुवलाश्व) (पीढ़ी १७),हढाश्व (पीढ़ी१८),हरयश्व (पीढ़ी १९),निकुम्भ (पीढ़ी२०),वरहणासव (संहताश्व) (पीढ़ी २१),किरसारव (कृशाश्व) (पीढ़ी २२),सेनजित् (प्रसेनजित्) (पीढ़ी २३),युवनाश (पीढ़ी २४), मान्धाताचकवे (मान्धातृ) (पीढ़ी२५), पुरुकुत्स (पीढ़ी२६),त्रसदस्यु (पीढ़ी२७),अनरण्य (पीढ़ी२८),हरयाश्व (पीढ़ी २९),त्रिरुगा (पीढ़ी३०), त्रिधनवन् (पीढ़ी३१),सत्यव्रत (पीढ़ी३२ )

राजा हरिश्चंद्र (पीढ़ी३३)

राजा हरिश्चंद्र का इतिहास इस प्रकार से था अयोध्या के राजा हरिशचंद्र बहुत ही सत्यवादी और धर्मपरायण राजा थे। वे अपने सत्य धर्म का पालन करने और वचनों को निभाने के लिए राजपाट छोड़कर पत्नी और बच्चे के साथ जंगल चले गए और वहां भी उन्होंने विषम परिस्थितियों में भी धर्म का पालन किया। राजा हरिश्चंद्र अयोध्या के प्रसिद्ध सूर्यवंशी (इक्ष्वाकुवंशी,अर्कवंशी,रघुवंशी) राजा थे जो सत्यव्रत के पुत्र थे। ये अपनी सत्यनिष्ठा के लिए अद्वितीय हैं और इसके लिए इन्हें अनेक कष्ट सहने पड़े। ये बहुत दिनों तक पुत्रहीन रहे पर अंत में अपने कुलगुरु वशिष्ठ के उपदेश से इन्होंने वरुणदेव की उपासना की तो इस शर्त पर पुत्र जन्मा कि उसे हरिश्चंद्र यज्ञ में बलि दे दें। पुत्र का नाम रोहिताश्व रखा गया और जब राजा ने वरुण के कई बार आने पर भी अपनी प्रतिज्ञा पूरी न की तो उन्होंने हरिश्चंद्र को जलोदर रोग होने का शाप दे दिया।  रोग से छुटकारा पाने और वरुणदेव को फिर प्रसन्न करने के लिए राजा वशिष्ठ जी के पास पहुँचे। इधर इंद्र ने रोहिताश्व को वन में भगा दिया। राजा ने वशिष्ठ जी की सम्मति से अजीगर्त नामक एक दरिद्र ब्राह्मण के बालक शुन:शेपको खरीदकर यज्ञ की तैयारी की। परंतु बलि देने के समय शमिता ने कहा कि मैं पशु की बलि देता हूँ, मनुष्य की नहीं। जब शमिता चला गया तो विश्वामित्र ने आकर शुन:शेप को एक मंत्र बतलाया और उसे जपने के लिए कहा। इस मंत्र का जप कने पर वरुणदेव स्वयं प्रकट हुए और बोले - हरिश्चंद्र, तुम्हारा यज्ञ पूरा हो गया। इस ब्राह्मणकुमार को छोड़ दो। तुम्हें मैं जलोदर से भी मुक्त करता हूँ। यज्ञ की समाप्ति सुनकर रोहिताश भी वन से लौट आया और शुन:शेप विश्वामित्र का पुत्र बन गया। विश्वामित्र के कोप से हरिश्चंद्र तथा उनकी रानी शैव्या को अनेक कष्ट उठाने पड़े। उन्हें काशी जाकर श्वपच के हाथ बिकना पड़ा, पर अंत में रोहिताश की असमय मृत्यु से देवगण द्रवित होकर पुष्पवर्षा करते हैं और राजकुमार जीवित हो उठता है। इस महान राजा से सम्बन्धित कहानी के विषय मे एक महान तार्किक व्यक्ति रिसुल ने बताया कि विस्वामित्र के कहने पर अपना सब कुछ दान देने के पश्चात दक्छीना देने हेतु पहने अपने पत्नी को पांच सौ स्वर्ण मुद्रा व बच्चे रोहित को सौ स्वर्ण मुद्रा मे बेचने के पश्चात स्वयं को भी पांच सौ स्वर्ण मुद्रा में बेच दिए थे।तब इग्यारह सौ स्वर्ण मुद्रा तैयार किये थे।किंतु व्यापार के नीयम के अनुसार किसी से किसी सामान के बदले पैसा ले ,ले पर वह समान उस पैसा देने वाले अमुक व्यक्ति का हो जाता है।तो ऐसे इस्थित में हरिश्चंद्र जी दक्छीना देने लायक पहले वाले हरिश्चंद्र बचे ही नही थे तो दक्छीना पूर्ण नही हुआ था। ऐसे इस्थित में हरिश्चंद्र का सत्यवादी कहानी से मन बिमुख हो जाता है। राजा हरिश्चन्द्र ने सत्य के मार्ग पर चलने के लिये अपनी पत्नी और पुत्र के साथ खुद को बेच दिया था। कहा जाता है-

चन्द्र टरै सूरज टरै, टरै जगत व्यवहार, पै दृढ श्री हरिश्चन्द्र का टरै न सत्य विचार।

इनकी पत्नी का नाम तारा था और पुत्र का नाम रोहित। इन्होंने अपने दानी स्वभाव के कारण विश्वामित्र जी को अपने सम्पूर्ण राज्य को दान कर दिया था, लेकिन दान के बाद की दक्षिणा के लिये साठ भर सोने में खुद तीनो प्राणी बिके थे और अपनी मर्यादा को निभाया था, सर्प के काटने से जब इनके पुत्र की मृत्यु हो गयी तो पत्नी तारा अपने पुत्र को शमशान में अन्तिम क्रिया के लिये ले गयी। वहाँ पर राजा खुद एक डोम के यहाँ नौकरी कर रहे थे और शमशान का कर लेकर उस डोम को देते थे। उन्होने रानी से भी कर के लिये आदेश दिया, तभी रानी तारा ने अपनी साडी को फाड़कर कर चुकाना चाहा, उसी समय आकाशवाणी हुयी और राजा की ली जाने वाली दान वाली परीक्षा तथा कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदारी की जीत बतायी गयीं

रोहित (पीढ़ी३४),हरित (पीढ़ी३५),चंवु (पीढ़ी३६),सुदेव (पीढ़ी३७),विजय (पीढ़ी३८),रूरूक (पीढ़ी३९),विरक (वृक) (पीढ़ी४०),वाहुक (असित) (पीढ़ी४१)

सगर (सगरचकेर) (पीढ़ी४२)

सगर के पिता का नाम असित (वाहुक) था। वे अत्यंत पराक्रमी थे। हैहय, तालजंघ, शूर और शशिबिंदु नामक राजा उनके शत्रु थे। उनसे युद्ध करते-करते राज्य त्यागकर उन्हें अपनी दो पत्नियों के साथ हिमालय भाग जाना पड़ा। वहां कुछ काल बाद उनकी मृत्यु हो गयी। उनकी दोनों पत्नियां गर्भवती थीं। उनमें से एक का नाम कालिंदी था। कालिंदी की संतान नष्ट करने के लिए उसकी सौत ने उसको विष दे दिया। कालिंदी अपनी संतान की रक्षा के निमित्त भृगुवंशी महर्षि च्यवन के पास गयी। महर्षि ने उसे आश्वासन दिया कि उसकी कोख से एक प्रतापी बालक विष के साथ (सगर) जन्म लेगा। अत: उसके पुत्र का नाम सगर पड़ा। सगर अयोध्या नगरी के राजा हुए। वे संतान प्राप्त करने के इच्छुक थे। उनकी सबसे बड़ी रानी विदर्भ नरेश की पुत्री केशिनी थी। दूसरी रानी का नाम सुमति था। दोनों रानियों के साथ राजा सगर ने हिमवान के प्रस्त्रवण गिरि पर तप किया। प्रसन्न होकर भृगु मुनि ने उन्हें वरदान दिया कि एक रानी को वंश चलाने वाले एक पुत्र की प्राप्ति होगी और दूसरी के साठ हज़ार वीर उत्साही पुत्र होंगे। बड़ी रानी के एक पुत्र और छोटी ने साठ हज़ार पुत्रों की कामना की। केशिनी का असमंजस नामक एक पुत्र हुआ और सुमति के गर्भ से एक तूंबा निकला जिसके फटने पर साठ हज़ार पुत्रों का जन्म हुआ। असमंजस बहुत दुष्ट प्रकृति का था। अयोध्या के बच्चों को सताकर प्रसन्न होता था। सगर ने उसे अपने देश से निकाल दिया। कालांतर में उसका पुत्र हुआ, जिसका नाम अंशुमान था। वह वीर, मधुरभाषी और पराक्रमी था। राजा सगर ने विंध्य और हिमालय के मध्य यज्ञ किया। सगर के पौत्र अंशुमान यज्ञ के घोड़े की रक्षा कर रहे थे। जब अश्ववध का समय आया तो इन्द्र राक्षस का रूप धारण कर घोड़ा चुरा ले गये। सगर ने अपने साठ हज़ार पुत्रों को आज्ञा दी कि वे पृथ्वी खोद-खोदकर घोड़े को ढूंढ़ लायें। जब तक वे नहीं लौटेंगे, सगर और अंशुमान दीक्षा लिये यज्ञशाला में ही रहेंगे। सगर-पुत्रों ने पृथ्वी को बुरी तरह खोद डाला तथा जंतुओं का भी नाश किया। देवतागण ब्रह्मा के पास पहुंचे और बताया कि पृथ्वी और जीव-जंतु कैसे चिल्ला रहे हैं। ब्रह्मा ने कहा कि पृथ्वी विष्णु भगवान की स्त्री हैं वे ही कपिल मुनि का रूप धारण कर पृथ्वी की रक्षा करेंगे। सगर-पुत्र निराश होकर पिता के पास पहुंचे। पिता ने रुष्ट होकर उन्हें फिर से अश्व खोजने के लिए भेजा। हज़ार योजन खोदकर उन्होंने पृथ्वी धारण करने वाले विरूपाक्ष नामक दिग्गज को देखा। उसका सम्मान कर फिर वे आगे बढ़े। दक्षिण में महापद्म, उत्तर में श्वेतवर्ण भद्र दिग्गज तथा पश्चिम में सोमनस नामक दिग्गज को देखा। तदुपरांत उन्होंने कपिल मुनि को देखा तथा थोड़ी दूरी पर अश्व को चरते हुए पाया। उन्होंने कपिल मुनि का निरादर किया, फलस्वरूप मुनि के शाप से वे सब भस्म हो गये। बहुत दिनों तक पुत्रों को लौटता न देख राजा सगर ने अंशुमान को अश्व ढूंढ़ने के लिए भेजा। वे ढूंढ़ने-ढूंढ़ते अश्व के पास पहुंचे जहां सब चाचाओं की भस्म का स्तूप पड़ा था। जलदान के लिए आसपास कोई जलाशय भी नहीं मिला। तभी पक्षीराज गरुड़ उड़ते हुए वहां पहुंचे और कहा कि 'ये सब कपिल मुनि के शाप से हुआ है, अत: साधारण जलदान से कुछ न होगा। गंगा का तर्पण करना होगा। इस समय तुम अश्व लेकर जाओ और पिता का यज्ञ पूर्ण करो।' उन्होंने ऐसा ही किया। महाभारत के अनुसार - इक्ष्वाकुवंश में सगर नामक प्रसिद्ध राजा का जन्म हुआ था। उनकी दो रानियां थीं- वैदर्भी तथा शैव्या। वे दोनों अपने रूप तथा यौवन के कारण बहुत अभिमानिनी थीं। दीर्घकाल तक पुत्र-जन्म न होने पर राजा अपनी दोनों रानियों के साथ कैलास पर्वत पर जाकर पुत्रकामना से तपस्या करने लगे। शिव ने उन्हें दर्शन देकर वर दिया कि एक रानी के साठ हज़ार अभिमानी शूरवीर पुत्र प्राप्त होंगे तथा दूसरी से एक वंशधर पराक्रमी पुत्र होगा। कालांतर में वैदर्भी ने एक तूंबी को जन्म दिया। राजा उसे फेंक देना चाहते थे किंतु तभी आकाशवाणी हुई कि इस तूंबी में साठ हज़ार बीज हैं। घी से भरे एक-एक मटके में एक-एक बीज सुरक्षित रखने पर कालांतर में साठ हज़ार पुत्र प्राप्त होंगे। इसे महादेव का विधान मानकर सगर ने उन्हें वैसे ही सुरिक्षत रखा तथा उन्हें साठ हज़ार उद्धत पुत्रों की प्राप्ति हुई। वे क्रूरकर्मी बालक आकाश में भी विचर सकते थे। तथा सब को बहुत तंग करते थे। शैव्या ने असमंजस नामक पुत्र को जन्म दिया। वह पुरवासियों के दुर्बल बच्चों को गर्दन से पकड़कर मार डालता था। अत: राजा ने उसका परित्याग कर दिया। असमंजस के पुत्र का नाम अंशुमान था। राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ की दीक्षा ली। उसके साठ हज़ार पुत्र घोड़े की सुरक्षा में लगे हुए थे तथापि वह घोड़ा सहसा अदृश्य हो गया। उसको ढूंढ़ते हुए वैदर्भी पुत्रों ने पृथ्वी में एक दरार देखी। उन्होंने वहां खोदना प्रारंभ कर दिया। निकटवर्ती समुद्र को इससे बहुत पीड़ा का अनुभव हो रहा था। हज़ारों नाग, असुर आदि उस खुदाई में मारे गये। फिर उन्होंने समुद्र के पूर्ववर्ती प्रदेश को फोड़कर पाताल में प्रवेश किया जहां पर अश्व विचर रहा था और उसके पास ही कपिल मुनि तपस्या कर रहे थे। हर्ष के आवेग में उनसे मुनि का निरादर हो गया, अत: मुनि ने अपनी दृष्टि के तेज से उन्हें भस्म कर दिया। नारद ने यह कुसंवाद राजा सगर तक पहुंचाया। पुत्र-विछोह से दुखी राजा ने अशुंमान को बुलाकर अश्व को लाने के लिए कहा। अंशुमान ने कपिल मुनि को प्रणाम कर अपने शील के कारण उनसे दो वर प्राप्त किये। पहले वर के अनुसार उसे अश्व की प्राप्ति हो गयी तथा दूसरे वर से पितरों की पवित्रता मांगी। कपिल मुनि ने कहा-'तुम्हारे प्रताप से मेरे द्वारा भस्म किये गये तुम्हारे पितर स्वर्ग प्राप्त करेंगे। तुम्हारा पौत्र शिव को प्रसन्न कर सगर-पुत्रों की पवित्रता के लिए स्वर्ग से गंगा को पृथ्वी पर ले आयेगा।' अंशुमान के लौटने पर सगर ने अश्वमेध यज्ञ पूर्ण किया। श्रीमद् भागवत के अनुसार - रोहित के कुल में बाहुक का जन्म हुआ। शत्रुओं ने उसका राज्य छीन लिया। वह अपनी पत्नी सहित वन चला गया। वन में बुढ़ापे के कारण उसकी मृत्यु हो गयी। उसके गुरु ओर्व ने उसकी पत्नी को सती नहीं होने दिया क्योंकि वह जानता था कि वह गर्भवती है। उसकी सौतों को ज्ञात हुआ तो उन्होंने उसे विष दे दिया। विष का गर्भ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। बालक विष (गर) के साथ ही उत्पन्न हुआ, इसलिए 'सगर' कहलाया। बड़ा होने पर उसका विवाह दो रानियों से हुआ- सुमति तथा केशिनी। सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया। इन्द्र ने उसके यज्ञ का घोड़ा चुरा लिया तथा तपस्वी कपिल के पास ले जाकर खड़ा किया। उधर सगर ने सुमति के पुत्रों को घोड़ा ढूंढ़ने के लिए भेजा। साठ हज़ार राजकुमारों को कहीं घोड़ा नहीं मिला तो उन्होंने सब ओर से पृथ्वी खोद डाली। पूर्व-उत्तर दिशा में कपिल मुनि के पास घोड़ा देखकर उन्होंने शस्त्र उठाये और मुनि को बुरा-भला कहते हुए उधर बढ़े। फलस्वरूप उनके अपने ही शरीरों से आग निकली जिसने उन्हें भस्म कर दिया। केशिनी के पुत्र का नाम असमंजस तथा असमंजस के पुत्र का नाम अंशुमान था। असमंजस पूर्वजन्म में योगभ्रष्ट हो गया था, उसकी स्मृति खोयी नहीं थी, अत: वह सबसे विरक्त रह विचित्र कार्य करता रहा था। एक बार उसने बच्चों को सरयू में डाल दिया। पिता ने रुष्ट होकर उसे त्याग दिया। उसने अपने योगबल से बच्चों को जीवित कर दिया तथा स्वयं वन चला गया। यह देखकर सबको बहुत पश्चात्ताप हुआ। राजा सगर ने अपने पौत्र अंशुमान को घोड़ा खोजने भेजा। वह ढूंढ़ता-ढूंढ़ता कपिल मुनि के पास पहुंचा। उनके चरणों में प्रणाम कर उसने विनयपूर्वक स्तुति की। कपिल से प्रसन्न होकर उसे घोड़ा दे दिया तथा कहा कि भस्म हुए चाचाओं का उद्धार गंगाजल से होगा। अंशुमान ने जीवनपर्यंत तपस्या की किंतु वह गंगा को पृथ्वी पर नहीं ला पाया। तदनंतर उसके पुत्र दिलीप ने भी असफल तपस्या की। दिलीप के पुत्र भगीरथ के तप से प्रसन्न होकर गंगा ने पृथ्वी पर आना स्वीकार किया। गंगा के वेग को शिव ने अपनी जटाओं में संभाला। भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर गंगा समुद्र तक पहुंची। समुद्र-संगम पर पहुंचकर उसने सगर के पुत्रों का उद्धार किया। सब लोग गंगा से अपने पाप धोते हैं। उन पापों के बोझ से भी गंगा मुक्त रहती है। विरक्त मनुष्यों में भगवान निवास करता है, अत: उनके स्नान करने से गंगाजल में घुले सब पाप नष्ट हो जाते हैं। ब्रह्म पुराण के अनुसार - राजा बाहु दुर्व्यसनी था। हैहय तथा तालजंघ ने शक, पारद, यवन, कांबोज और पल्लव की सहायता से उसके राज्य का अपहरण कर लिया। बाहु ने वन में जाकर प्राण त्याग किये। उसकी गर्भवती पत्नी सती होना चाहती थी। गर्भवती पत्नी को उसकी सौत ने विष दे दिया था, किंतु उसकी मृत्यु नहीं हुई थी) भृगुवंशी और्व ने दयावश उसे बचा लिया। मुनि के आश्रम में ही उसने विष के साथ ही पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम सगर पड़ा। और्व ने उसे शस्त्रास्त्र विद्या सिखायी तथा आग्नेयास्त्र भी दिया। सगर ने हैहय के सहायकों को पराजित करके नाश करना आंरभ कर दिया। वे वसिष्ठ की शरण में गये। वसिष्ठ ने सगर से उन्हें क्षमा करने के लिए कहा। सगर ने अपनी प्रतिज्ञा याद करके उनमें से किन्हीं का पूरा, किन्हीं का आधा सिर, किन्हीं की दाढ़ी आदि मुंडवाकर छोड़ दिया। सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया। घोड़ा समुद्र के निकट अपह्र्य हो गया। सगर ने पुत्रों को समुद्र के निकट खोदने के लिए कहा। वे लोग खोदते हुए उस स्थान पर पहुंचे जहां विष्णु, कपिल आदि सो रहे थे। निद्रा भंग होने के कारण विष्णु की दृष्टि से सगर के चार छोड़कर सब पुत्र नष्ट हो गये। बर्हिकेतु, सुकेतु, धर्मरथ तथा पंचनद- इन चार पुत्रों के पिता सगर को नारायण ने वर दिया कि उसका वंश अक्षय रहेगा तथा समुद्र सगर का पुत्रत्व प्राप्त करेगा। समुद्र भी राजा सगर की वंदना करने लगा। पुत्र-भाव होने से ही वह सागर कहलाया। शिव पुराण के अनुसार - राजा बाहु रात-दिन स्त्रियों के भोग-विलास में रहता था। एक बार हैहय, तालजंघ तथा शक राजाओं ने उस विलासी को परास्त कर राज्य छीन लिया। बाहु अर्ज मुनि के शरण में पहुंचा। उसकी बड़ी रानी गर्भवती हो गयी। सौतों ने उसे विष दे दिया। भगवान की कृपा से रानी तथा उसका गर्भस्थ शिशु तो बच गये किंतु अचानक राजा की मृत्यु हो गयी। गर्भवती रानी को मुनि ने सती नहीं होने दिया। उसने जिस बालक को जन्म दिया, वह सगर कहलाया क्योंकि वह विष से युक्त था। मां और मुनि को प्रेरणा से वह शिव भक्त बन गया। उसने अश्वमेध यज्ञ भी किया। उसका घोड़ा इन्द्र ने छिपा लिया। उसके साठ सहस्त्र पुत्र घोड़ा ढूंढ़ते हुए कपिल मुनि के पास पहुंचे। वे तप कर रहे थे तथा घोड़ा वहां बंधा हुआ था। उन्होंने मुनि को चोर समझकर उन पर प्रहार करना चाहा। मुनि ने नेत्र खोले तो सब वहीं भस्म हो गये। दूसरी रानी से उत्पन्न पंचजन्य, जिसका दूसरा नाम 'असमंजस' था, शेष रह गया था। उसके पुत्र का नाम अंशुमान हुआ जिसने घोड़ा लाकर दिया और यज्ञ पूर्ण करवाया। पउम चरित के अनुसार - त्रिदंशजय के दूसरे पोते का नाम सगर था। चक्रवाल नगर के अधिपति पूर्णधन के पुत्र का नाम मेघवाहन था। वह उसका विवाह सुलोचन की पुत्री से करना चाहता था। किंतु सुलोचन अपनी कन्या का विवाह सगर से कराना चाहता था। कन्या को निमित्त बनाकर पूर्णधन और सुलोचन का युद्ध हुआ। सुलोचन मारा गया किंतु उसके पुत्र सहस्त्रनयन अपनी बहन को साथ लेकर भाग गया। कालांतर में उसने राजा सगर को अपनी बहन अर्पित कर दी। पूर्णधन की मृत्यु के उपरांत मेघवाहन को लंका जाने के लिए प्रेरित किया। भीम ने मेघवाहन को लंका के अधिपति-पद पर प्रतिष्ठित किया। एक बार राजा सगर के साठ हज़ार पुत्र, अष्टापद पर्वत पर वंदन हेतु गये। वहां देवार्चन इत्यादि के उपरांत भरत निर्मित चैत्यभ्वन की रक्षा के हेतु उन्हांने दंडरत्न से गंगा को मध्य में प्रहार करके पर्वत के चारों ओर 'परिखा' तैयार की। नागेंद्र ने क्रोध-रूपी अग्नि से सगर-पुत्रों को भस्म कर दिया। उनमें से भीम और भगीरथ, दो पुत्र अपने धर्म की दृढ़ता के कारण से भस्म नहीं हो पाये। उन लोगों के लौटने पर सब समाचार जानकर चक्रवर्ती राजा सगर ने भगीरथ को राज्य सौंप दिया तथा स्वयं जिनवर से दीक्षा ग्रहण करके मोक्ष-पद प्राप्त किया।

असमंजस(पीढ़ी४३),अंशुमन्त(पीढ़ी४४),दिलीप(पीढ़ी४५)

भगीरथ (जो गंगा को धरती पर लाये) (पीढ़ी४६)

भगीरथ इक्ष्वाकु वंशीय सम्राट् दिलीप के पुत्र थे जिन्होंने घोर तपस्या से गंगा को पृथ्वी पर अवतरित कर कपिल मुनि के शाप से भस्म हुए ६० हजार सगरपुत्रों के उद्धारार्थ पीढ़ियों से चले प्रयत्नों को सफल किया था। गंगा को पृथ्वी पर लाने का श्रेय भगीरथ को है, इसलिए इनके नाम पर उन्हें 'भागीरथी' कहा गया। गंगावतरण की इस घटना का क्रमबद्ध वर्णन वायुपुराण (४७.३७), विष्णुपुराण (४.४.१७), हरवंशपुराण (१.१५), ब्रह्मवैवर्तपुराण(१.०), महभारत (अनु. १२६.२६), भागवत (९.९) आदि पुराणों तथा वाल्मीकीय रामायण (बाल., १.४२-४४) में मिलता है। 

सुरत (श्रुत) (पीढ़ी४७),नाभाग (पीढ़ी४८),सिन्धुद्वीप (पीढ़ी४९),अयुतायुस् (पीढ़ी ५०),ऋतुपर्ण (पीढ़ी५१),सुदास (पीढ़ी५२),अश्मक (पीढ़ी५३ ),मूलक (पीढ़ी ५४ ),शतरथ (पीढ़ी५५),इलि्वल (पीढ़ी५६),विश्वसह (पीढ़ी५७ ),खट्वागं (पीढ़ी ५८),दीर्घबाहु (पीढ़ी५९ ),रघु (कुल को रघुकुल कहा जाता है) (पीढ़ी६०),अज (पीढ़ी६१),दशरथ (पीढ़ी६२)

राम (पीढ़ी६३)

राजा दशरथ के पुत्र राम राज्य नियमो से राजा का ज्येष्ठ लड़का ही राजा बनने का पात्र होता है अत: राम को अयोध्या का राजा बनना निश्चित था। कैकेयी जिन्होने दो बार दशरथ की जान बचाई थी और दशरथ ने उन्हें यह वर दिया था कि वो वन के किसी भी पल उनसे दो वर मांग सकती है। राम को राजा बनते हुए और भविष्य को देखते हुए कैकेयी चाहती थी उसका पुत्र भरत ही राजा बनें, इसलिए उन्होने राजा दशरथ द्वारा राम को १४ वर्ष का वनवास दिलाया और अपने पुत्र भरत के लिए अयोध्या का राज्य मांग लिया। वचनों में बंदे राजा दशरथ को मजबूरन यह स्वीकार करना पड़ा। राम ने अपने पिता की आज्ञा का पालन किया। राम की पत्नी सीता और उनके भाई लक्ष्मण भी वनवास गये थे।

श्रीराम का जीवनकाल एवं पराक्रम महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित संस्कृत महाकाव्य रामायण के रूप में वर्णित हुआ है। लेकिन अभी तक उत्खनन से कोई भी साक्ष्य पुरातत्व विभाग को नहीं मिला है। किन्तु रामायण में सीता के खोज में श्रीलंका जाने के लिए 25 किलोमीटर पत्थर के सेतु का निर्माण करने का उल्लेख प्राप्त होता है, जिसको रामसेतु कहते हैं, वह आज भी स्थित है, मान्यता अनुसार गोस्वामी तुलसीदास ने भी उनके जीवन पर केन्द्रित भक्तिभावपूर्ण सुप्रसिद्ध महाकाव्य रामचरितमानस की रचना की है।

इन्हें पुरुषोत्तम शब्द से भी अलंकृत किया जाता है। मर्यादा-पुरुषोत्तम राम, अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के सबसे बड़े पुत्र थे। राम की पत्नी का नाम सीता था इनके तीन भाई थे- लक्ष्मण,  भरत  और शत्रुघ्न। हनुमान, राम के, सबसे बड़े भक्त माने जाते हैं। राम ने लंका के राजा रावण (जो अधर्म का पथ अपना लिया था) का वध किया। राम की प्रतिष्ठा मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में है। राम ने मर्यादा के पालन के लिए राज्य, मित्र, माता-पिता, यहाँ तक कि पत्नी का भी साथ छोड़ा। इनका परिवार आदर्श भारतीय परिवार का प्रतिनिधित्व करता है। राम रघुकुल में जन्मे थे, जिसकी परम्परा प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई की थी। राम के पिता दशरथ ने उनकी सौतेली माता कैकेयी को उनकी किन्हीं दो इच्छाओं को पूरा करने का वचन (वर) दिया था। कैकेयी ने दासी मन्थरा के बहकावे में आकर इन वरों के रूप में राजा दशरथ से अपने पुत्र भरत के लिए अयोध्या का राजसिंहासन और राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास माँगा। पिता के वचन की रक्षा के लिए राम ने खुशी से चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार किया। पत्नी सीता ने आदर्श पत्नी का उदाहरण देते हुए पति के साथ वन जाना उचित समझा। भाई लक्ष्मण ने भी राम के साथ चौदह वर्ष वन में बिताए। भरत ने न्याय के लिए माता का आदेश ठुकराया और बड़े भाई राम के पास वन जाकर उनकी चरणपादुका (खड़ाऊँ) ले आए। फिर इसे ही राज गद्दी पर रख कर राजकाज किया। जब राम वनवासी थे तभी उनकी पत्नी सीता को रावण हरण कर ले गया। जंगल में राम को हनुमान जैसा मित्र और भक्त मिला जिसने राम के सारे कार्य पूरे कराये। राम ने हनुमान,सुग्रीव आदि वानर जाति के महापुरुषो की मदद से सीता को ढूँढ़ा। समुद्र में पुल बना कर लंका पहुँचे तथा रावण के साथ युद्ध किया। उसे मार कर सीता को वापस लाये। राम के अयोध्या लौटने पर भरत ने राज्य उनको ही सौंप दिया। राम न्यायप्रिय थे। उन्होंने बहुत अच्छा शासन किया इसलिए लोग आज भी अच्छे शासन को रामराज्य की उपमा देते हैं। इनके दो पुत्रों कुश व लव ने इनके राज्यों को सँभाला। वैदिक धर्म के कई त्योहार, जैसे दशहरा, राम नवमी और दीपावली, राम की वन-कथा से जुड़े हुए हैं।

जन्म - रामजी के कथा से सम्बद्ध सर्वाधिक प्रमाणभूत ग्रन्थ आदिकाव्य वाल्मीकीय रामायण में रामजी के-जन्म के सम्बन्ध में निम्नलिखित वर्णन उपलब्ध है:-

चैत्रे नावमिके तिथौ।।

नक्षत्रेऽदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पञ्चसु।

ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह।।

अर्थात् चैत्र मास की नवमी तिथि में, पुनर्वसु नक्षत्र में, पाँच ग्रहों के अपने उच्च स्थान में रहने पर तथा कर्क लग्न में चन्द्रमा के साथ बृहस्पति के स्थित होने पर (रामजी का जन्म हुआ)। यहाँ केवल बृहस्पति तथा चन्द्रमा की स्थिति स्पष्ट होती है। बृहस्पति उच्चस्थ है तथा चन्द्रमा स्वगृही। आगे पन्द्रहवें श्लोक में सूर्य के उच्च होने का उल्लेख है। इस प्रकार बृहस्पति तथा सूर्य के उच्च होने का पता चल जाता है। बुध हमेशा सूर्य के पास ही रहता है। अतः सूर्य के उच्च (मेष में) होने पर बुद्ध का उच्च (कन्या में) होना असंभव है। इस प्रकार उच्च होने के लिए बचते हैं शेष तीन ग्रह - मंगल, शुक्र तथा शनि। इसी कारण से प्रायः सभी विद्वानों ने रामजी के-जन्म के समय में सूर्य, मंगल, बृहस्पति, शुक्र तथा शनि को उच्च में स्थित माना है। राम के जीवन की प्रमुख घटनाएँ -

बालपन और सीता-स्वयंवर - पुराणों में राम के जन्म के बारे में स्पष्ट प्रमाण मिलते कि राम का जन्म वर्तमान उत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले के अयोध्या नामक नगर में हुआ था। अयोध्या जो कि भगवान राम के पूर्वजों की ही राजधानी थी। रामचन्द्र के पूर्वज रघु थे। भगवान राम बचपन से ही शान्‍त स्‍वभाव के वीर पुरूष थे। उन्‍होंने मर्यादाओं को हमेशा सर्वोच्च स्थान दिया था। इसी कारण उन्‍हें मर्यादा पुरूषोत्तम राम के नाम से जाना जाता है। उनका राज्य न्‍यायप्रिय और खुशहाल माना जाता था। इसलिए भारत में जब भी सुराज (अच्छे राज) की बात होती है तो रामराज या रामराज्य का उदाहरण दिया जाता है। धर्म के मार्ग पर चलने वाले राम ने अपने तीनों भाइयों के साथ गुरू वशिष्‍ठ से शिक्षा प्राप्‍त की। किशोरावस्था में गुरु विश्वामित्र उन्‍हें वन में राक्षसों द्वारा मचाए जा रहे उत्पात को समाप्त करने के लिए साथ ले गये। राम के साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी इस कार्य में उनके साथ थे। ताड़का नामक राक्षसी बक्सर (बिहार) में रहती थी। वहीं पर उसका वध हुआ। राम ने उस समय ताड़का नामक राक्षसी को मारा तथा मारीच को पलायन के लिए मजबूर किया। इस दौरान ही गुरु विश्‍वामित्र उन्हें मिथिला ले गये। वहाँ के विदेह राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता के विवाह के लिए एक स्वयंवर समारोह आयोजित किया था। जहाँ भगवान शिव का एक धनुष था जिसकी प्रत्‍यंचा चढ़ाने वाले शूरवीर से सीता का विवाह किया जाना था। बहुत सारे राजा महाराजा उस समारोह में पधारे थे। जब बहुत से राजा प्रयत्न करने के बाद भी धनुष पर प्रत्‍यंचा चढ़ाना तो दूर उसे उठा तक नहीं सके, तब विश्‍वामित्र की आज्ञा पाकर राम ने धनुष उठा कर प्रत्‍यंचा चढ़ाने का प्रयत्न किया। उनकी प्रत्‍यंचा चढाने के प्रयत्न में वह महान धनुष घोर ध्‍‍वनि करते हुए टूट गया। महर्षि परशुराम ने जब इस घोर ध्‍वनि को सुना तो वे वहाँ आ गये और अपने गुरू (शिव) का धनुष टूटनें पर रोष व्‍यक्‍त करने लगे। लक्ष्‍मण उग्र स्‍वभाव के थे। उनका विवाद परशुराम से हुआ। (वाल्मिकी रामायण में ऐसा प्रसंग नहीं मिलता है।) तब राम ने बीच-बचाव किया। इस प्रकार सीता का विवाह राम से हुआ और परशुराम सहित समस्‍त लोगों ने आशीर्वाद दिया। अयोध्या में राम सीता सुखपूर्वक रहने लगे। लोग राम को बहुत चाहते थे। उनकी मृदुल, जनसेवायुक्‍त भावना और न्‍यायप्रियता के कारण उनकी विशेष लोकप्रियता थी। राजा दशरथ वानप्रस्‍थ की ओर अग्रसर हो रहे थे। अत: उन्‍होंने राज्‍यभार राम को सौंपनें का सोचा। जनता में भी सुखद लहर दौड़ गई की उनके प्रिय राजा उनके प्रिय राजकुमार को राजा नियुक्‍त करनेवाले हैं। उस समय राम के अन्‍य दो भाई भरत और शत्रुघ्‍न अपने ननिहाल कैकेय गए हुए थे। कैकेयी की दासी मन्थरा ने कैकेयी को भरमाया कि राजा तुम्‍हारे साथ गलत कर रहें है। तुम राजा की प्रिय रानी हो तो तुम्‍हारी संतान को राजा बनना चाहिए पर राजा दशरथ राम को राजा बनाना चा‍हते हैं। भगवान राम के बचपन की विस्तार-पूर्वक विवरण स्वामी तुलसीदास की  रामचरितमानस  के बालकाण्ड से मिलती है।

वनवास - राजा दशरथ के तीन रानियाँ थीं: कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी। भगवान राम कौशल्या के पुत्र थे, सुमित्रा के दो पुत्र, लक्ष्मण और शत्रुघ्न थे और कैकेयी के पुत्र भरत थे। राज्य नियमो से राजा का ज्येष्ठ लड़का ही राजा बनने का पात्र होता है अत: राम को अयोध्या का राजा बनना निश्चित था। कैकेयी जिन्होने दो बार दशरथ की जान बचाई थी और दशरथ ने उन्हें यह वर दिया था कि वो वन के किसी भी पल उनसे दो वर मांग सकती है। राम को राजा बनते हुए और भविष्य को देखते हुए कैकेयी चाहती थी उसका पुत्र भरत ही राजा बनें, इसलिए उन्होने राजा दशरथ द्वारा राम को १४ वर्ष का वनवास दिलाया और अपने पुत्र भरत के लिए अयोध्या का राज्य मांग लिया। वचनों में बंदे राजा दशरथ को मजबूरन यह स्वीकार करना पड़ा। राम ने अपने पिता की आज्ञा का पालन किया। राम की पत्नी सीता और उनके भाई लक्ष्मण भी वनवास गये थे।

सीता का हरण - वनवास के समय, रावण ने सीता का हरण किया था। रावण एक राक्षस तथा लंका का राजा था। रामायण के अनुसार, जब राम , सीता और लक्ष्मण कुटिया में थे तब एक हिरण की वाणी सुनकर सीता व्याकुल हो गयी। वह हिरण रावण का मामा मारीच था। उसने रावण के कहने पर सुनहरे हिरण का रूप बनाया। सीता उसे देख कर मोहित हो गई और राम से उस हिरण का शिकार करने का अनुरोध किया। राम अपनी भार्या की इच्छा पूरी करने चल पड़े और लक्ष्मण से सीता की रक्षा करने को कहा| मारीच राम को बहुत दूर ले गया। मौका मिलते ही राम ने तीर चलाया और हिरण बने मारीच का वध किया। मरते-मरते मारीच ने ज़ोर से "हे सीता! हे लक्ष्मण!" की आवाज़ लगायी| उस आवाज़ को सुन सीता चिन्तित हो गयीं और उन्होंने लक्ष्मण को राम के पास जाने को कहा| लक्ष्मण जाना नहीं चाहते थे, पर अपनी भाभी की बात को इंकार न कर सके। लक्ष्मण ने जाने से पहले एक रेखा खींची, जो लक्ष्मण रेखा के नाम से प्रसिद्ध है। भगवान राम, अपने भाई लक्ष्मण के साथ सीता की खोज में दर-दर भटक रहे थे। तब वे हनुमान और सुग्रीव नामक दो वानरों से मिले। हनुमान, राम के सबसे बड़े भक्त बने।

रावण का वध - सीता को को पुनः प्राप्त करने के लिए राम ने हनुमान,विभीषण और वानर सेना की मदद से रावन के सभी बंधु-बांधवों और उसके वंशजों को पराजित किया तथा लौटते समय विभीषण को लंका का राजा बनाकर अच्छे शासक के लिए मार्गदर्शन किया। राम ने जब रावण को युद्ध में परास्त किया और उसके छोटे भाई विभीषण को लंका का राजा बना दिया। राम, सीता, लक्षमण और कुछ वानर जन पुष्पक विमान से अयोध्या की ओर प्रस्थान किया। वहां सबसे मिलने के बाद राम और सीता का अयोध्या में राज्याभिषेक हुआ। पूरा राज्य कुशल समय व्यतीत करने लगा।  सीता की सती प्रमाणिकता सिद्ध होने के पश्चात सीता अपने दोनों पुत्रों कुश और लव को राम के गोद में सौंप कर धरती माता के साथ भूगर्भ में चली गई। ततपश्चात रामजन्म की जीवन भी पूर्ण हो गई थी। अतः उन्होंने यमराज की सहमति से सरयू नदी के तट पर गुप्तार घाट में दैहिक त्याग कर पुनः बैकुंठ धाम में विष्णु रूप में विराजमान हो गये।

राजा दशरथ के चार पुत्र हुये - इस प्रकार राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न

राजा राम के दो पुत्र थे - कुश, लव

भरत के दो पुत्र थे - तार्क्ष, पुष्कर।

लक्ष्मण के दो पुत्र थे – चित्रांगद, चन्द्रकेतु।

शत्रुघ्न के क दो पुत्र थे – सुबाहु, शूरसेन (मथुरा का नाम पहले शूरसेन था)

राजा राम के लव व कुश का जन्म हुआ। श्री राम के दो पुत्र थे – लव, कुश। रामायण कालीन महर्षि वाल्मिकी की महान धरा एवं माता सीता के पुत्र लव-कुश का जन्म स्थल कहे जाने वाला धार्मिक स्थल तुरतुरिया है। लव और कुश राम तथा सीता के जुड़वां बेटे थे। जब राम ने वानप्रस्थ लेने का निश्चय कर भरत का राज्याभिषेक करना चाहा तो भरत नहीं माने। अत: दक्षिण कोसल प्रदेश (छत्तीसगढ़) में कुश और उत्तर कोसल में लव का अभिषेक किया गया। राम के काल में भी कोशल राज्य उत्तर कोशल और दक्षिण कोशल में विभाजित था। कालिदास के रघुवंश अनुसार राम ने अपने पुत्र लव को शरावती का और कुश को कुशावती का राज्य दिया था। शरावती को श्रावस्ती मानें तो निश्चय ही लव का राज्य उत्तर भारत में था और कुश का राज्य दक्षिण कोसल में। कुश की राजधानी कुशावती आज के बिलासपुर जिले में थी। कोसला को राम की माता कौशल्या की जन्म भूमि माना जाता है। रघुवंश के अनुसार कुश को अयोध्या जाने के लिए विंध्याचल को पार करना पड़ता था इससे भी सिद्ध होता है कि उनका राज्य दक्षिण कोसल में ही था। राजा लव से राघव राजपूतों का जन्म हुआ जिनमें जयास और सिकरवारों का वंश चला। इसकी दूसरी शाखा थी सिसोदिया राजपूत वंश की जिनमें बैछला और गैहलोत (गुहिल) वंश के राजा हुए। कुश से कुशवाह (कछवाह) राजपूतों का वंश चला। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार लव ने की स्थापना की थी, जो वर्तमान में पाकिस्तान स्थित शहर लाहौर है। यहां के एक किले में लव का एक मंदिर भी बना हुआ है। लवपुरी को बाद में लौहपुरी कहा जाने लगा। दक्षिण-पूर्व एशियाई - देश लाओस, थाई नगर लोबपुरी, दोनों ही उनके नाम पर रखे गए स्थान हैं। राम के दोनों पुत्रों में कुश का वंश आगे बढ़ा। वाल्मीकि रामायण के अनुसार भगवान राम के बड़े पुत्र कुश हुए और लव छोटे हुए थे। कुश से वर्तमान कुशवाहा (कछवाह) राजपूतों का वंश चला। लव व कुश ने राम के अश्वमेघ घोड़े को पकड़ कर राम को युद्ध के लिये चुनौती दे डाली थी। अयोध्या के सभी वीरों को छोटे से बालक ने हराकर यह सिद्ध कर दिया था; शक्ति का गुरूर खतरनाक होता है। लव के भाई होने के कारण कुश ने अपनी माँ सीता को न्याय दिलाने के लिये अयोध्या राजा सह पिता से भरी सभा में संवाद किया और माँ सीता को पवित्र और सत्य सावित किया। माँ सीता ने अपने राज्य को कुश के हाथ में सौंप दिया और खुद धरती माँ के गर्भ में चली गयी। तभी से कुश को स्त्री न्याय कर्ता माना जाता है।

कुश (पीढ़ी६४)

श्री राम जी और माता सीता जी ने दो जुड़वे बच्चो को जन्म दिया जिनमे बड़ा कुश और छोटा लव था। कुश का राज्य दक्षिण कोसल में। कुश की राजधानी कुशावती आज के बिलासपुर जिले में थी। कोसला को राम की माता कौशल्या की जन्म भूमि माना जाता है। रघुवंश के अनुसार कुश को अयोध्या जाने के लिए विंध्याचल को पार करना पड़ता था इससे भी सिद्ध होता है कि उनका राज्य दक्षिण कोसल में ही था।

अतिथि (पीढ़ी६५),निषध (पीढ़ी६६),नभ (पीढ़ी६७),पुंडरीक (पीढ़ी ६८),क्षेमधन्वा (पीढ़ी६९),देवानोक (पीढ़ी७०),अहिनर (पीढ़ी७१),रूरू (पीढ़ी७२),पारिपात्र (पीढ़ी७३),दल (पीढ़ी७४),शिच्छल (पीढ़ी७५),उक्थ (पीढ़ी७६),वज्नाभ (पीढ़ी७७),संखनभ (पीढ़ी७८),व्युति्थताश्व (पीढ़ी७९),विश्वसह (पीढ़ी८०),हिरण्यनाभ (पीढ़ी ८१),पुष्प (पुष्य) (पीढ़ी८२),ध्रुवसन्धि (पीढ़ी८३),सुदर्शन (पीढ़ी८४),अग्निवर्णा (पीढ़ी८५),शीघ्र (पीढ़ी८६),मरू (पीढ़ी८७),प्रसुक्षुत (पीढ़ी८८),सुगविं (पीढ़ी८९),असपर् (अमर्ष) (पीढ़ी९०),महश्वान् (महास्वन) (पीढ़ी ९१),वितवान् (पीढ़ी९२ ),वृहद्ल (बृहदबल) (पीढ़ी ९३),वृहत्क्षगा (बृहत्क्षण) (पीढ़ी९४),गुरूक्षेप (पीढ़ी ९५),वत्स (पीढ़ी९६),वत्सव्यूह (पीढ़ी९७),प्रतिव्योम (पीढ़ी९८),दिवाकर (पीढ़ी९९),सहदेव (पीढ़ी१००),वृहदश्व (बृहदश्‍व) (पीढ़ी१०१),भानुरथ (पीढ़ी१०२),सुप्रतीक (पीढ़ी१०३),मरूदेव (पीढ़ी१०४),सुनक्षत्र (पीढ़ी१०५),किन्नर (पीढ़ी१०६),अंतरिक्ष (पीढ़ी १०७),सुवगी (सुवर्ण) (पीढ़ी १०८),अभिवरजित (अमित्रजित्) (पीढ़ी१०९),वृहदा्ज (पीढ़ी११०),धर्मी (पीढ़ी१११),कृंतुजय (कृतन्जय) (पीढ़ी११२),रगांजय (रणन्जय) (पीढ़ी११३),संजय (पीढ़ी११४),शाक्य (पीढ़ी११५),कुदो्दन (पीढ़ी११६),राहुल (पीढ़ी११७),प्रसेनजित् (पीढ़ी११८),क्षुद्क (पीढ़ी११९),कुडंक (पीढ़ी१२०),सुरथ (पीढ़ी१२१),सुमित्र (पीढ़ी १२२),कूर्म (पीढ़ी१२३),वत्सवोध (कच्छ) (पीढ़ी१२४),बुधसेन (पीढ़ी१२५),धर्मसेन (पीढ़ी१२६),घ्वजसेन(भजसेन)(पीढ़ी१२७),लोकसेन(पीढ़ी१२८),लक्ष्मीसेन(पीढ़ी१२९),रजसेन (पीढ़ी१३०),कामसेन (करमसेन) (पीढ़ी१३१),रविसेन (पीढ़ी१३२),कीर्तिसेन (पीढ़ी१३३),महासेन (पीढ़ी १३४),धर्मसेन (पीढ़ी१३५),अमरसेन (पीढ़ी१३६),अजसेन (पीढ़ी१३७),अमृतसेन (पीढ़ी१३८),इन्द्सेन (इंद्रसेन) (पीढ़ी१३९),राजमयी (पीढ़ी१४०),विजयमयी (पीढ़ी १४१),शिवमयी (स्योमई) (पीढ़ी १४२),देवमयी (पीढ़ी १४३),सिदि्मयी (पीढ़ी१४४),रेवामयी (पीढ़ी १४५),सिंधुमयी (पीढ़ी १४६),असंकुमयी (पीढ़ी१४७),श्याममयी (पीढ़ी१४८),मोहमयी(पीढ़ी१४९),धर्ममयी (पीढ़ी१५०),कर्ममयी (पीढ़ी१५१),राममयी (पीढ़ी१५२),सुरतिमयी(पीढ़ी१५३),शीलमयी(पीढ़ी१५४),शूरमयी(पीढ़ी१५५),शंकरमयी(पीढ़ी१५६),कृष्णामयी (पीढ़ी१५७),यशमयी (पीढ़ी१५८),गोतममयी (पीढ़ी१५९),नल (पीढ़ी१६०),ढोला (पीढ़ी१६१),लक्षमगा्राय (लक्ष्मण) (पीढ़ी१६२),राजभानु (राजाभाण) [नरवर से ग्वालियर गये] (पीढ़ी १६३),वज्धाम (वज्रदानम) (पीढ़ी१६४),मधुबृहा (मधुब्रह्म) (पीढ़ी१६५),मगंलराय (पीढ़ी १६६),विक्मराय (पीढ़ी१६७),अनगंपाल (पीढ़ी१६८),क्षीपाल(सूर्यपाल)(पीढ़ी१६९),सामंतपाल(सावन्तपाल)(पीढ़ी१७०),भीमपाल (पीढ़ी१७१),गगंपाल (पीढ़ी १७२),मंहतपाल (पीढ़ी१७३),महेन्दपाल (पीढ़ी१७४),राजपाल (पीढ़ी १७५),मदनपाल (पीढ़ी १७६),अनंतपाल(पीढ़ी१७७),वसंतपाल(पीढ़ी१७८),विजयपाल(पीढ़ी१७९),कामपाल(पीढ़ी१८०),बृहापाल(पीढ़ी१८१),विष्णुपाल (पीढ़ी१८२),धुधुंपाल (पीढ़ी१८३),कृष्णापाल (पीढ़ी१८४),लोहंगपाल (पीढ़ी१८५),भौमपाल (पीढ़ी१८६),अजयपाल (पीढ़ी १८७),अश्वपाल(पीढ़ी १८८),श्यामपाल (पीढ़ी १८९),अगंपाल (पीढ़ी १९०),पुहमपाल (पीढ़ी१९१),बंसतपाल (पीढ़ी १९२),हस्तपाल (पीढ़ी१९३),कामपाल (पीढ़ी१९४),चन्दपाल (पीढ़ी१९५),गोविंदपाल(पीढ़ी१९६),उदयपाल (पीढ़ी१९७),बगंपाल (पीढ़ी१९८),रगंपाल (पीढ़ी१९९),पुष्पपाल (पीढ़ी२००),हरिपाल(पीढ़ी २०१),अमरपाल (पीढ़ी२०२),छर्त्रपाल (पीढ़ी २०३),महीपाल (पीढ़ी२०४),सोनपाल (पीढ़ी२०५),धीरपाल(पीढ़ी२०६),सुंगधिपाल(पीढ़ी२०७),पद्मपाल(पीढ़ी२०८),रूदृपाल (पीढ़ी२०९),विष्णुपाल (पीढ़ी२१०),विनयपाल(पीढ़ी२११),अच्छुपाल(पीढ़ी२१२),भैरवपाल(पीढ़ी२१३),सहजपाल (पीढ़ी२१४),देवपाल (पीढ़ी२१५),त्रिलोचनपाल(पीढ़ी२१६),विलोचनपाल(पीढ़ी२१७),इसिकपाल(पीढ़ी२१८),क्षीपाल(पीढ़ी२१९),सुरतिपाल (पीढ़ी२२०),सुगनपाल (पीढ़ी२२१),अतिपाल (पीढ़ी २२२),मजुंपाल (पीढ़ी २२३),भोगेन्द्पाल (पीढ़ी २२४),भोजपाल(पीढ़ी२२५),रत्नपाल(पीढ़ी२२६),श्यामपाल(पीढ़ी २२७),हरिचन्द्पाल (पीढ़ी२२८),कृष्णापाल (पीढ़ी२२९),वीरचन्दपाल(पीढ़ी२३०),त्रिलोकपाल(पीढ़ी२३१),धनपाल(पीढ़ी२३२),मुनिपाल(पीढ़ी२३३),नखपाल(पीढ़ी२३४),प्रतापपाल(पीढ़ी२३५),धर्मपाल(पीढ़ी२३६),भुविपाल(पीढ़ी२३७),देशपाल (पीढ़ी २३८),परमपाल (पीढ़ी२३९),इदुंपाल (पीढ़ी२४०),गिरिपाल (पीढ़ी२४१),महीपाल (पीढ़ी२४२),कर्गापाल (पीढ़ी२४३),रूवर्गपाल (पीढ़ी२४४),अगृपाल(पीढ़ी२४५),शिवपाल(पीढ़ी२४६),मानपाल(पीढ़ी२४७),पाशर्वपाल(पीढ़ी२४८),वरचन्दपाल (पीढ़ी२४९),गुगापाल(पीढ़ी२५०),किशोरपाल(पीढ़ी२५१),गंभीरपाल(पीढ़ी२५२),तेजपाल (पीढ़ी२५३),सिद्पाल (पीढ़ी२५४),कान्हदेव (पीढ़ी २५५),देवानीक (पीढ़ी २५६),ईशदेव  (पीढ़ी २५७)

आमेर के प्राचीन राजा

महाराजा कुश के वंशजो की एक शाखा फिर बिहार के रोहताशगढ से चलकर पदमावती (ग्वालियर) मध्यप्रदेश मे आये। ईशदेव कछवाह का इतिहास इस प्रकार से था । ईशदेव कछवाह के पिता का नाम देवानीक कछवाह था। वंशावलियो में ईशदेव कछवाह का नाम ईस, ईसै, ईसा सिंह लिखा हुआ है  यहां वर्षो तक कुशवाह का शासन रहा। नरवर (ग्वालियर) राज्य के राजा ईशदेव कछवाह जी थे और राजा ईशदेव कछवाह जी के पुत्र सोढदेव कछवाह थे। कछवाह (कुशवाह) राजवंश की पहली कुलदेवी अम्बा माता थी जो ग्यारवी शताब्दी तक हमारी कुलदेवी थी कुलदेवी का मन्दिर ग्वालियर में हैं। "क" वंशावली में ईशदेव को नरवल और ग्वालियर का राजा माना है

"कछवाहों की वंशावली" पुस्तक की भूमिका में इतिहासकार श्री देवीसिंह जी महार ने बड़वों की पुरानी पोथियों में लिखित वास्तविक तथ्यों का उल्लेख करते हुए बताया की ग्वालियर के शासक ईसदेव कछवाह द्वारा राज्य ग्वालियर स्थिर राज होने की कामना से उन्होंने अपना राज्य भानजे जय सिंह तवर को व धन ब्राह्मणों को दे दिया था और वे स्वयं करौली व मध्यप्रदेश की सीमा पर स्थित नादरबाड़ी चले गए थे कालान्तर में वहीं पर उनका देहान्त हुआ।

 

सोढदेव(सोरा सिंह) 27 दिसंबर 966 - 15 दिसंबर 1006 (पीढ़ी २५८)

इस प्रकार से ईशदेव कछवाह से सोढदेव कछवाह हुए। ईशदेव कछवाह का देहावसान हुए पीछे संवत १०२३ में सोढदेव कछवाह जी उनके उत्तराधिकारी (उत्तराधिकारी) हुए जयपुर राज वंशावली पेज नंबर ५ में लिखा है की ईशदेव कछवाह जी  के मर जाने से उनके भांजे को संदेह हुआ की सोढदेव कछवाह जी ईशदेव कछवाह जी के दिए हुए राज्य को वापस छीनलेंगे अतः उन्होंने उनको कहा की आपके पिता ईशदेव कछवाह जी ने यह राज्य मुझे दिया था अब यदि आप इसे लेना चाहे तो ले लीजिये और नहीं चाहे तो दूसरी जगह चले जाये  धर्म का पालन करते हुए अपने पिता ईशदेव कछवाह जी के सकल्प को झूठा नहीं होने दिया और ग्वालियर में रहना उचित नहीं समझा और करौली की तरफ बरेली चले गए वहा जाकर अमेठी आदि को अपने अधिकार में किया वीर विनोद पेज नंबर ४५ में लिखा है की सोढदेव कछवाह  ने राज्य को दान किया और अन्य स्थान पर चले गए थे इसके बाद सोढदेव कछवाह का बेटा दुल्हराय कछवाह का विवाह राजस्थान में मोरागढ़ के शासक रालण सिंह चौहान की पुत्री से हुआ था। रालण सिंह चौहान के राज्य के पड़ौसी दौसा के बड़गुजर राजपूतों ने मोरागढ़ राज्य के पचास गांव अपने अधिकार में कर लिए थे। अत: उन्हें मुक्त कराने के लिए रालण सिंह चौहान ने अपने ब्याही सोढदेव कछवाह को सूचित किया कि हमारे नजदीक में ६ कोस पर दौसा है वह आधा हमारा है और आधा बड़गुजर का है यदि आप छाए तो हम अपने हिस्से के राज्य को आपको ही दे देंगे और बड़गुजर के हिस्से का युद्ध में आपको मदद  देकर दिला देंगे, फिर सोढदेव कछवाह जी ने बड़गुजर पर चढ़ाई करने के लिए अपने बेटे दुल्हेराय कछवाह को भेज दिया था

दुलहराय(ढोलाराय) 15 दिसंबर 1006 - 28 नवंबर 1036 (पीढ़ी २५९)

कछवाह वंश राजपूताना (राजस्थान) के इतिहास में बारहवीं शताब्दी से प्रकट हुआ था। दोनों की संयुक्त सेना ने दौसा पर आक्रमण कर बड़गुजर शासकों को मार भगाया। दौसा का राज्य मिलने के बाद दुल्हेराय कछवाह ने अपने पिता सोढदेव कछवाह को नरवर से दौसा बुला लिया इस प्रकार से ढूंढाड देश में कछवाह के प्रवेश का श्री गणेश था और सोढदेव कछवाह जी बरेली, अमेठी और रायपुर आदि राज्य अपने भाइयो को दे आये यही कारण है की बरेली, अमेठी  और रायपुर आदि में कछवाह का अब भी राज्य है और इनके वंशज वह निवास करते है  इतिहास राजस्थान पेज नंबर ७७ में लिखा है की सोढदेव कछवाह जी संवत १०२३ में दौसा की गद्दी पर बिराजे थे वीर विनोद पेज नंबर ४५  में लिखा है कि की सोढदेव कछवाह जी संवत १०२३ में दौसा की गद्दी पर बिराजे थे, मदन कोश पेज नंबर ६४ में लिखा है की दुल्हराय कछवाह (पीढ़ी 265) ने संवत १०२ ४ में दौसा राज्य की स्थापना की थी इस प्रकार राजस्थान में दुल्हेराय कछवाह जी ने सर्वप्रथम दौसा में कछवाह (कुशवाह) राज्य स्थापित कर अपनी राजधानी सर्वप्रथम दौसा स्थापित की। राजस्थान में कछवाह साम्राज्य की नींव डालने के बाद दुल्हेराय जी ने भांडारेज, मांच, गेटोर, झोटवाड़ा आदि स्थान जीत कर अपने राज्य का विस्तार किया। दौसा से इन्होने ढूंढाड क्षेत्र में मॉच गॉव पर अपना अधिकार किया जहॉ पर मीणा जाति का कब्जा था, मॉच (या मॉची) गॉव के पास ही कछवाह राजवंश के राजा दुलहराय कछवाह जी ने अपनी कुलदेवी श्री जमवाय माता जी का मंदिर बनबाया। कछवाह (कुशवाह) राजवंश की पहली कुलदेवी अम्बा माता थी उनका मन्दिर ग्वालियर में हैं कछवाह राजवंश के राजा दुलहराय जी ने अपने ईष्टदेव भगवान श्री रामचन्द्र जी तथा अपनी कुलदेवी श्री जमवाय माता जी के नाम पर उस मॉच (मॉची) गॉव का नाम बदल कर जमवारामगढ रखा। इसका इतिहास आगे दिया है इस वंश के प्रारम्भिक शासकों में दुल्हराय कछवाह बडे़ प्रभावशाली थे, जिन्होंने दौसा, रामगढ़, खोह, झोटवाड़ा, गेटोर तथा आमेर को अपने राज्य में सम्मिलित किया था। सोढदेव की मृत्यु व दुल्हेराय के गद्दी पर बैठने की तिथि माघ शुक्ला सप्तमी (वि.संवत ११५४) है I अधिकतर इतिहासकार दुल्हेराय कछवाह जी का राजस्थान में शासन काल ११५४ से ११८४ वि०सं० के मध्य मानते है I दौसा में पैर जमने के बाद दुल्हेराय कछवाह ने भांडारेज के मीणों को परास्त किया उसके बाद मांच के मीणाओं पर आक्रमण किया, पर मांच के मीणाओं के साथ संघर्ष में दुल्हेराय कछवाह की करारी हार हुई| दुल्हेराय कछवाह भी युद्ध में भयंकर रूप से घायल हो मूर्छित हो गए जिन्हें मरा समझ कर मीणा सैनिक युद्ध भूमि में छोड़ गए थे| पर मूर्छा से होश आते ही दुल्हेराय ने घायलावस्था में अपनी सेना का पुनर्गठन कर जीत का जश्न मनाते मीणाओं पर अचानक आक्रमण कर दिया| इस अप्रत्याशित आक्रमण में मीणा हार गए और दुल्हेराय ने मांच पर अधिकार कर मांच का नाम अपने पूर्वज राम के नाम व वहां अपनी कुलदेवी जमवाय माता की मूर्ति स्थापित कर “जमवा रामगढ़ नाम रख उसे अपनी राजधानी बनाया| मांच पर कब्ज़ा करने के बाद दुल्हेराय कछवाह ने बची हुई बड़गुजर शक्ति को खत्म करने के उदेश्य से बड़गुजरों के प्रमुख राज्य देवती पर आक्रमण कर उसे भी जीत लिया| देवती राज्य विजय से दुल्हेराय कछवाह को दो दुर्ग मिले| बड़गुजरों के खतरे को खत्म कर दुल्हेराय कछवाह ने फिर मीणा राज्यों को जीतने का अभियान शुरू किया और आलणसी मीणा शासक से खोह का राज्य जीता उसके बाद मीणा शासकों से ही गेटोर, झोटवाड़ा व आस-पास के अन्य छोटे राज्य जीते| आमेर के प्रमुख मीणा राज्य के अलावा लगभग मीणा राज्य जीतने के बाद दुल्हेराय कछवाह जी ने अपनी राजधानी जमवा रामगढ़ से खोह स्थांतरित कर खोह को अपनी राजधानी बनाया| मीणा जैसे बहादुर लड़ाकों को हराकर उनका राज्य छिनने से उनकी ख्याति सर्वत्र फ़ैल गई और उसी समय के लगभग दुल्हेराय कछवाह जी को ग्वालियर पर हुए किसी दुश्मन के हमले को नाकाम करने के लिए सहातार्थ बुलाया गया| ग्वालियर की रक्षार्थ लड़े गए युद्ध में हालाँकि विजय तो मिली लेकिन इस युद्ध में दुल्हेराय कछवाह जी गंभीर रूप से घायल हुए और इलाज के लिए फिर अपनी राजधानी खोह लौट आये|



जमवाय माता के मंदिर की स्थापना

दुल्हेराय कछवाह जी ने जब मांच के मीणाओं पर आक्रमण किया तब उस युद्ध में वे घायल हो मूर्छित हो गए थे और मीणाओं जैसी लड़ाका कौम के आगे बुरी तरह हार गए थे| युद्ध के मैदान में उनके मूर्छित होने पर मीणा सैनिक उन्हें मरा समझ छोड़ गए थे पर इतिहासकारों के अनुसार उन्हें मूर्छित अवस्था में उनकी कुलदेवी जमवाय माता ने दर्शन देकर पुन: युद्ध करने का आदेश और युद्ध में विजय होने का आशीर्वाद दिया| देवी के आशीर्वाद से तुरंत स्वस्थ होकर दुल्हेराय कछवाह जी ने अपनी सेना का पुनर्गठन कर अपनी विजय का उत्सव मनाते मीणाओं पर अचानक हमला किया और विजय हासिल की| इस तरह देवी के आशीर्वाद से हासिल हुई विजय के तुरंत के बाद दुल्हेराय कछवाह ने मांच में अपनी कुलदेवी जमवाय माता का मंदिर बनाकर वहां देवी की प्रतिमा स्थापित की जो आज भी मंदिर में स्थापित है|

राजस्थान में दौसा के आप-पास बड़गुजर राजपूतों व मीणा शासकों पतन कर उनके राज्य जीतने के बाद दुल्हेराय कछवाह जी ग्वालियर की सहायतार्थ युद्ध में गए थे जिसे जीतने के बाद वे गंभीर रूप से घायलावस्था में वापस आये और उन्ही घावों की वजह से माघ सुदी ७ वि.संवत ११९२, जनवरी २८ ११३५ ई. को उनका निधन हो गया और दुलहराय कछवाह जी (ढोलाराय) के 3 पुत्र हुये:- 01 - कॉकिलदेव कछवाह (काँखल जी, कांकल देव)  आमेर (जयपुर) के शासक थे। 02 - डेलण कछवाह जी,  03 - वीकलदेव कछवाह जी। उनके बड़े पुत्र कांकलदेव कछवाह खोह की गद्दी पर बैठे जिन्होंने आमेर के मीणा शासक को हराकर आमेर पर अधिकार कर अपनी राजधानी बनाया जो भारत की आजादी तक उनके वंशज के अधिकार में रहा|

नरवर (ग्वालियर) के पास का प्रदेश कच्छप प्रदेश कहलाता था।। और वहा के राजा ईशदेव के राजा सोढदेव (966-1006) नामक पुत्र हुआ। राजा सोढदेव (966-1006) के राजा दुलहराय जी (1006-1036) नामक पुत्र हुआ। दुलहराय जी के 3 पुत्र हुये:- 01 - राजा कॉकिलदेव जी(1036-1038), 02 - डेलण जी, 03 - वीकलदेव जी। दुलहराय जी (1006-1036) के पहले पुत्र (1) राजा कॉकिलदेव जी(1036-1038) (पीढ़ी 266) खोह की गद्दी पर बैठे और  वहा के मीणाओ से आमेर का किला छीनकर अपना नया राज्य स्थापित किया और आमेर पर अधिकार कर अपनी राजधानी बनाया। कॉकिलदेव (काँखल जी, कांकल देव) के पांच पुत्र हुए:-

01 - हुन देव

02 - गेलन जी

03 - रालण जी

04 - डेलण जी

05 - अलघराय जी

राजा दुलहराय जी (1006-1036) तीसरे बेटे (3) वीकलदेव जी ने चम्बल नदी के बीहडो से होते हुये मध्य प्रदेश के जिला भिण्ड में इंदुर्खी राज्य में अपनी राजधानी बनाई जो वहा का क्षेत्र जिला भिण्ड में कछवाहघार के नाम से जाना जाता है। राजा दुलहराय जी (1006-1036 के तीसरे पुत्र वीकलदेव जी के वंशज बीकलपोता कछवाह कहलाते हैं ।

राजा दुलहराय जी (1006-1036) के दूसरे बेटे (2) डेलण जी के वंशज डेलणोत कछवाह कहलाते हैं । डेलण जी राजा सोढदेव जी के पोते (पौत्र) व राजा ईशदेव जी के पड़पौते (पड़पौत्र) थे। राजा दुलहराय जी के द्वितीय पुत्र डेलण जी “लाहर का मुख्य ठिकाना था, डेलणोत कछवाहोँ का लाहर मुख्य ठिकाना था ।[लाहर वर्तमान भारत देश के, राज्य मध्यप्रदेश के जिले भिंड की एक तहसील है] क्षत्रियों के प्रसिद्ध 36 राजवंशों में से डेलणोत (देलणोत) कछवाह सुयवंशी क्षत्रियों की प्रमुख कछवाह शाखा की खाप है

डेलणोत (देलणोत) कछवाह और बीकलपोता कछवाह

{राजा दुलहराय जी (1006-1036) (पीढ़ी 265) दूसरे बेटे (2) डेलण जी के वंशज डेलणोत कछवाह कहलाते हैं। और तीसरे पुत्र वीकलदेव जी के वंशज बीकलपोता कछवाह कहलाते हैं

झामावत कछवाह

दुलहराय जी (1006-1036) (पीढ़ी 265) के पहले पुत्र (1) राजा कॉकिलदेव जी (1036-1038) (पीढ़ी 266) खोह की गद्दी पर बैठे और वहा के मीणाओ से आमेर का किला छीनकर अपना नया राज्य स्थापित किया और आमेर पर अधिकार कर अपनी राजधानी बनाया। और राजा कॉकिलदेव जी (1036-1038) (पीढ़ी 266) के पाचवे बेटे (5) अलघराय जी और अलघराय जी के पुत्र झामा जी के वंशज झामावत कछवाह कहलाते हैं।

गेलनोत कछवाह

दुलहराय जी (1006-1036) (पीढ़ी 265) के पहले पुत्र (1) राजा कॉकिलदेव जी (1036-1038) (पीढ़ी 266) खोह की गद्दी पर बैठे और वहा के मीणाओ से आमेर का किला छीनकर अपना नया राज्य स्थापित किया और आमेर पर अधिकार कर अपनी राजधानी बनाया। और राजा कॉकिलदेव जी (1036-1038) (पीढ़ी 266) के पाचवे बेटे (5) अलघराय जी और अलघराय जी के पुत्र गेलन जी के वंशज गेलनोत कछवाह कहलाते हैं । क्षत्रियों के प्रसिद्ध 36 राजवंशों में से गेलनोत कछवाह (कुशवाहा) सुयवंशी क्षत्रियों की प्रमुख कछवाह शाखा की खाप है

रालणोत कछवाह

दुलहराय जी (1006-1036) (पीढ़ी 265) के पहले पुत्र (1) राजा कॉकिलदेव जी (1036-1038) (पीढ़ी 266) खोह की गद्दी पर बैठे और वहा के मीणाओ से आमेर का किला छीनकर अपना नया राज्य स्थापित किया और आमेर पर अधिकार कर अपनी राजधानी बनाया। और राजा कॉकिलदेव जी (1036-1038) (पीढ़ी 266) के तीसरे बेटे (3) रालणजी के वंशज रालणोत कछवाह कहलाते हैं । क्षत्रियों के प्रसिद्ध 36 राजवंशों में से गेलनोत कछवाह (कुशवाहा) सुयवंशी क्षत्रियों की प्रमुख कछवाह शाखा की खाप है

डोलणपोता या डाँगी कछवाह

दुलहराय जी (1006-1036) के पहले पुत्र (1) राजा कॉकिलदेव जी (1036-1038) (पीढ़ी 266) खोह की गद्दी पर बैठे और वहा के मीणाओ से आमेर का किला छीनकर अपना नया राज्य स्थापित किया और आमेर पर अधिकार कर अपनी राजधानी बनाया। और राजा कॉकिलदेव जी (1036-1038) (पीढ़ी 266) के चौथे बेटे (4) डेलण जी के बैजनाथ से डोलणपोता या डाँगी कछवाह वंशज कहलाते हैं। जो झारखंण्ड में बैजनाथ के पास रहतें हैं

[ध्यानदेँ.... राजा दुलहराय के पुत्र का नाम भी ...... डेलण जी है जो इससे अलग है किसी भी वंश और पिढी मेँ नाम तो मिलते रहते है। राजा दुलहराय जी (1006-1036) (पीढ़ी 265) दूसरे बेटे (2) डेलण जी के वंशज डेलणोत कछवाह कहलाते हैं। और तीसरे पुत्र वीकलदेव जी के वंशज बीकलपोता कछवाह कहलाते हैं ]

[ध्यानदेँ.... डेलणोत (देलणोत) कछवाह व डेलनणपोता कछवाह (डाँगी कछवाह) दोनों शाखाएँ नाम व पढने एक समान जैसी लगती है मगर ये दोनों अलग-अलग हैं पहली शाखा सिर्फ -----

डेलणोत कछवाह है मगर दूसरी शाखा के साथ -----+पोता शब्द जुड़ा हुवा है जिसका अर्थ है कि परिवारिक रिस्ते में ईनके पौते है।]

 कॉकिलदेव (काँखल जी, कांकल देव) (1036-1038) (पीढ़ी २६०)

कॉकिलदेव कछवाह (काँखल जी, कांकल देव) - (1036-38) आमेर (जयपुर) के शासक थे। कॉकिलदेव कछवाह (काँखल जी, कांकल देव) के पांच पुत्र हुए:- 01 - अलघराय कछवाह जी, 02 - गेलन कछवाह जी, 03 - रालण कछवाह जी, 04 - डेलण कछवाह जी, 05 - हुन देव कछवाह | ग्वालियर के युध में दुल्हेराय कछवाह जी के साथ गये हुए बहुत से वीर मारे गए थे  जिस कारण कांकल देव कछवाह जी के सैनिक शक्ति थोड़ी सी कम रह गयी  और ये देख कर मीणा लोगों ने दुल्हेराय कछवाह जी दारा कायम किये हुए राज्य का बहुत सा हिस्सा हड़प लिया परन्तु वीर कांकल देव कछवाह जी ने अपने बढ़े हुए बल के प्रभाव से मीणा जाति का बहुत नुकसान किया और बहुत सारे मीणा लोगो को मार भगाया और उनके दबाये राज्य से भी दुगना राज्य वापिस लिया फिर कांकल देव कछवाह जी ने खोह के बदले आमेर को अपनी राजधानी बनाई और कांकल देव कछवाह जी ने जमवाय माता के हुकूम से मीणो को मार कर अमिबकापुर (आमेर) की नीव डाली।

हुनदेव (हरगूदेव) (1038-1053) (पीढ़ी२६१)

जान्हडदेव (जान्ददेव) (1053-1070) (पीढ़ी२६२)

पंञ्जावन  कछवाह (पाजून, पज्जूणा) (1070-1084) (पीढ़ी२६३)

आमेर नरेश पंजवन देव कछवाह जी एक महान धनुर्धर एवम पराक्रमी योद्धा

पंजवन देव कछवाह जी सम्राट पृथ्वीराज चौहान राजपूत के अहम सहयोगी थे। इनका विवाह पृथ्वीराज चौहान के काका कान्ह की पुत्री पदारथ दे के साथ हुआ।

(यहां प्रश्न उठता है कि लोग किस आधार पर पृथ्वीराज चौहान राजपूत को गुर्जर बता रहे है जबकि इनके वैवाहिक संबंध आमेर के कच्छवाहा राजपूतों के साथ रहा )

पजवन देव कछवाह जी ने स्वयं के नेतृत्व में  कुल 64 युद्ध जीते थे। प्रारंभिक रूप से भोले राव पर विजय प्राप्त की , (राजा भीम सोलंकी गुजरात का राजा था इसे भोला भीम का जाता था) ।

पृथ्वीराज चौहान राजपूत ने इन्हें  बाद में नागौर भेजा। पृथ्वीराज चौहान राजपूत और गोरी के बीच लड़े गए अधिकतर युद्धों में नेतृत्व इन्होंने ही किया। जब गोरी से प्रथम बार सामना हुए तब  मुस्लिम सेना की संख्या 3 लाख के करीब थी। परंतु पजवन कछवाह जी के पास केवल 5000 सैनिकों की फौज थी। इसलिए पंजवन कछवाह जी के लोगो ने अरज किया कि-

"अपने पास सेना बहुत कम है और गौरी के पास बहुत अधिक है इसलिए युद्ध मत करो, वापिस चलो।" तब पंजवन जी कछवाहा ने कहा कि-

 " पृथ्वीराज को जाकर क्या कहेंगे। फिर भी जिसको घर प्यारा है वो युद्धक्षेत्र से जाओ अर्थात जिसे अपने प्राण प्यारे है वो अपने घर चले जाओ मैं तो युद्ध करूंगा।

तुम सब मुह पर मूंछ रखते हो या घास बढ़ा रखी है। तुम सब हिम्मत हार गए हो इसलिए अपने घर जाओ।" इतना सुनते ही सभी सरदार बोले-

 महाराज आपके बिना हम कहा जाए हम आपके साथ ही रहकर युद्ध करेंगे।

तभी गौरी से युद्ध प्रारम्भ हुए और मात्र 5000 की फौज के साथ उसकी 300000 की सेना को परास्त किया। गौरी को कैद कर के नागौर के किले में ले गए उसके बाद उसे दिल्ली ले जाकर दंडित कर के छोड़ दिया।

गहैत गौरी शाह कै, भाजी सेना ओर।

आयो वाह लिया तब, फिर कुरम नागौर ।।

अर्थात :- आमेर नरेश पंजवन जी कछवाहा द्वारा गौरी को कैद करने पर मुस्लिम सेना युद्ध क्षेत्र से भाग गई। युद्ध मे विजय होकर कुरम (पंजवन जी कछवाहा) नागौर आये तब उनकी चारो और वाह वाह हो रही थी।

गौरी को कैद करके पंजवन देव जी कछवाहा जब दिल्ली गए तो पृथ्वीराज चौहान राजपूत स्वयं सामने से आकर उनको सम्मान के साथ दरबार मे लेकर गए और वहां उनका बहुत बड़ा सम्मान किया। बाद में काबुल की तरफ पठानो ने माथा उठाया अर्थात पृथ्वीराज चौहान राजपूत के सीमांत क्षेत्र में उपद्रव करने लगे तब आमेर नरेश पंजवन देव जी कछवाहा को काबुल भेजा। वहां पठानो ने खैबर घाटी रोक दी। आमेर नरेश पंजवन देव जी कच्छावा ने  पठानो पर हमला किया और वहां अधिकार जमाया। वही गौरी से दूसरा युद्ध हुवा एवं उसमें विजय प्राप्त की।

आई समर सकेत मैं, पीड़ करि पज्जोन।

गोरी सम-गोरी अनी, गई लजत भजि भोन ।।

अर्थात :- सेनाएं समर भूमि में आकर आमने सामने हुई। तब आमेर नरेश पंजवन कछवाहा जी ऐसा पराक्रम दिखाया कि गोरी शाह को सेना का नाश कर दिया। गोरी स्त्री के समान लज्जित हुवा एवं उसकी सेना भी भाग गई। बाद में पृथ्वीराज चौहान ने बुलाया और कन्नौज ओर चढ़ाई की। सयोंगीता ने पृथ्वीराज चौहान का वरण किया था एवं पृथ्वीराज चौहान ने फिर कन्नौज की ओर चढ़ाई कर के उसका अपहरण किया। तब आमेर नरेश पंजवन देव जी भी पृथ्वीराज चौहान  के साथ थे। कन्नौज में जयचंद के साथ युद्ध हुआ। जयचंद की तरफ से अजमत खा पठान युद्ध करने आया था। उसके पास 60000 अश्वरोही सेना थी। पठान अजमत ख़ाँ हाथी पर सवार था , आमेर नरेश पंजवन देव जी कछवाहा ने हाथी को पकड़ उसके दांत उखाड़ डाले।

उसकी सारी फ़ौज को रणखेत किया।  लेकिन आमेर नरेश पंजवन देव जी कछवाहा भी कन्नौज के पास इस युद्ध मे वीरगति को प्राप्त हुए।

जब इनकी वीरगति की खबर दिल्ली में पृथ्वीराज चौहान के पास पहुंची तो पृथ्वीराज चौहान ने इनके सम्मान में कुछ यूं कहा :-

आजे भिधाता ढिलडी आज ढूँढाड़ अनथ ।

आज अदिन प्रथिराज आज सावंत बिन मथ।।

आज पुहप बिन वास आज मरजाद अलंघिय।

आज असुर दल परक आज निज दल तजि संघिय।।

हिंदवाण ढाल भाग्यो भरम, अपछरा आय उचकियो।

पंजवन सुरग जीतै थकां, चंग चंग घरत कियो।

अर्थात :- आमेर नरेश पंजवन जी कछवाहा की मृत्यु पर आज दिल्ली विधवा की सी उदासी धारण किये हुए दिखने लगी है। मानो वह विधवा हो गई है। ढूंढाड़ प्रदेश उनकी मृत्यु से अनाथ हो गया है। सम्राट पृथ्वीराज चौहान राजपूत के आज बुरे दिन का उदय हुआ है। सामन्तों का मस्तक शिरोमणि आमेर नरेश पंजवन जी कछवाहा आज नही रहा। आमेर नरेश पंजवन जी कछवाहा की मृत्यु से दूसरे सामन्त अपने आपको मस्तक विहीन मानने लगे है। आज पुष्प बिना सुगन्ध का हो गया है। आज मर्यादा (न्याय -व्यवस्था) भंग हो चुकी है। आज से शत्रु सेना में उत्साह और निज सेना में निराशा व्याप्त हो गयी है। तुर्को के दल के प्रवाह को रोकने वाला अब कोई नही रहा। हिन्दू धर्म की ढाल अब समाप्त हो गयी है। अब दुश्मनों का भृम दूर हो गया है। अप्सराएं युद्ध भूमि में उचक उचक कर देख रही है। वे पंजवन देव का वरण करना चाहती है। आमेर नरेश पंजवन जी कछवाहा के जीते जी मैने जगह जगह कितनी ही लड़ाइयां लड़ी है जीती है।

 

प्रधान कछवाह

राजा पंञ्जावन (पाजून, पज्जूणा) (1070-1084) (पीढ़ी 269) के अन्य पुत्र भींवसिँह और लखनसिँह दोनों के पुत्रों का वंशज प्रधान कछवाह कहलाते हैं।

राजा पंञ्जावन (पाजून, पज्जूणा) (1070-1084) के पुत्र राजा मलैसी (1084-1146).

मलैसी (1084-1146) (पीढ़ी२६४)

जैतलपोता (जीतलपोता) कछवाह

राजा पंञ्जावन (पाजून, पज्जूणा) (1070-1084) के पुत्र राजा मलैसी (1084-1146) और राजा मलैसी (1084-1146) के अन्य पुत्र जैतल जी (जीतल जी) के वंशज जैतलपोता (जीतलपोता) कछवाह कहलाते हैं।

बयालदेव (1146-1179) (पीढ़ी २६५)

राव बयालजी (बालोजी) अपने पिता मलैसी के बाद दौसा का आठवाँ राजा बना

राजा मलैसी, जिण मलैसीरै रांणी मेलणदे खीवण, अनळ, खीचीरी बेटी ।

जिण पिहरसूं खंथडि़या प्रोहित गुर आंणिया । पैहली गांगावत था सो दूर किया ।

मलैसीरा बेठा बालोजी, जिण खेत्रपाळ जीतो । सात तवा वेधिया ।...

जैतल, जिण आपरा मांसरी बोटी काट तिणसूं आपरै साहिब ऊपर बैठी ग्रीधण उड़ाई ।

मलैसी देव के बहुत से पुत्र थे मगर हमें इनमें से सात का तो हर जगह ब्योरा मिल जाता है बाकी पर इतीहास अपनी चुपी नहीं तोड़ता है । मगर हम जागा और जातीगत ईतीहास लिखने वाले बही-भीटों की बही के प्रमाण एंव समाज के बुजुर्गो की जुबान पर जायें तो पता चलता है राजा मलैसी देव कि सन्तानोँ मेँ शुद् रजपुती खुन दो पुत्रोँ मेँ था राव बयालजी (बालोजी) व जैतलजी में। राव बयालजी (बालोजी) व जैतलजी के अलावा बकी पाँच ने कसी कारण वंश दूसरी जाती की लड़की से शादी की जीससे एक अलग- अलग जातीयाँ निकली। मलैसी देव ने राजपूत खानदान से बाहर अन्य खानदान एंव अन्य जातीयों में शादीयाँ करी थी इन सब अन्य जातीयों से पुत्र -:

       तोलाजी - टाक दर्जी छींपा

       बाघाजी - रावत बनिया

       भाण जी - डाई गुजर

       नरसी जी - निठारवाल जाट

       रतना जी - सोली सुनार,आमेरा नाई

उपरोंक्त ये सभी अपने व्यवसाय में लग गये जिनकी आज एक अलग जाती बन गयी है

राजदेव (1179-1216) (पीढ़ी २६६)

सावंतपोता कछवाह

राजा राजदेव कछवाह जी (1179-1216) में जन्म लिया और राजा राजदेव कछवाह जी दौसा का नौँवा राजा बना जिसका कार्यकाल (1179-1216) तक चला। राजा देव जी के दस पुत्र थे -: 01 - बीजलदेव कछवाह जी, 02 - राजा किलहनदेव कछवाह जी, 03 - साँवतसिँह कछवाह जी, 05 - सिहा कछवाह जी,  06 - बिकसी कछवाह जी [ बिकासिँह जी, बिकसिँह जी विक्रमसी ], 07 - पाला जी कछवाह जी (पिला जी),08 - भोजराज कछवाह जी , 09 - राजघरजी [राढरजी], 10 - दशरथ कछवाह जी। और राजा राजदेव कछवाह जी के तीसरे (3) पुत्र साँवतसिँह के वंशज सावंतपोता कछवाह कहलाते है।

पीलावत कछवाह

राजा राजदेव कछवाह जी दौसा का नौँवा राजा बना जिसका कार्यकाल (1179-1216) तक चला। राजा देव जी के दस पुत्र थे -: 01 - बीजलदेव कछवाह जी, 02 - राजा किलहनदेव कछवाह जी, 03 - साँवतसिँह कछवाह जी, 05 - सिहा कछवाह जी,  06 - बिकसी कछवाह जी [ बिकासिँह जी, बिकसिँह जी विक्रमसी ], 07 - पाला जी कछवाह जी (पिला जी),08 - भोजराज कछवाह जी , 09 - राजघरजी [राढरजी], 10 - दशरथ कछवाह जी। और राजा राजदेव कछवाह जी के सातवे (7) पुत्र पाला जी कछवाह जी (पिला जी) के वंशज पीलावत कछवाह कहलाते है। और पाला जी कछवाह जी (पिला जी) बेटे खिवराज कछवाह जी के वंशज खिँवावत कछवाह कहलाते है।

खिँवावत कछवाह

राजा राजदेव कछवाह जी दौसा का नौँवा राजा बना जिसका कार्यकाल (1179-1216) तक चला। राजा देव जी के दस पुत्र थे -: 01 - बीजलदेव कछवाह जी, 02 - राजा किलहनदेव कछवाह जी, 03 - साँवतसिँह कछवाह जी, 05 - सिहा कछवाह जी,  06 - बिकसी कछवाह जी [ बिकासिँह जी, बिकसिँह जी विक्रमसी ], 07 - पाला जी कछवाह जी (पिला जी),08 - भोजराज कछवाह जी , 09 - राजघरजी [राढरजी], 10 - दशरथ कछवाह जी। और राजा राजदेव कछवाह जी के सातवे (7) पुत्र पाला जी कछवाह जी (पिला जी) के वंशज पीलावत कछवाह कहलाते है। और पाला जी कछवाह जी (पिला जी) बेटे खिवराज कछवाह जी के वंशज खिँवावत कछवाह कहलाते है।

सियापोता (सल्यानपोता) कछवाह

राजा राजदेव कछवाह जी (1179-1216) में जन्म लिया और राजा राजदेव कछवाह जी दौसा का नौँवा राजा बना जिसका कार्यकाल (1179-1216) तक चला। राजा देव जी के दस पुत्र थे -: 01 - बीजलदेव कछवाह जी, 02 - राजा किलहनदेव कछवाह जी, 03 - साँवतसिँह कछवाह जी, 05 - सिहा कछवाह जी, 06 - बिकसी कछवाह जी [ बिकासिँह जी, बिकसिँह जी विक्रमसी ], 07 - पाला जी कछवाह जी (पिला जी),08 - भोजराज कछवाह जी , 09 - राजघरजी [राढरजी], 10 - दशरथ कछवाह जी। और राजा राजदेव कछवाह जी के पाचवे (5) पुत्र सिहा जी कछवाह जी के वंशज सियापोता (सल्यानपोता) कछवाह कहलाते है।

बिकासीपोता कछवाह (बिकमपोता कछवाह)

राजा राजदेव कछवाह जी (1179-1216) (पीढ़ी 272) में जन्म लिया और राजा राजदेव कछवाह जी दौसा का नौँवा राजा बना जिसका कार्यकाल (1179-1216) तक चला। राजा देव जी के दस पुत्र थे -: 01 - बीजलदेव कछवाह जी, 02 - राजा किलहनदेव कछवाह जी, 03 - साँवतसिँह कछवाह जी, 05 - सिहा कछवाह जी, 06 - बिकसी कछवाह जी [बिकासिँह जी, बिकसिँह जी विक्रमसी], 07 - पाला जी कछवाह जी (पिला जी),08 - भोजराज कछवाह जी , 09 - राजघरजी [राढरजी], 10 - दशरथ कछवाह जी। और राजा राजदेव कछवाह जी के छठे बेटे (6) पुत्र बिकसी कछवाह जी [बिकासिँह जी, बिकसिँह जी विक्रमसी] के वंशज बिकासीपोता कछवाह (बिकमपोता कछवाह)  कहलाते है।} इन कि कई खाँपेँ (उपकुल) हैँ।

भोजराजपोता (राढरका) कछवाह

राजा राजदेव कछवाह जी (1179-1216) (पीढ़ी 272) में जन्म लिया और राजा राजदेव कछवाह जी दौसा का नौँवा राजा बना जिसका कार्यकाल (1179-1216) तक चला। राजा देव जी के दस पुत्र थे -: 01 - बीजलदेव कछवाह जी, 02 - राजा किलहनदेव कछवाह जी, 03 - साँवतसिँह कछवाह जी, 05 - सिहा कछवाह जी, 06 - बिकसी कछवाह जी [ बिकासिँह जी, बिकसिँह जी विक्रमसी], 07 - पाला जी कछवाह जी (पिला जी),08 - भोजराज कछवाह जी , 09 - राजघरजी [राढरजी], 10 - दशरथ कछवाह जी। और राजा राजदेव कछवाह जी के आठवे (8) पुत्र भोजराज कछवाह जी  के भोजराजपोता (राढरका) कछवाह वंशज कहलाते है।} भोजराज कछवाह जी के वंसजो की बारह तिड़ है, यानि इनकी बारह शाखाएं व आठ उप शाखाएं है जिन्हें भोजराज कछवाह जी का बीसा भी कहा जाता है, बहुत से लोग इन बीस खांपों को अलग अलग स्वतंत्र शाखाओं के रूप में भी लिखते हैं

[01 - गढ़ का कछवाह - भोजराज कछवाह के पुत्र खिँवराज कछवाह जी (खींवसिंह) के वंसज जो गढ़ में रहते थे, गढ़ का कछवाह कहलाते है। खिँवराज कछवाह जी, राजा किलहन देवजी (कील्हणदेव,खिलन्देव)) के पुत्र थे। गढ़ का कछवाह की एक उप शाखा भी है - बांबी का कछवाह - गढ़ का कछवाह की एक उप शाखा बांबी का कछवाह भी है 02 - चित्तौड़ी का कछवाह - चित्तौड़ी नमक गांव में रहने से यह नाम पड़ा 03 - बीकावत कछवाह - बिकावत कछवाह [बिकसी का कछवाह या कपूर का कछवाह] - राजा राजदेवजी (1179-1216) के पुत्र बिकसी (बीकाजी, बिकसिँह, बिक्रमसिँहजी) के वंशज बिकसी का कछवाह या कपूर का कछवाह

कहलाते है। कपूर नामक गांव में रहने से इन को कपूर का कछवाह के नाम से भी जाना जाता है। बिकावत कछवाह की एक उप शाखा बिकासीपोता कछवाह (बिकमपोता कछवाह) है। बीकावत कछवाह की एक तिड़ (उपशाखा) इस प्रकार है -

 (01) - बिकासीपोता कछवाह (बिकमपोता कछवाह) - बिकसी (बिकसिँह जी,बिक्रमसिँहजी) के पुत्रों के वंसज बिकासीपोता कछवाह (बिकमपोता कछवाह) कहलाते है।

04 - रायघर का कछवाह (राढर का कछवाह) - राजा राजदेवजी कछवाह (1179-1216) के पुत्र राजघरजी कछवाह [राढरजी] के वंसज राजघरजी का कछवाह (राढर का कछवाह) कहलाते है। राजा राजदेवजी कछवाह (1179-1216) (पीढ़ी 272) के पुत्र राजघरजी कछवाह को राढरजी व रायघरजी के नमो से भी पुकारा जाता था, जिसके कारन कंही कंही इनको रायघर का कछवाह भी कहलाते है।

05 - सवंतसिंहपोता (सावंतपोता कछवाह, सवंतसिंघपोता कछवाह) - भोजराज कछवाह के पुत्र सांवतसिंह कछवाह के वंसज

06 - सोमेंसरपोता कछवाह - भोजराज कछवाह के पुत्र सोमेसर कछवाह जी के पुत्रों के वंसज, सोमेंसरपोता कछवाह की दो तिड़ (उपशाखा) इस प्रकार है -

(01) - भरिपोता कछवाह - भरिसिंह कछवाह के वंसज

(02) - राणावत कछवाह - राणा जी कछवाह के वंसज

07 - कपूर का कछवाह (कपूरिया) - राजदेव कछवाह(1179-1216) के पुत्र बीकसी कछवाह (बिकसिँह जी,बिक्रमसिँहजी), बीकसी (बिकसिँह जी,बिक्रमसिँहजी) के पुत्र कपूरजी कछवाह, कपूरजी कछवाह के वंसज कपूर का कछवाह (कपूरिया) जिन का शासन कादेड़ा (काघेड़ा), पलवा आदी। कपूर का कछवाह (कपूरिया) की तीन तिड़ (उपशाखा) इस प्रकार है –

(01) - कादेड़ा (काघेड़ा) का कछवाह - कपूर का कछवाह (कपूरिया) की एक साख कादेड़ा (काघेड़ा) है जो इस कादेड़ा (काघेड़ा) नाम के इस गांव में बसने से यह नाम पड़ा ।

(02) - बीकसी का का कछवाह - राजा राजदेवजी कछवाह के पुत्र बिकसी कछवाह (बिकसिँह जी,बिक्रमसिँहजी) के वंशज बिकसी का कछवाह या कपूर का कछवाह कहलाते है। कपूर नामक गांव में रहने से इन को कपूर का कछवाह के नाम से भी जाना जाता है।

(03) - बिकासीपोता कछवाह (बिकमपोता कछवाह) -राजदेव कछवाह (1179-1216) के पुत्र बीकसी कछवाह (बिकसिँह जी,बिक्रमसिँहजी) बिकसी (बिकसिँह जी,बिक्रमसिँहजी) के पुत्रों के वंसज बिकासीपोता कछवाह (बिकमपोता कछवाह) कहलाते है।

08 - सिहंण का कछवाह - राजा राजदेव जी कछवाह  (1179-1216) के पुत्र सिहा जी कछवाह (सिहंण जी) के वंशज सिहंण का कछवाह कहलाते है। सिहंण का कछवाहों की उपशाखा के रूप में सिहा जी(सिहंण जी) के बेटों के वंसज (सियापोता, सल्यानपोता कछवाह) कछवाह कहलाते है।

09 - खियावत कछवाह (खिँवावत कछवाह) – खिवराज कछवाह जी के वंशज खिँवावत कछवाह कहलाते है। खिवराज कछवाह जी राजा राजदेवजी कछवाह (1179-1216) का पोता था। पला कछवाह जी (बालाजी) के पुत्र खींवराज कछवाह जी के वंसज, पला कछवाह जी को बालाजी कछवाह कहकर भी पुकारते थे। पला जी कछवाह (बालाजी) राजा राजदेवजी कछवाह के पुत्र थे।

महाराजा सवाई सिंह जी के समय किसी कारण से इन को भाटो की बही से अलग करा दिया। [खिँवावत कछवाह व खिँवराजपोता कछवाह में भेद या स्पष्टीकरण.......ध्यान रहे की राजा राजदेव जी के पुत्र पला जी (बालाजी) के पुत्र का नाम खींवराज जी था तथा राजा राजदेव जी के एक दूसरे पुत्र राजा किलहन देवजी (कील्हणदेव,खिलन्देव) के पुत्र का नाम भी खिँवराज जी (खींवसिंह) था यानि राजा राजदेव जी के एक पोते,खींवराज जी [खिँवराज जी (खींवसिंह) राजा किलहन देवजी (कील्हणदेव,खिलन्देव) के पुत्र] के वंसज खिँवराजपोता कछवाह कहलाते है। ]

10 - दशरथपोता कछवाह - राजा राजदेवजी कछवाह(1179-1216) के पुत्र दशरथजी कछवाह के बेटों के वंशजों को दशरथपोता कछवाह कहते हैं।

11 - राजघर का कछवाह - राजा राजदेव कछवाह जी (1179-1216) के पुत्र राजघरजी कछवाह के वंसज राजघर का कछवाह कहते हैं।

12 - सावंतपोता कछवाह - राजा राजदेव कछवाह जी (1179-1216) के पुत्र साँवतसिँह कछवाह के वंशज सावंतपोता कछवाह कहलाते है।]

खिँवराजपोता कछवाह

राजा राजदेव कछवाह जी (1179-1216) में जन्म लिया और राजा राजदेव कछवाह जी दौसा का नौँवा राजा बना जिसका कार्यकाल (1179-1216) तक चला। राजा देव जी के दस पुत्र थे -: 01 - बीजलदेव कछवाह जी, 02 - राजा किलहनदेव कछवाह जी, 03 - साँवतसिँह कछवाह जी, 05 - सिहा कछवाह जी,  06 - बिकसी कछवाह जी [ बिकासिँह जी, बिकसिँह जी विक्रमसी ], 07 - पाला जी कछवाह जी (पिला जी),08 - भोजराज कछवाह जी , 09 - राजघरजी [राढरजी], 10 - दशरथ कछवाह जी। और राजा राजदेव कछवाह जी के दूसरे नंबर के बेटे राजा किलहनदेव कछवाह जी (1216-1276) से वंश आगे चला। और राजा किलहनदेव कछवाह जी (1216-1276) के  पुत्र  खिँवराज जी (खींवसिंह) के वंशज खिँवराजपोता कछवाह कहलाते है। [खिँवावत कछवाह व खिँवराजपोता कछवाह में भेद या स्पष्टीकरण.......ध्यान रहे की राजा राजदेव कछवाह जी के पुत्र पला कछवाह जी (बालाजी) के पुत्र का नाम खींवराज कछवाह जी था तथा राजा राजदेव कछवाह जी के एक दूसरे पुत्र राजा किलहन देवजी कछवाह (कील्हणदेव,खिलन्देव) के पुत्र का नाम भी खिँवराज जी कछवाह (खींवसिंह) था यानि राजा राजदेव कछवाह जी के एक पोते,खींवराज कछवाह जी [खिँवराज जी (खींवसिंह) राजा किलहन देवजी कछवाह (कील्हणदेव,खिलन्देव) के पुत्र] के वंसज खिँवराजपोता कछवाह कहलाते है।

तालचीर के कछवाहा

राजा बयालदेव (1146-1179) में जन्म लिया और राजदेव कछवाह जी (1179-1216) में जन्म लिया राजा राजदेव जी दौसा का नौँवा राजा बना जिसका कार्यकाल 1179 -1216 तक। राजा राजदेव जी के चार पुत्र थे  01 – बीजलदेव,  02 - किलहनदेव जी, 03 – साँवतसिँह, 04 – पालाजी। राजा राजदेव जी (1179-1216) के पहले बेटे बीजलदेव हुए और फिर बीजलदेव के तीन पुत्र हुए।

            01 - बाघाजी (बीजलदेव के पुत्र)

            02 - भोलाजी (बीजलदेव के पुत्र)

            03 - नारोजी (बीजलदेव के पुत्र)

बीजल देवजी के तीनों पुत्र बाघाजी, भोलाजी, नारोजी तालचीर उड़ीसा मेँ कटक के पास तालचीर चले गये थे तथा वहीँ आबाद हो गये थे। इन तीनो भाईयोँ ने उङिसा मेँ कटक के पास नई राजधानी तालचीर बनायी थी और वहाँ शासन किया। इन तीनो भाईयोँ के वंशज तालचीर के कछवाहा कहलाते है।

आलणोत जोगी

राजा बयालदेव (1146-1179) में जन्म लिया और राजदेव कछवाह जी (1179-1216) (पीढ़ी 272) में जन्म लिया राजा राजदेव जी दौसा का नौँवा राजा बना जिसका कार्यकाल 1179 -1216 तक। राजा राजदेव जी के चार पुत्र थे 01 – बीजलदेव,  02 - किलहनदेव जी, 03 – साँवतसिँह, 04 – पालाजी। राजा राजदेव कछवाह जी (1179-1216) (पीढ़ी 272) के दूसरे वाले बेटे के राजा किलहनदेव जी (1216-1276) (पीढ़ी 273) थे और राजा किलहनदेव जी (1216-1276) के बेटे राजा कुंतल (1276-1317) (पीढ़ी 274) हुए राजा कुंतल (1276-1317) के अलणजी नामक पुत्र हुआ। राजा कुंतलदेव जी (1276-1317) के पुत्र अलण जी को जोगी जी भी कहा जाता था। इसलिए उनके वंसज आलणोत (जोगी) कछवाह कहलातें है।

 

किलहनदेव जी (1216-1276) (पीढ़ी २६७)

बधवाड़ा कछवाह

राजा किलहनदेव कछवाह जी (1216-1276) में जन्म लिया और इनके बेटे राजा कुंतल कछवाह (1276-1317) में जन्म लिया और राजा कुन्तलदेव कछवाह 1276 से 1317 तक  आमेर (जयपुर) के शासक थे। राजा कुन्तलदेव जी के ग्यारह पुत्र थे -: 01 - राजा जूगा्सी कछवाह (जुणसी, जानसी, जोणसी, जसीदेव)  02 - हमीर कछवाह जी (हम्मीर देव जी), 03 - नापा कछवाह जी, 04 - मेहपा कछवाह जी, 05 - सरवन कछवाह जी, 06 - ट्यूनगया कछवाह जी,07 - सूजा कछवाह जी, 08 - भडासी कछवाह जी, 09 - जीतमल कछवाह जी,10 - खींवराज कछवाह जी, 11 - बधावा कछवाह जी। और राजा जूगा्सी कछवाह (जुणसी, जानसी, जोणसी, जसीदेव) (1317-1366) से वंश आगे चला।

 

बधवाड़ा कछवाह के वंशज का निर्माण राजा कुंतल कछवाह (1276-1317) के (11) बेटे बधवा जी नें जन्म लिया और राजा कुंतल कछवाह (1276-1317) (पीढी 274) के (11) पुत्र बधवा कछवाह जी के वंशज बधवाड़ा कछवाह कहलाते है।

जसेरपोता कछवाह (जसरापोता कछवाह)

जसेरपोता कछवाह (जसरापोता कछवाह) के वंशज का निर्माण राजा किलहनदेव कछवाह जी (1216-1276) के अन्य बेटे जसराज कछवाह जी नें जन्म लिया और राजा किलहनदेव कछवाह जी (1216-1276) के अन्य पुत्र जसराज कछवाह जी के वंशज जसेरपोता कछवाह (जसरापोता कछवाह) कहलाते है।

हमीरदे का कछवाह

राजा किलहनदेव कछवाह जी (1216-1276) में जन्म लिया और इनके बेटे राजा कुंतल कछवाह (1276-1317) में जन्म लिया और राजा कुन्तलदेव कछवाह 1276 से 1317 तक  आमेर (जयपुर) के शासक थे। राजा कुन्तलदेव जी के ग्यारह पुत्र थे -: 01 - राजा जूगा्सी कछवाह (जुणसी, जानसी, जोणसी, जसीदेव)  02 - हमीर कछवाह जी (हम्मीर देव जी), 03 - नापा कछवाह जी, 04 - मेहपा कछवाह जी, 05 - सरवन कछवाह जी, 06 - ट्यूनगया कछवाह जी,07 - सूजा कछवाह जी, 08 - भडासी कछवाह जी, 09 - जीतमल कछवाह जी,10 - खींवराज कछवाह जी, 11 - बधावा कछवाह जी। और राजा जूगा्सी कछवाह (जुणसी, जानसी, जोणसी, जसीदेव) (1317-1366) से वंश आगे चला।

हामीरदेका कछवाह के वंशज का निर्माण राजा कुंतल कछवाह (1276-1317) (पीढी 274) के बेटे (02) हमीर कछवाह जी (हम्मीर देव जी) नें जन्म लिया और राजा कुंतल कछवाह (1276-1317) (पीढी 274) के (02)पुत्र हमीर कछवाह जी (हम्मीर देव जी) के वंशज हामीरदेका कछवाह कहलाते है।

कुंतल (1276-1317) (पीढ़ी २६८)

राजा कुन्तलदेव कछवाह जी के ग्यारह पुत्र थे -: 01 - बधावा कछवाह जी, 02 - हमीर कछवाह जी (हम्मीर देव जी), 03 - नापा कछवाह जी, 04 - मेहपा कछवाह जी, 05 - सरवन कछवाह जी, 06 - ट्यूनगया कछवाह जी, 07 - सूजा कछवाह जी, 08 - भडासी कछवाह जी, 09 - जीतमल कछवाह जी, 10 - खींवराज कछवाह जी,11 - जोणसी कछवाह (जुणसी, जानसी, जसीदेव)।

मेहपाणी कछवाह

मेहपाणी कछवाह के वंशज का निर्माण राजा कुंतल कछवाह (1276-1317) के तीसरे बेटे (3) नापा कछवाह जी और चौथे बेटे (4) मेहपा कछवाह जी नें जन्म लिया और राजा कुंतल कछवाह (1276-1317) के तीसरे बेटे (3) नापा कछवाह जी और चौथे बेटे (4) मेहपा कछवाह जी के वंशज मेहपाणी कछवाह कहलाते है।

भाखरोत कछवाहा

भाखरोत कछवाहा के वंशज का निर्माण राजा कुंतल कछवाह (1276-1317) (पीढी 274) के आठवे बेटे (8) बधावा कछवाह जी नें जन्म लिया और राजा कुंतल कछवाह (1276-1317) के आठवे बेटे (8) बधावा कछवाह जी के वंशज भाखरोत कछवाहा कहलाते है।

सरवनपोता कछवाह

सरवनपोता कछवाह के वंशज का निर्माण राजा कुंतल कछवाह (1276-1317) के पाचवे बेटे (5) सरवन कछवाह जी नें जन्म लिया और राजा कुंतल कछवाह (1276-1317) के पाचवे बेटे (5) सरवन कछवाह जी के वंशज सरवनपोता कछवाह कहलाते है।

नापावत कछवाह

नापावत कछवाह के वंशज का निर्माण राजा कुंतल कछवाह (1276-1317) के तीसरे बेटे (3) नापा कछवाह जी नें जन्म लिया और राजा कुंतल कछवाह (1276-1317) (पीढी 274) के तीसरे बेटे (3) नापा कछवाह जी के वंशज नापावत कछवाह कहलाते है।

टून्गया कछवाह

टून्गयाजी (तुग्याजी) के वंशज का निर्माण राजा कुंतल कछवाह (1276-1317) के छठे बेटे (6) टून्गयाजी (तुग्याजी) कछवाह जी नें जन्म लिया और राजा कुंतल कछवाह (1276-1317) (पीढी 274) के छठे बेटे (6) टून्गयाजी (तुग्याजी) कछवाह जी के वंशज टून्गया कछवाह कहलाते है।

सुजावत कछवाह

सुजावत कछवाह के वंशज का निर्माण राजा कुंतल कछवाह (1276-1317) के सातवे बेटे (7) सुजा जी कछवाह जी नें जन्म लिया और राजा कुंतल कछवाह (1276-1317) (पीढी 274) के सातवे बेटे (7) सुजा जी कछवाह जी के वंशज सुजावत कछवाह कहलाते है।

धीरावत कछवाह

राजा कुंतल कछवाह (1276-1317) (पीढी 274) के (10) पुत्र खींवराज कछवाह जी के पुत्र धीरा कछवाह जी (धिरोजी, धीराजी) के वंशज धीरावत कछवाह कहलाते है। धीरा कछवाह जी (धिरोजी, धीराजी), राजा कुन्तलदेव कछवाह जी के पौत्र थे।

जूगा्सी(जुणसी, जानसी, जसीदेव) (1317-1366) (पीढ़ी २६९)

आमेर के 13 वें शासक राजा जुणसी देव कछवाह के चार पुत्र थे -: 01 - जसकरण कछवाह जी, 02 - उदयकरण कछवाह जी, 03 - कुम्भा कछवाह जी, 04 - सिंघा कछवाह जी।  

उग्रावत कछवाह

राजा जूगा्सी कछवाह (जुणसी, जानसी, जोणसी, जसीदेव) (1317-1366) में जन्म लिया और इनके पहले पुत्र (1) जसकरण कछवाहा जी के पुत्र उग्र जी के वंशज उग्रावत कछवाह कहलाये है।

सोमेश्वरपोता कछवाह

राजा किलहनदेव कछवाह जी (1216-1276) के पुत्र "सोमेश्वर जी व उनके बेटों के वंसज सोमेश्वरपोता कछवाह कहलाये हैं। राणावत, बघावत, चित्तोड़िका आदि भी इनकी अन्य उप शाखाएं है।

सिँगदे (सिंघदे) कछवाह

राजा जूगा्सी कछवाह (जुणसी, जानसी, जोणसी, जसीदेव) (1317-1366) (पीढी 275) में जन्म लिया और इनके चौथे बेटे (4) सिंघा कछवाहा जी के वंसज सिँगदे (सिंघदे) कछवाह कहलाते है।

कुम्भाणी (कुम्भांनी) कछवाह

राजा जूगा्सी कछवाह (जुणसी, जानसी, जोणसी, जसीदेव) (1317-1366) में जन्म लिया और इनके तीसरे बेटे (3) कुम्भा कछवाहा जी के वंसज कुम्भाणी (कुम्भांनी) कछवाह कहलाते है। भांडारेज पर कछवाहों की कुम्भाणी उपशाखा का अधिकार रहा। ये कुम्भाणी आमेर के 13 वें शासक जूणसी कछवाह के वंशज थे। भांडारेज के दीपसिंह कछवाह कुम्भाणी सवाई जयसिंह कछवाह के सामंत और सेनानायक थे।

राजा उदयकरण कछवाह जी 6 नवंबर 1366-11 फरवरी 1388 (पीढ़ी २७०)

उदयकरण कछवाह जी राजा जुणसी कछवाह जी के दूसरे पुत्र थे। राजा उदयकरण कछवाह आमेर के तीसरे राजा थे जिनका शासनकाल 6 नवंबर 1366 से 11 फरवरी 1388 में रहा है। राजा उदयकरण कछवाह जी की म्रत्यु 1388 में हुयी थी । उदयकरण कछवाह जी के आठ पुत्र थे:-

01 - राजा राव नर सिंह कछवाह (आमेर के राजा, 1388-1413) (इनके वंशज आगे चलकर आमेर जयपुर पर राज किया और अनेक खाप निर्माण भी किया। जिनमे से  पिचानोत कछवाह, जगमालोत - खगालोत कछवाह, डोगरा राजवंश एवं जम्मू और कश्मीर राजघराने, बालभदरोत कछवाह, साईंदासोत कछवाह, चतुर्भुजोत कछवाह, नाथावत कछवाह, राजावत कछवाह, सुलतानोत (सुलतानोता) कछवाह, रामसिंगहोत कछवाह, प्रतापपोता कछवाह, कल्याणोत कछवाह, भिकावत कछवाह, पूरणमलोत कछवाह, रुपसिंगहोत कछवाह, बणवीरपोता कछवाह)

02 - राव बरसिंह कछवाह (इनके वंशज आगे चलकर नरुका कछवाह कहलाये)

03 - राव बालाजी कछवाह  (इनके वंशज आगे चलकर शेखावत कछवाह कहलाये)

04 - राव शिवब्रह्म कछवाह (श्योब्रह्मपोता कछवाह खाप निर्माण)

05 - राव पातालजी कछवाह (पातलपोता कछवाह  खाप निर्माण)

06 - राव पीपाजी कछवाह

07 - राव पीथलजी कछवाह

08 - राव नापाजी कछवाह

राजा उदयकरण कछवाह के आठ पुत्र हुए, उनमे से पहले पुत्र (1) राव नर सिंह कछवाहा जी जो आमेर के राजा बने, उनके वंशज में राजा बनबीर सिंह कछवाह जी ने जन्म लिया, फिर राजा उदयकरण कछवाह जी के दूसरे बेटे (2 ) राव बर सिंह कछवाह जी बरवाडे गए, उनके वंशज मेराज सिंह कछवाह जी के पुत्र नरु कछवाह जी के वंशज नरुका कछवाह कहलाये।, फिर राजा उदयकरण कछवाह जी के तीसरे बेटे (3) राव बाला सिंह कछवाह जी बरवाडे गए और इनके वंशज में आगे चलकर शेखा कछवाह जी ने जन्म लिया और शेखा कछवाह जी के वंशज शेखावत कहलाये और शेखा कछवाह जी ने शेखावाटी राज्य बनाया फिर राजा उदयकरण कछवाह जी के चौथे बेटे (4) राव शिवब्रह्म सिंह कछवाह जी, फिर राजा उदयकरण कछवाह जी के पाचवे बेटे (5) राव पाताल सिंह कछवाह जी, छठे बेटे (6 ) राव पीपा सिंह कछवाह जी, सातवे बेटे (7 ) राव पीथल सिंह कछवाह जी और आठवे बेटे (8) राव  नापा सिंह कछवाह जी हुए।

राजा उदयकरण कछवाह के आठ पुत्रों मेसे एक आगे आमेर का राजा बना और चार नयी खापों का निर्माण हुआ। दो खाप नरूका और शेखावत को बाद में अलग से राज्य मिला और उन्होंने अलवर, शेखावाटी पर शासन किया।

(1) नरुका कछवाह

राजा उदयकरण कछवाह के दूसरे नंबर के बेटे राव बर सिंह कछवाह जी हुए इनके वंशज में आगे चलकर जी बरवाडे गए, उनके वंशज मेराज सिंह कछवाह जी के पुत्र नरु कछवाह जी के वंशज नरुका कछवाह कहलाये। बरसिंह कछवाह जी के पुत्र मेराज कछवाह जी ने आमेर पर अधिकार कर लिया था, लेकिन इसका अधिकार अधिक समय तक नहीं रह सका। मेराज कछवाह जी ने माहाण तालाब का निर्माण करवाया। मेराज कछवाह जी के पुत्र नरु कछवाह जी ने भी कुछ समय तक आमेर को अपने अधिकर में रखा, लेकिन आमेर के राजा चन्द्रसेन कछवाह जी ने नरु कछवाह जी को आमेर से मार भगाया। अत: वह निराश होकर अपनी जागीर मौजाबाद में चला गया। नरु बड़ा प्रतापी राजा था, जिससे नरुवंश का प्रार्दुभाव हुआ। नरु के वंश नरुका नाम से पुकारे जाने लगे। मेराज कछवाह जी, राजा बरसिँह कछवाह जी

नरुका कछवाहोँ की कई उप शाखाएँ हैं जो इस प्रकार हैं:-

दासावत नरुका - दासासिंह (दासा) के वंशज ।

लालावत नरुका - लालासिंह (राब लाला, लाला, लालावत) के वंशज।

तेजावत नरुका - तेजसिंह (तेजा) के वंशज।

जेतावत नरुका - जेतसिंह (जेता) के वंशज।

रतनावत नरुका - दासासिंह (दासा) के पुत्र रतनसिंह (रतन जी) के वंशज।

अलवर राज्य का संस्थापक प्रतापसिंह था जो आमेर नरेश महाराज उदयकर्ण के दूसरे पुत्र बरसिंह की 15 वीं पीढ़ी में था। अलवर के राजा कछवाहा के राजवंश की लालावत नरुका की शाखा से सम्बन्धित थे। बरसिंह के पुत्र  मेराज ने आमेर पर अधिकार कर लिया था, लेकिन इसका अधिकार अधिक समय तक नहीं रह सका। मेराज ने माहाण तालाब का निर्माण करवाया। मेराज के पुत्र नरु ने भी कुछ समय तक आमेर को अपने अधिकर में रखा, लेकिन आमेर के राजा चन्द्र सेन ने नरु को आमेर से मार भगाया। अत: वह निराश होकर अपनी जागीर मौजाबाद में चला गया। नरु बड़ा प्रतापी राजा था, जिससे नरुका कछवाह (नरुवंश का) प्रार्दुभाव हुआ। नरु के वंशज नरुका नाम से पुकारे जाने लगे। नरु के पाँच पुत्र थे :- 01 - लालासिंह (राब लाला, लाला, लालावत), 02 - दासासिंह (दासा), 03 - तेजसिंह (तेजा),04 - जेतसिंह (जेता), 05 - रतनसिंह (रतन जी)।

(01) लालासिंह (राब लाला, लाला, लालावत) - लालासिंह (राब लाला, लाला, लालावत) के वंशज जो लालावत नरुका कहलाते थे, अलवर राज्य के शासक थे। लालासिंह (लाला, लालावत) जो कि नरु का बड़ा पुत्र था। उसने अपने पिता की इच्छा को ध्यान में रखते हुए आमेर पर फिर से अधिकार करने से मना कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि उसके पिता नरु ने उसे कमजोर समझा और उसने अपने दूसरे नम्बर के पुत्र दासासिंह (दासा) को बहादुर एवं वीर समझते हुए, मौजाबाद का स्वामी बना दिया तथा लालासिंह (राब लाला, लाला, लालावत) को केवल 12 गाँवों सहित झाक का जागीरदार बना दिया।

चूँकि लालासिंह (राब लाला, लाला, लालावत) कछवाहा वंश के आमेर के राजा भारमल से कोई झगड़ा नहीं करना चाहता था, तब इसका पता भारमल को लगा तो लालासिंह (राब लाला, लाला, लालावत) से बहुत खुश हुआ और प्रसन्न होकर लालासिंह (राब लाला, लाला, लालावत) को राव का खिताब और निशान दिया। (02) दासासिंह (दासा) - दासा के वंशज दासावत नरुका कहलाते थे और ये दासावत नरुका जयपुर के उनियारा, वाला व अलवर में जावली गढ़ो में निवास करते थे। (03) तेजसिंह (तेजा) - जिसके वंशज तेजावत नरुका कहलाये, जो जयपुर व अलवर में हादीहेड़ा में निवास करते थे।

(04) जेतसिंह (जेता) - इसके वंश जेतावत नरुका कहलाते थे। ये गोविन्दगढ़ तथा पीपलखेड़ा में निवास करते थे। उदयसिंह - लालासिंह (लाला, लालावत) का बेटा उदयसिंह राजा भारमल की हरावल फौज का अफसर गिना जाता था। लाड़सिंह उदयसिंह के पुत्र थे। लाड़सिंह - उदयसिंह के पुत्र लाड़सिंह जिसकी गिनती आमेर के मिर्जा राजा मानसिंह के बड़े-बड़े सरदारों में की जाती थी लाड़सिंह का पुत्र फतेहसिंह था। फतेहसिंह के चार पुत्र थे। 01 - कल्याण सिंह, 02 - कर्ण सिंह, 03 - अक्षय सिंह,  04 - रणछोड़दास। कल्याण सिंह - फतेहसिंह का पुत्र कल्याण सिंह पहला व्यक्ति था, जिसने प्रथम बार अलवर के इलाके को विजित किया। कल्याण सिंह ने मिर्जा राजा जयसिंह के पुत्र कीर्ति सिंह के साथ कामा के विद्रोह का दमन किया। इस पर आमेर के नरेश रामसिंह ने कल्याण सिंह की सेवाओं से प्रसन्न होकर माचेड़ी गाँव जागीर में दे दिया। जिससे राजगढ़ माचेड़ी व आधा राजपुर यानि कुल मिलाकर ढ़ाई गाँव की जागीर रामसिंह ने कल्याण सिंह को 25 दिसम्बर 1671 को प्रदान की। कल्याण सिंह के 6 पुत्र थे। जिनमें से पाँच जीवित रहे। 01 - उग्रसिंह - माचेड़ी पर जागीरदार थे।,02 - श्यामसिंह - पारा में जागीरदार थे।, 03 - जोधसिंह - पाई में जागीरदार थे।, 04 - अमरसिंह - खोरा में जागीरदार थे।, 05 - ईश्वरी सिंह - चालवा में जागीरदार रहे।, इन पाँचों के पास कुल 84 घोड़े की जागीर थी। तेजसिंह - उग्रसिंह के बाद तेजसिंह गद्दी पर बैठा। तेजसिंह, कल्याण सिंह के पोते थे। तेजसिंह के दो पुत्र थे:- 01 - जोखारसिंह - बड़ा पुत्र जोखारसिंह माचेड़ी गांव का पाटवी सरदार बना। 02 - जालिमसिंह - दूसरा पुत्र जालिमसिंह जिसको बीजावाड़ गांव की जागीर मिली।, जोरावर सिंह की मृत्यु के बाद हाथी सिंह व मुकुन्द सिंह माचेड़ी के जागीरदार बने। मोहब्बत सिंह - हाथी सिंह व मुकुन्द सिंह के बाद जोरावर सिंह का पुत्र मोहब्बत सिंह सन् 1735 में माचेड़ी की गद्दी पर बैठा। मोहब्बत सिंह के तीन रानियाँ थी। प्रताप सिंह - 1 जून, 1740 रविवार को मौहब्बत सिंह की रानि बख्त कवार ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम प्रताप सिंह रखा गया। इसके पश्चात् सन् 1756 में मौहब्बत सिंह बखाड़े के युद्ध में जयपुर राज्य की ओर से लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ। राजगढ़ में उसकी विशाल छतरी बनी हुई है। वर्तमान में राजगढ़ भारत के राज्य राजस्थान के अलवर जिले का एक नगरपालिका क्षेत्र एवं नगर है। मौहब्बत सिंह की मृत्यु के बाद उसके पुत्र प्रतापसिंह ने 25 दिसम्बर, 1775 ई. को अलवर राज्य की स्थापना की। जमालपुर में भगवान श्री राम और रामचरितमानस की पांडुलिपि सहित अन्य महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध है पूर्व जागीरदार ठाकुर शिवराम सिंह जी थे

रतनावत कछवाह

राजा उदयकरण कछवाह (1366-1388) के दूसरे बेटे (2) राव बर सिंह कछवाह जी के पुत्र मेराज कछवाहा जी (मेहराज) और मेराज कछवाहा जी (मेहराज) कछवाहा जी के पुत्र नरु कछवाह जी (नरुका कछवाह कहलाते है।) और नरु कछवाह जी (नरुका कछवाह कहलाते है।) के पुत्र दासासिंह कछवाहा (दासा) और दासासिंह कछवाहा (दासा) के पुत्र रतनसिंह कछवाहा (रतन जी) के वंशज रतनावत कछवाह कहलाते है। दासासिंह कछवाहा (दासा) के पुत्र रतनसिंह कछवाहा (रतन जी) के वंशज रतनावत कछवाह कहलाते है। दासासिंह कछवाहा (दासा) नरु कछवाह जी (नरुका) के पुत्र थे हाँ वही नरु कछवाह जी जिनसे नरुका कछवाह वंस चला है। हम यूँ भी कह सकतें हैं  की रतनावत कछवाह नरुका कछवाहों की ही उप शाखा है। प्राचीन अलवर राज्य (जो वर्तमान मेँ राजस्थान का एक जिला है) मेँ रतनावातों के पाँच मुख्य ठिकाने थे मेहरू, निमेड़ा, खेर, तीलांजू, केरवालिया ।

वर्तमान में ये पाँचो स्थान भारत देश के राजस्थान राज्य के जिले टोंक, जयपुर, अलवर में है।

01 - मेहरू [Mehru]- वर्तमान में भारत देश के राजस्थान राज्य के जिले टोंक में है।

02 - निमेड़ा Nimera]- वर्तमान में भारत देश के राजस्थान राज्य के जिले जयपुर की फागी तहसील में है।

03 - खेर [Khera]- वर्तमान में भारत देश के राजस्थान राज्य के जिले अलवर में है।

04 - तिलांजु [Tilanju]- वर्तमान में भारत देश के राजस्थान राज्य के जिले टोंक में है।

05  - केरवालिया [Kerwaliya] वर्तमान में भारत देश के राजस्थान राज्य के जिले बारां में है।

रतनावत कछवाह, नरुका कछवाह की ही उप शाखा है।

[ध्यान रहे … यह कछवाहोँ की उप शाखा रतनावत नरुका, रतनावत शेखावत कछवाह खांप से बिलकुल अलग है।] रतनावत कछवाह व रतनावत शेखावत कछवाह में भेद या अन्तर? कुछ लोग रतनावत कछवाह व रतनावत शेखावत कछवाह को एक ही समझ लेतें हैं क्यों की दोनों में पीढ़ी व वसाजों का नाम संयोग से एक जैसा ही है

 

(2) शेखावत कछवाह

राजा उदयकरण कछवाह जी के आठ बेटों मेसे हुई है जिनमे राजा उदयकरण कछवाह जी के तीसरे बेटे राव बाला सिंह कछवाह जी का जन्म हुआ और वे बरवाडे गए और इनके वंशज में आगे चलकर शेखा कछवाह जी ने जन्म लिया और शेखा कछवाह जी के वंशज शेखावत कहलाये और शेखा कछवाह जी ने शेखावाटी राज्य बनाया शेखावत कछवाहा  वंश की एक शाखा है राव बाला सिंह कछवाह जी के पुत्र मोकल कछवाह जी हुए और मोकल कछवाह जी के पुत्र महान योधा शेखावाटी व शेखावत वंश के प्रवर्तक महाराव शेखा कछवाह जी का जनम वि.सं. 1490 में हुवा | वि. सं. 1502 में मोकल कछवाह जी के निधन के बाद राव शेखा कछवाह जी बरवाडा व नान के 24 गावों के स्वामी बने | राव शेखाजी ने अपने साहस वीरता व सेनिक संगठन से अपने आस पास के गावों पर धावे मारकर अपने छोटे से राज्य को 360 गावों के राज्य में बदल दिया | राव शेखाजी ने नान के पास अमरसर बसा कर उसे अपनी राजधानी बनाया और शिखर गढ़ का निर्माण किया राव शेखाजी के वंशज उनके नाम पर शेखावत कछवाहा कहलाये जिनमे अनेकानेक वीर योधा, कला प्रेमी व स्वतंत्रता सेनानी हुए

शेखावत वंश की शाखाएँ- 1. शेखावत वंश की शाखाएँ,1.1 टकनॆत शॆखावत,1.2 रतनावत शेखावत,1.3 मिलकपुरिया शेखावत,1.4 खेज्डोलिया शेखावत,1.5 सातलपोता शेखावत,1.6 रायमलोत शेखावत,1.7 तेजसी के शेखावत,1.8 सहसमल्जी का शेखावत,1.9 जगमाल जी का शेखावत,1.10 सुजावत शेखावत,1.11 लुनावत शेखावत,1.12 उग्रसेन जी का शेखावत,1.13 रायसलोत शेखावत,1.13.1 लाड्खानी,1.13.2 रावजी का शेखावत,1.13.3 ताजखानी शेखावत,1.13.4 परसरामजी का शेखावत,1.13.5 हरिरामजी का शेखावत,1.13.6 गिरधर जी का शेखावत,1.13.7 भोजराज जी का शेखावत,1.14 गोपाल जी का शेखावत,1.15 भेरू जी का शेखावत,1.16 चांदापोता शेखावत

शेखा जी पुत्रो व वंशजो के कई शाखाओं का प्रदुर्भाव हुआ जो निम्न है |

रतनावत शेखावत - महाराव शेखाजी के दुसरे पुत्र रतना जी के वंशज रतनावत शेखावत कहलाये इनका स्वामित्व बैराठ के पास प्रागपुर व पावठा पर था! हरियाणा के सतनाली के पास का इलाका रतनावातों का चालीसा कहा जाता है

मिलकपुरिया शेखावत - शेखा जी के पुत्र आभाजी,पुरन्जी,अचलजी के वंशज ग्राम मिलकपुर में रहने के कारण मिलकपुरिया शेखावत कहलाये इनके गावं बाढा की ढाणी, पलथाना ,सिश्याँ,देव गावं,दोरादास,कोलिडा,नारी,व श्री गंगानगर के पास मेघसर है !

खेज्डोलिया शेखावत - शेखा जी के पुत्र रिदमल जी वंशज खेजडोली गावं में बसने के कारण खेज्डोलिया शेखावत कहलाये, आलसर,भोजासर छोटा,भूमा छोटा,बेरी,पबाना,किरडोली,बिरमी,रोलसाहब्सर,गोविन्दपुरा,रोरू बड़ी,जोख,धोद,रोयल आदि इनके गावं है !

बाघावत शेखावत - शेखाजी के पुत्र भारमल जी के बड़े पुत्र बाघा जी वंशज बाघावत शेखावत कहलाते है! इनके गावं जय पहाड़ी,ढाकास, गरडवा,बिजोली,राजपर,प्रिथिसर,खंडवा,रोल आदि है !

सातलपोता शेखावत - शेखाजी के पुत्र कुम्भाजी के वंशज सातलपोता शेखावत कहलाते है

रायमलोत शेखावत - शेखाजी के सबसे छोटे पुत्र रायमल जी के वंशज रायमलोत शेखावत कहलाते है ।

तेजसी के शेखावत - रायमल जी पुत्र तेज सिंह के वंशज तेजसी के शेखावत कहलाते है ये अलवर जिले के नारायणपुर,गाड़ी मामुर और बान्सुर के परगने में के और गावौं में आबाद है !

सहसमल्जी का शेखावत - रायमल जी के पुत्र सहसमल जी के वंशज सहसमल जी का शेखावत कहलाते है! इनकी जागीर में सांईवाड़ थी!

जगमाल जी का शेखावत - जगमाल जी रायमलोत के वंशज जगमालजी का शेखावत कहलाते है! इनकी १२ गावों की जागीर हमीरपुर थी जहाँ ये आबाद है

सुजावत शेखावत - सूजा रायमलोत के पुत्र सुजावत शेखावत कहलाये! सुजाजी रायमल जी के ज्यैष्ठ पुत्र थे जो अमरसर के राजा बने!

लुनावत शेखावत - लुन्करण जी सुजावत के वंशज लुन्करण जी का शेखावत कहलाते है इन्हें लुनावत शेखावत भी कहते है, इनकी भी कई शाखाएं है!

उग्रसेन जी का शेखावत - अचल्दास का शेखावत, सावलदास जी का शेखावत, मनोहर दासोत शेखावत आदि!

रायसलोत शेखावत - लाम्याँ की छोटीसी जागीर से खंडेला व रेवासा का स्वतंत्र राज्य स्थापित करने वाले राजा रायसल दरबारी के वंशज रायसलोत शेखावत कहलाये! राजा रायसल के १२ पुत्रों में से सात प्रशाखाओं का विकास हुवा जो इस प्रकार है -

लाड्खानी - राजा रायसल जी के जेस्ठ पुत्र लाल सिंह जी के वंशज लाड्खानी कहलाते है दान्तारामगढ़ के पास ये कई गावों में आबाद है यह क्षेत्र माधो मंडल के नाम से भी प्रशिध है पूर्व उप राष्ट्रपति श्री भैरों सिंह जी इसी वंश से है!

रावजी का शेखावत - राजा रायसल जी के पुत्र तिर्मल जी के वंशज रावजी का शेखावत कहलाते है! इनका राज्य सीकर, फतेहपुर, लछमनगढ़ आदि पर था!

ताजखानी शेखावत - राजा रायसल जी के पुत्र तेजसिंह के वंशज कहलाते है इनके गावं चावंङिया,भोदेसर ,छाजुसर आदि है

परसरामजी का शेखावत - राजा रायसल जी के पुत्र परसरामजी के वंशज परसरामजी का शेखावत कहलाते है!

हरिरामजी का शेखावत - हरिरामजी रायसलोत के वंशज हरिरामजी का शेखावत कहलाये!

गिरधर जी का शेखावत - राजा गिरधर दास राजा रायसलजी के बाद खंडेला के राजा बने इनके वंशज गिरधर जी का शेखावत कहलाये, जागीर समाप्ति से पहले खंडेला,रानोली,खूड,दांता आदि ठिकाने इनके आधीन थे !

भोजराज जी का शेखावत - राजा रायसल के पुत्र और उदयपुरवाटी के स्वामी भोजराज के वंशज भोजराज जी का शेखावत कहलाते है ये भी दो उपशाखाओं के नाम से जाने जाते है, १-शार्दुल सिंह का शेखावत, २-सलेदी सिंह का शेखावत

गोपाल जी का शेखावत - गोपालजी सुजावत के वंशज गोपालजी का शेखावत कहलाते है |

भेरू जी का शेखावत - भेरू जी सुजावत के वंशज भेरू जी का शेखावत कहलाते है |

चांदापोता शेखावत - चांदाजी सुजावत के वंशज के वंशज चांदापोता शेखावत कहलाये ।

जीतावत कछवाह

राजा उदयकरण कछवाह (1366-1388) के तीसरे बेटे (3) राव बाला सिंह कछवाह जी और राव बाला सिंह कछवाह जी के बेटे डूँगरसिँह कछवाह जी और डूँगरसिँह कछवाह जी के बेटे जीता कछवाह जी के वंशज जीतावत कछवाह कहलाते है।

सागाँनी (सांगावत) कछवाह

राजा उदयकरण कछवाह (1366-1388) के तीसरे बेटे (3) राव बाला सिंह कछवाह जी और राव शेखाजी के वंशज उनके नाम पर शेखावत कछवाहा कहलाये। राव बाला सिंह कछवाह जी के बेटे सांगा कछवाह जी उर्फ़ सारंगदेव कछवाह जी के वंशज सागाँनी (सांगावत) कछवाह कहलाते है।

(3) श्योब्रह्मपोता कछवाह

राजा उदयकरण कछवाह (1366-1388) के चौथे पुत्र शिवब्रह्म जी के वंशज श्योब्रह्मपोता कछवाह कहलाते है। जो कछवाहोँ की बारह कोटङी मेँ शामिल है।

(4) पातलपोता कछवाह

राजा उदयकरण कछवाह (1366-1388) (पीढ़ी 276) के पाँचवे पुत्र पातल कछवाह जी के वंशज पातलपोता कछवाह कहलाते है। पातल कछवाह जी, उदयकरण कछवाह जी के पाँचवे पुत्र थे।

(5) मेलका कछवाह

राजा उदयकरण कछवाह (1366-1388)

के दूसरे बेटे (2) राव बर सिंह कछवाह जी के पुत्र साँवतसिँह कछवाहा जी और साँवतसिँह कछवाहा जी के पुत्र मेलक जी के वंशज मेलका कछवाह कहलाते है। 

राजा राव नरसिंह कछवाह (1388-1413) (पीढ़ी २७१)

बनबीर सिंह कछवाह (1413-1424) (पीढ़ी२७२)

उधाराव कछवाह (उद्रग) (1424-1453) (पीढ़ी २७३)

राजा चन्द्रसेन कछवाह (1453-1502) (पीढ़ी २७४)

राजा उधाराव कछवाह के पुत्र चन्द्रसेन कछवाह आमेर के राजा बने, राजा चन्द्रसेन कछवाह (1453-1502) आमेर (जयपुर) के शासक थे। चन्द्रसेन कछवाह जी के दो पुत्रों का जन्म हुआ 1 कुंभा कछवाह जी, 2 पृथ्वीराज कछवाह जी.

आमेर के राजा चंद्रसेन जी के ज्येष्ठ पुत्र कुंभा जी अमरसर स्थित गढ़ में वीरगति को प्राप्त हुए थे। तत्पश्चात पृथ्वीराज जी (1502-1527) आमेर के राजा बने थे

कुम्भावत खाप

आमेर के राजा चंद्रसेन जी के ज्येष्ठ पुत्र कुंभा जी के पुत्र उदय करण जी द्वारा महार गांव की स्थापना की गई थी। महार गांव 52 गांव की राज जागीर थी जहां कुम्भावत वंश की स्थापना हुई मूलतः कुंभाजी ही कुम्भावत वंश के संस्थापक है।

कुम्भावत वंश

वर्तमान में कुंम्भावत कछवाह राजपूत जयपुर के आसपास आमेर,चौमू व शाहपुरा तहसील के गांव छोटी महार, बड़ी महार, बगवाड़ा, पुन्याणा व अमरपुरा मे तथा प्राचीन राज्य बीकानेर या यूँ कहे वर्तमान राजस्थान राज्य के चुरू जिले की तारानगर तहसील के गांव भालेरी में निवास करते है। कुंम्भावतों का मुख्य ताजीमी ठिकाना था । कुंम्भावतों का छोटी महार, बघवड़ा, पालड़ी, बीसोल्या आदि ठिकाने थे। बीकानेर राज्य में कुंम्भावतों का एक ठिकाना सादि ताजीम भालेरी(चूरु) था। आमेर के राजा श्री चन्द्रसेन जी की मृत्यु के बाद उनके बड़े पुत्र पृथ्वीराज जी आमेर की गददी पर 11 फरवरी सन 1503 को बैठे ।

राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह (1502-1527) (पीढ़ी २७५)

आमेर शासक राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह जी का जन्म 17 जनवरी 1503 को हुआ था जिन्हें पृथ्वीराज सिंह प्रथम के नाम से भी जाना जाता है। 1503 में अपने पिता, राजा चंद्रसेन की मृत्यु के बाद पृथ्वीराज आमेर की गद्दी पर बैठे। विक्रम संवत् १५५३ फाल्गुन कृष्णा (१५०३ ईस्वी) को आमेर के अधीश्वर हुए उनका बड़ी धूमधाम से राज्याभिषेक किया गया, आमेर शासक राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह जी का मन  और ध्यान हमेसा भगवान की भक्ति में लगा रहता था आरंभ में महाराज पृथ्वीराज सिंह कछवाह जी ने कापालिक सम्प्रदाय के योगी चतुरनाथ जी का सत्संग किया था और वही उनके गुरु थे उनमे प्राणियों के रूपान्तर कर देने की शक्ति थी, अमिबकेश्वर जी के मंदिर में दोनों (गुरु और शिष्य - योगी चतुरनाथ जी, आमेर शासक राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह जी) ध्यान और समाधि में समय व्यतीत करते थे

*(कापालिक सम्प्रदाय - कापालिक  शैव सम्प्रदाय था जो अपुराणीय था। इन्होने भैरव तंत्र तथा कौल तंत्र की रचना की। कापालिक संप्रदाय पाशुपत या शैव संप्रदाय का वह अंग है जिसमें वामाचार अपने चरम रूप में पाया जाता है। कापालिक संप्रदाय के अंतर्गत नकुलीश या लकुशीश को पाशुपत मत का प्रवर्तक माना जाता है। यह कहना कठिन है कि लकुलीश (जिसके हाथ में लकुट हो) ऐतिहासिक व्यक्ति था अथवा काल्पनिक। इनकी मूर्तियाँ लकुट के साथ हैं, इस कारण इन्हें लकुटीश कहते हैं। डॉ॰ रा.गो. भंडारकर के अनुसार पाशुपत संप्रदाय की उत्पत्ति का समय ई.पू. दूसरी शताब्दी है।  कापालिक मत में प्रचलित साधनाएँ बहुत कुछ वज्रयानी साधनाओं में गृहीत हैं। यह कहना कठिन है कि कापालिक संप्रदाय का उद्भव मूलत: व्रजयानी परंपराओं से हुआ अथवा शैव या नाथ संप्रदाय से। यक्ष-देव-परंपरा के देवताओं और साधनाओं का सीधा प्रभाव शैव और बौद्ध कापालिकों पर पड़ा क्योंकि तीनों में ही प्राय: कई देवता समान गुण, धर्म और स्वभाव के हैं। 'चर्याचर्यविनिश्चय' की टीका में एक श्लोक आया है जिसमें प्राणी को वज्रधर कहा गया है और जगत् की स्त्रियों को स्त्री-जन-साध्य होने के कारण यह साधना कापालिक कही गई। पाशुपत संप्रदाय से ही कालमुख और कापालिक शाखाएँ उद्भूत हुईं। कालमुख मुख्य रूप से राजदरबारों और नगरों में सीमित रहा किंतु कापालिक मत दक्षिण और उत्तर भारत में गुह्य साधना के रूप में फैला। कापालिकों के देवता माहेश्वर थे। गोरक्षसिद्धांतसंग्रह के अनुसार श्रीनाथ के दूतों ने जब विष्णु के चौबीस अवतारों के कपाल काट लिए तब वे 'कापालिक' कहलाए। इससे तथा बहुत सी अन्य कथाओं के द्वारा वैष्णव संप्रदाय से कापालिक या शैव संप्रदाय का विरोध लक्षित होता है। वैसे, डॉ॰ भंडारकर के अनुसार, भक्तिवाद का प्रभाव शैवधर्म पर पड़ा; आर्येतर जातियों में शिव जैसे देवता की उपासना प्रचलित थी किंतु बाद में वैदिक देवता इंद्र, रुद्र और आर्येतर स्रोत के देवता एक हो गए। भक्तिवादी उपासना में शिव उदार और भक्तवत्सल चित्रित किए गए। गुह्य साधनाओं में शिव का आदिम रूप न्यूनाधिक रूप में वर्तमान रहा जिसके अनुसार वे विलासी और घोर क्रियाकलापों से संबद्ध थे।) थोड़े दिन पीछे आमेर में रामानुज संप्रदाय के एक प्रसिद्ध साधु कृष्णदास पयहारी जी आये महारानी अपूर्वा कवर (बाला बाई) ने उनको सदगुरू बना लिया  शैव मत के महाराज पृथ्वीराज सिंह कछवाह जी और वैष्णव मत की महारानी अपूर्वा कवर (बाला बाई) होने से उनके अनुयायियों में आपस में आछेप करना आरंभ किया तो परिणाम यह निकला की  योगी चतुरनाथ जी  के और  रामानुज संप्रदाय साधु कृष्णदास पयहारी जी  में परस्पर ज्ञान का मुकाबला होने से योगी चतुरनाथ जी  हार गए और और योगी  चतुरनाथ जी  के सिला उटाने और  साधु कृष्णदास पयहारी जी  के अधरासन में रहने आदि की कई बाते जनसुति में विख्यात है परन्तु गलता गद्दी में रामानुज संप्रदाय साधु कृष्णदास पयहारी जी के बेटने के अनेक प्रमाण है (*रामानुज संप्रदाय-रामानुजाचार्य विशिष्टाद्वैत वेदान्त के प्रवर्तक थे। वह ऐसे वैष्णव सन्त थे जिनका भक्ति परम्परा पर बहुत गहरा प्रभाव रहा। वैष्णव आचार्यों में प्रमुख रामानुजाचार्य की शिष्य परम्परा में ही रामानन्द हुए जिनके शिष्य कबीर और सूरदास थे। रामानुज ने वेदान्त दर्शन पर आधारित अपना नया दर्शन विशिष्ट अद्वैत वेदान्त लिखा था। रामानुजाचार्य ने वेदान्त के अलावा सातवीं-दसवीं शताब्दी के रहस्यवादी एवं भक्तिमार्गी आलवार सन्तों के भक्ति-दर्शन तथा दक्षिण के पंचरात्र परम्परा को अपने विचारों का आधार बनाया। १०१७ ईसवी सन् में रामानुज का जन्म दक्षिण भारत के तमिलनाडु प्रान्त में हुआ था। बचपन में उन्होंने कांची जाकर अपने गुरू यादव प्रकाश से वेदों की शिक्षा ली। रामानुजाचार्य आलवार सन्त यमुनाचार्य के प्रधान शिष्य थे। गुरु की इच्छानुसार रामानुज से तीन विशेष काम करने का संकल्प कराया गया था - ब्रह्मसूत्र, विष्णु सहस्रनाम और दिव्य प्रबन्धम् की टीका लिखना। उन्होंने गृहस्थ आश्रम त्याग कर श्रीरंगम् के यतिराज नामक संन्यासी से सन्यास की दीक्षा ली। मैसूर के श्रीरंगम् से चलकर रामानुज शालिग्राम नामक स्थान पर रहने लगे। रामानुज ने उस क्षेत्र में बारह वर्ष तक वैष्णव धर्म का प्रचार किया। उसके बाद तो उन्होंने वैष्णव धर्म के प्रचार के लिये पूरे भारतवर्ष का ही भ्रमण किया। ११३७ ईसवी सन् में १२० वर्ष की आयु पूर्ण कर वे ब्रह्मलीन हुए। उन्होंने यूँ तो कई ग्रन्थों की रचना की किन्तु ब्रह्मसूत्र के भाष्य पर लिखे उनके दो मूल ग्रन्थ सर्वाधिक लोकप्रिय हुए - श्रीभाष्यम् एवं वेदान्त संग्रहम्। रामानुजाचार्य के दर्शन में सत्ता या परमसत् के सम्बन्ध में तीन स्तर माने गये हैं - ब्रह्म अर्थात् ईश्वर, चित् अर्थात् आत्म तत्व और अचित् अर्थात् प्रकृति तत्व। वस्तुतः ये चित् अर्थात् आत्म तत्त्व तथा अचित् अर्थात् प्रकृति तत्त्व ब्रह्म या ईश्वर से पृथक नहीं है बल्कि ये विशिष्ट रूप से ब्रह्म के ही दो स्वरूप हैं एवं ब्रह्म या ईश्वर पर ही आधारित हैं। वस्तुत: यही रामनुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत का सिद्धान्त है। जैसे शरीर एवं आत्मा पृथक नहीं हैं तथा आत्म के उद्देश्य की पूर्ति के लिये शरीर कार्य करता है उसी प्रकार ब्रह्म या ईश्वर से पृथक चित् एवं अचित् तत्त्व का कोई अस्तित्व नहीं हैं। वे ब्रह्म या ईश्वर का शरीर हैं तथा ब्रह्म या ईश्वर उनकी आत्मा सदृश्य हैं। रामानुज के अनुसार भक्ति का अर्थ पूजा-पाठ या कीर्तन-भजन नहीं बल्कि ध्यान करना या ईश्वर की प्रार्थना करना है। सामाजिक परिप्रेक्ष्य से रामानुजाचार्य ने भक्ति को जाति एवं वर्ग से पृथक तथा सभी के लिये सम्भव माना है।) (*गलता जी जयपुर - यह बिना विवाद का ऐतिहासिक सच है कि शताब्दियों से जयपुर का गलता तीर्थ रामानन्द सम्प्रदाय का श्रद्धा केंद्र है। जयपुर की ऐतिहासिक गलता गद्दी का संबंध रामानुज संप्रदाय साधु कृष्णदास पयहारी जी से है जयपुर में ‘गलता नाम से रामानंद संप्रदाय का मुख्यालय स्थापित किया। यह बात 16वीं सदी के बीच की है। इस नाते जयपुर रामानन्द सम्प्रदाय का शताब्दियों तक मुख्यालय रहा है। इस इतिहास पर कोई आपत्ति नहीं है। संत साहित्य और हिंदी साहित्य के प्रामाणिक अनेक विद्वान इसे एकमत होकर मानते हैं। पयोहारी के विभिन्न शिष्यों में तीन प्रमुख हैं-कील्हदेव, अग्रदेव और टीलादास। गलताजी, जयपुर, राजस्थान स्थित एक प्राचीन तीर्थस्थल है। निचली पहाड़ियों के बीच बगीचों से परे स्थित मंदिर, मंडप और पवित्र कुंडो के साथ हरियाली युक्त प्राकृतिक दृश्य इसे आन्नददायक स्थल बना देते हैं। दीवान कृपाराम द्वारा निर्मित उच्चतम चोटी के शिखर पर बना सूर्य देवता का छोटा मंदिर शहर के सारे स्थानों से दिखाई पड़ता है। गलताजी मंदिर जयपुर से केवल 10 किमी दूर स्थित है। जयपुर के आभूषणों में से एक, मंदिर परिसर में प्राकृतिक ताजा पानी का झरना और 7 पवित्र कुण्ड शामिल हैं। इन कुण्डों के बीच, 'गलता कुंड', पवित्रतम एक है और सूखी कभी नहीं माना जाता है। शुद्ध पानी की एक वसंत 'गौमुख', एक रॉक, एक गाय के सिर की तरह आकार टैंक में से बहती है। एक शानदार संरचना, इस भव्य मंदिर, गुलाबी बलुआ पत्थर में बनाया गया है कम पहाड़ियों के बीच, और अधिक एक महल या 'हवेली' एक पारंपरिक मंदिर से की तरह लग रहे करने के लिए संरचित है। गलता बंदर मंदिर हरे-भरे पेड़-पौधों की विशेषता भव्य परिदृश्य का एक वापस छोड़ दिया है, और जयपुर शहर का एक आकर्षक दृश्य प्रस्तुत करता है। यह मंदिर है कि इस क्षेत्र में ध्यान केन्द्रित करना बंदरों के कई जनजातियों के लिए प्रसिद्ध है। धार्मिक भजन और मंत्र, प्राकृतिक सेटिंग के साथ संयुक्त, जो वहां का दौरा किसी के लिए एक शांतिपूर्ण वातावरण प्रदान करते हैं।)

एक बार साधु कृष्णदास पयहारी जी ने खुश होकर राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह जी को सीता राम जी और नर सिंह जी की चमत्कारी मुर्तिया दी थी और कहा था युध में सीता रामजी का रथ हमेसा आगे रहेगा तो तुम्हारी जय होगी तब से उस नियम का पालन किया जाता है और आमेर में नर सिंह जी की और जयपुर में सीता रामजी की यथा विधि पूजा होती है साधु कृष्णदास पयहारी जी कुछ दिन गलता में रहकर चले गए

उदयपुर के महाराणा संग्रामसिंह कि सहायता

नाथावत का इतिहास (पेज नंबर - ३९) में लिखा है की उदयपुर के महाराणा संग्राम सिंह जी राजा होने के पहले भाइयो के डर कर अज्ञातवास करने के लिए आमेर आये थे और आमेर शासक राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह जी के पास सेवक रूप में रहे थे वे रात में महल की निगरानी रखते थे दिन में एकान्तवास करते थे मुंशी देवी प्रसाद जी ने आमेर के राजा (पेज नंबर ७) में लिखा है की एक बार भाधवे की अंधेरी रात थी मूसलाधार तेज मेह बरस रहा था सागाजी महल के पहले पर थे और राजा - रानी सो रहे थे आमेर के पहाड़ो मे से तेज पानी की आवाज आ रही थे और पानी महल मेसे आवाज के साथ गिर रहा था तो सागाजी (संग्रामसिंह) ने सोचा आवाज सुनकर राजा - रानी की नींद टूट जाएगी इसलिए उन्होंने घास का एक भाला निचे लगा दिया जिससे आवाज बंद हो गयी तो महाराज पृथ्वीराज सिंह कछवाह जी ने पूछा की बारिस बंद हो गयी, उत्तर में दासी ने निवेदन किया की बारिस तो ज्यो की त्यों हो रही  है पर सांगाजी के प्रयास से आवाज बंद होगयी है तब महाराज पृथ्वीराज सिंह कछवाह जी ने बोला ये कोई मामूली मनुष्य नहीं है कोई बुद्धिमान मनुष्य है राणा सांगा (महाराणा संग्राम सिंह) (१२ अप्रैल १४८४ - १७ मार्च १५२७) (राज 1509-1528) उदयपुर में सिसोदिया राजपूत राजवंश के राजा थे तथा राणा रायमल के सबसे छोटे पुत्र थे। राणा रायमल के तीनों पुत्रों ( कुंवर पृथ्वीराज, जगमाल तथा राणा सांगा ) में मेवाड़ के सिंहासन के लिए संघर्ष प्रारंभ हो जाता है। एक भविष्यकर्त्ता के अनुसार सांगा को मेवाड़ का शासक बताया जाता है ऐसी स्थिति में कुंवर पृथ्वीराज व जगमाल अपने भाई राणा सांगा को मौत के घाट उतारना चाहते थे परंतु सांगा किसी प्रकार यहाँ से बचकर अजमेर पलायन कर जाते हैं तब सन् 1509 में अजमेर के कर्मचन्द पंवार की सहायता से राणा सांगा मेवाड़ राज्य प्राप्त हुआ| महाराणा सांगा ने सभी राजपूत राज्यो को संगठित किया और सभी राजपूत राज्य को एक छत्र के नीचे लाएं। उन्होंने सभी राजपूत राज्यो संधि की और इस प्रकार महाराणा सांगा ने अपना साम्राज्य उत्तर में पंजाब सतलुज नदी से लेकर दक्षिण में मालवा को जीतकर नर्मदा नदी तक कर दिया। पश्चिम में में सिंधु नदी से लेकर पूर्व में बयाना भरतपुर ग्वालियर तक अपना राज्य विस्तार किया इस प्रकार मुस्लिम सुल्तानों की डेढ़ सौ वर्ष की सत्ता के पश्चात इतने बड़े क्षेत्रफल हिंदू साम्राज्य कायम हुआ इतने बड़े क्षेत्र वाला हिंदू सम्राज्य दक्षिण में विजयनगर सम्राज्य ही था। दिल्ली सुल्तान इब्राहिम लोदी को खातौली व बाड़ी के युद्ध में 2 बार परास्त किया और और गुजरात के सुल्तान को हराया व मेवाड़ की तरफ बढ़ने से रोक दिया। बाबर को खानवा के युद्ध में पूरी तरह से राणा ने परास्त किया और बाबर से बयाना का दुर्ग जीत लिया। इस प्रकार राणा सांगा ने भारतीय इतिहास पर एक अमिट छाप छोड़ दी। 16वी शताब्दी के सबसे शक्तिशाली शासक थे इनके शरीर पर 80 घाव थे। इनको हिंदुपत की उपाधि दी गयी थी। इतिहास में इनकी गिनती महानायक तथा वीर के रूप में की जाती हैं।

खानवा का युध

खानवा का युद्ध 16 मार्च 1527 को आगरा से 35 किमी दूर खानवा गाँव में बाबर एवं मेवाड़ के राणा सांगा के मध्य लड़ा गया। पानीपत के युद्ध के बाद बाबर द्वारा लड़ा गया यह दूसरा बड़ा युद्ध था। आमेर शासक राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह जी ने 'खानवा के युद्ध' (1527) में राणा सांगा जी का साथ दिया और मुग़ल बाबर के विरुद्ध लड़े थे। बयाना के युद्ध के पश्चात् 17 मार्च,1527 ई. में खानवा के मैदान में ही राणा सांगा जी जब घायल हो गए, युद्ध क्षेत्र में राणा सांगा घायल हुए, पर किसी तरह बाहर निकलने में कछवाह वंश के आमेर शासक राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह जी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा आमेर शासक राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह जी द्वारा ही राणा सांगा को घायल अवस्था में काल्पी (मेवाड़) नामक स्थान पर पहुँचाने में मदद दी गई, लेकिन असनसुट सरदारों ने इसी स्थान राणा सांगा को जहर दे दिया। ऐसी अवस्था में राणा सांगा पुनः बसवा आए जहाँ सांगा की 30 जनवरी,1528 को मृत्यु हो गयी, लेकिन राणा सांगा का विधि विधान से अन्तिम संस्कार माण्डलगढ (भीलवाड़ा) में हुआ।

 

आमेर शासक राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह जी की प्रियतम रानी अपूर्वा कवर या बाला बाई

बीकानेर के राठौड राजा राव लुनकरण सिंह जी की बेटी अपूर्वा कवर या बाला बाई के साथ राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह जी की शादी संवत् १५६४ में हुई थी। अपूर्वा कवर या बाला बाई आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी की प्रियतम रानी थी। इनके नाम पर आमेर किले (जयपुर) में बालाबाई की साल नाम का मकान है उसके सामने जाते ही सब लोग नतमस्तक होते है। और ताजीम देते हैं। अपूर्वा कवर या बाला बाई ने आमेर में लक्ष्मी नारायण मंदिर का निर्माण करवाया। बीकानेर के राठौड राजा राव लुनकरण सिंह जी की बेटी अपूर्वा कवर या बाला बाई के गर्भ से बेटे पाचयण सिंह कछवाहा जी, राजा भीम सिंह कछवाहा जी, राजा भारमल सिंह कछवाहा जी, जगमाल सिंह कछवाहा जी, सहसमल सिंह कछवाहा जी, सांगा सिंह कछवाहा जी, बलभद्र सिंह कछवाहा जी, राममल सिंह कछवाहा जी, साईंदास सिंह कछवाहा जी, चतुर्भुज सिंह कछवाहा जी, गोपाल सिँह कछवाहा जी और सुरतान सिँह कछवाहा का जन्म हुआ।

(आमेर शासक राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह जी की प्रियतम रानी अपूर्वा कवर (बाला बाई) ने आमेर में लक्ष्मी नारायण मंदिर का निर्माण करवाया।)

आमेर शासक राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह जी ने ९ शादी कि जिनमे से।

(1) बीकानेर के राठौड राजा राव लुनकरण सिंह जी की बेटी अपूर्वा कवर (बाला बाई) के साथ राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह जी की शादी संवत् १५६४ में हुई थी।

(2) देवती के राजा जैताकी की बेटी भगवती के साथ।

(3) पदारथदे (तवर जी) भगवंतराव गावड़ी की।

(4) रूपावती राव लखानाथा तोड़ा की।

(5) जाववती (सिसोदणि जी) राणा रायमल जी उदयपुर की।

(6) रमादे (निर्वाण जी) रायसल अचला की।

(7) रमदे (हाड़ी जी) राव नरवद बूँदी की।

(8) गौरवडे (निर्वाण जी) धामदेव की।

(9) राव ज्ञानसिंह गौड़ की पुत्रि सोहाग कवर थी।

आमेर शासक राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह जी के बेटे (उत्तराधिकारी)

बीकानेर के राठौड राजा राव लुनकरण सिंह जी की बेटी अपूर्वा कवर या बाला बाई के गर्भ से (1) पाचयण सिंह कछवाहा जी, (2) राजा भीम सिंह कछवाहा जी, (3) राजा भारमल सिंह कछवाहा जी, (4) जगमाल सिंह कछवाहा जी, (5) सहसमल सिंह कछवाहा जी, (6) सांगा सिंह कछवाहा जी, (7) बलभद्र सिंह कछवाहा जी, (8) राममल सिंह कछवाहा जी, (9) साईंदास सिंह कछवाहा जी, (10) चतुर्भुज सिंह कछवाहा जी, (11) गोपाल सिँह कछवाहा जी और (12) सुरतान सिँह कछवाहा जी, शेष अन्य रानियों के पुत्र (13) राम सिंह कछवाहा जी [देवती के राजा जैताकी की बेटी भगवती के गर्भ से], (14) प्रताप सिंह कछवाहा जी [देवती के राजा जैताकी की बेटी भगवती के गर्भ से], (15) कल्याण सिंह कछवाहा जी [जाववती (सिसोदणि जी) राणा रायमल जी उदयपुर के गर्भ से], (16) भीखा सिंह कछवाहा जी [जाववती (सिसोदणि जी) राणा रायमल जी उदयपुर के गर्भ से], (17) तेजसी सिंह कछवाहा जी [जाववती (सिसोदणि जी) राणा रायमल जी उदयपुर के गर्भ से], (18) राजा पूरणमल सिंह कछवाहा जी [पदारथद (तवर जी) भगवंतराव गावड़ी के गर्भ से], (19) रूप सिंह कछवाहा जी [राव ज्ञानसिंह गौड़ की पुत्रि सोहागकांवर के गर्भ से] जन्म हुआ।

बारह कोटड़ी

(क्षत्रिय राजपूताना कछवाहों की बारह कोटड़ी)

आमेर शासक राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह जी की कई कुलों से नौ पत्नियाँ थीं, जिनसे उनके 19 बेटे और 3 बेटियाँ थीं। तीन बेटे तो आमेर जयपुर के राजा बने और बाकी बारह बेटो को बारह कोटड़ी से सम्मानित किया गया इन परिवारों को कछवाहा घराने का बारो कोटरी (बारह कक्ष) कहा जाता है, जिसने बाद में जयपुर के सर्वोच्च अभिजात वर्ग का गठन किया। आमेर को बारह हिस्सो मे विभाजित कर दिया और उन बारह हिस्सो को अपने बेटो को से दिया जिसे बारह कोटड़ी के नाम से जाना जाता है।

(1) आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी का पुत्र पाचयण सिंह कछवाहा जी, जिन्होंने बीकानेर के राठौड राजा राव लुनकरण सिंह जी की बेटी अपूर्वा कवर या बाला बाई के गर्भ से जन्म लिया और उनके वंशज आगे चलकर पिचानोत कछवाह कहलाये।

(2) आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी का पुत्र जगमाल सिंह कछवाहा जी, जिन्होंने बीकानेर के राठौड राजा राव लुनकरण सिंह जी की बेटी अपूर्वा कवर या बाला बाई के गर्भ से जन्म लिया और उनके वंशज आगे चलकर जगमालोत - खगालोत कछवाह, डोगरा राजवंश कहलाये।

(3) आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी का पुत्र सांगा सिंह कछवाहा जी, जिन्होंने बीकानेर के राठौड राजा राव लुनकरण सिंह जी की बेटी अपूर्वा कवर या बाला बाई के गर्भ से जन्म लिया।, जिन्होंने सांगानेर बसाया।

(4) आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी का पुत्र बलभद्र सिंह कछवाहा जी, जिन्होंने बीकानेर के राठौड राजा राव लुनकरण सिंह जी की बेटी अपूर्वा कवर या बाला बाई के गर्भ से जन्म लिया और उनके वंशज आगे चलकर बालभदरोत कछवाह कहलाये।

(5) आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी का पुत्र साईंदास सिंह कछवाहा जी, और वंशज आगे चलकर साईंदासोत कछवाह कहलाये।

(6) आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी का पुत्र चतुर्भुज सिंह कछवाहा जी, जिन्होंने बीकानेर के राठौड राजा राव लुनकरण सिंह जी की बेटी अपूर्वा कवर या बाला बाई के गर्भ से जन्म लिया और उनके वंशज आगे चलकर चतुर्भुजोत कछवाह कहलाये।

(7) आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी का पुत्र गोपाल सिँह कछवाहा जी, जिन्होंने बीकानेर के राठौड राजा राव लुनकरण सिंह जी की बेटी अपूर्वा कवर या बाला बाई के गर्भ से जन्म लिया और उनके वंशज आगे चलकर नाथावत कछवाह कहलाये।

(8) आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी का पुत्र आमेर राजा पूरणमल सिंह कछवाहा जी, और उनके वंशज आगे चलकर पूरणमलोत कछवाह कहलाये।

(9) आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी का पुत्र सुरतान सिँह कछवाहा जी, जिन्होंने बीकानेर के राठौड राजा राव लुनकरण सिंह जी की बेटी अपूर्वा कवर या बाला बाई के गर्भ से जन्म लिया और उनके वंशज आगे चलकर सुलतानोत (सुलतानोता) कछवाह कहलाये।

(10) आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी का पुत्र राम सिंह कछवाहा जी, और वंशज आगे चलकर रामसिंगहोत कछवाह कहलाये।

(11) आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी का पुत्र प्रताप सिंह कछवाहा जी, और वंशज आगे चलकर प्रतापपोता कछवाह कहलाये।

(12) आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी का पुत्र कल्याण सिंह कछवाहा जी, और वंशज आगे चलकर कल्याणोत कछवाह कहलाये।

आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी के पुत्र राजा पूरणमल सिंह कछवाहा जी (1527-1534), राजा भीम सिंह कछवाहा जी (1534-1537), राजा भारमल सिंह कछवाहा जी (1548-1574) आमेर के राजा बने। और राजा भीम सिंह कछवाहा जी (1534-1537) के बेटे राजा रतन सिंह कछवाह जी (1537-1548) आमेर के राजा बने।

आमेर राजा भारमल कछवाहा जी (1548-1574) बारह कोटड़ी को इस प्रकार से विभाजित कर दिया। ८ कोटडिया को तो इस प्रकार से है। (1) आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी का पुत्र पाचयण सिंह कछवाहा जी, जिन्होंने बीकानेर के राठौड राजा राव लुनकरण सिंह जी की बेटी अपूर्वा कवर या बाला बाई के गर्भ से जन्म लिया और उनके वंशज आगे चलकर पिचानोत कछवाह कहलाये। (2) आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी का पुत्र गोपाल सिँह कछवाहा जी, जिन्होंने बीकानेर के राठौड राजा राव लुनकरण सिंह जी की बेटी अपूर्वा कवर या बाला बाई के गर्भ से जन्म लिया और उनके वंशज आगे चलकर नाथावत कछवाह कहलाये। (3) आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी का पुत्र सुरतान सिँह कछवाहा जी, जिन्होंने बीकानेर के राठौड राजा राव लुनकरण सिंह जी की बेटी अपूर्वा कवर या बाला बाई के गर्भ से जन्म लिया और उनके वंशज आगे चलकर सुलतानोत (सुलतानोता) कछवाह कहलाये। (4) आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी का पुत्र जगमाल सिंह कछवाहा जी, जिन्होंने बीकानेर के राठौड राजा राव लुनकरण सिंह जी की बेटी अपूर्वा कवर या बाला बाई के गर्भ से जन्म लिया और उनके वंशज आगे चलकर जगमालोत - खगालोत कछवाह, डोगरा राजवंश कहलाये। (5) आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी का पुत्र बलभद्र सिंह कछवाहा जी, जिन्होंने बीकानेर के राठौड राजा राव लुनकरण सिंह जी की बेटी अपूर्वा कवर या बाला बाई के गर्भ से जन्म लिया और उनके वंशज आगे चलकर बालभदरोत कछवाह कहलाये। (6) आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी का पुत्र चतुर्भुज सिंह कछवाहा जी, जिन्होंने बीकानेर के राठौड राजा राव लुनकरण सिंह जी की बेटी अपूर्वा कवर या बाला बाई के गर्भ से जन्म लिया और उनके वंशज आगे चलकर चतुर्भुजोत कछवाह कहलाये। (7) आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी का पुत्र कल्याण सिंह कछवाहा जी, और वंशज आगे चलकर कल्याणोत कछवाह कहलाये।(8) आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी का पुत्र प्रताप सिंह कछवाहा जी, और वंशज आगे चलकर प्रतापपोता कछवाह कहलाये।) बाकि ४ कोटडिया को इस प्रकार से है। (9) जोणसी कछवाहा जी के तीसरे बेटे कुंभा कछवाहा जी से (बांसखो) कुंभाणी। (10) राजा उदयकर्ण कछवाहा जी के पाचवे बेटे शिवबहमा कछवाहा जी से (निदड़) के स्योबहमापोता। (11) बणवीर कछवाहा जी के पाचवे बेटे बरोजी से (वाटका) के बणवीरपोता। (12) राजा चंद्रसेन कछवाहा जी के तीसरे बेटे कुमाजी

आमेर शासक राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह जी परिवार

आमेर शासक राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह जी की कई कुलों से नौ पत्नियाँ थीं, जिनसे उनके 19 बेटे और 3 बेटियाँ थीं।

(1)  पाचयण सिंह कछवाहा जी - आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी ने अपने राज्य को 12 पुत्रो में बराबर विभाजित किया जिसे आज भी क्षत्रिय राजपूताना में 12 कोटडिया प्रसिद्ध हैं। उनी बारह कोटडियो में आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी का पुत्र पाचयण सिंह कछवाहा जी (पीढ़ी 282) भी शामिल था जिन्होंने बीकानेर के राठौड राजा राव लुनकरण सिंह जी की बेटी अपूर्वा कवर या बाला बाई के गर्भ से जन्म लिया और उनके वंशज आगे चलकर पिचानोत कछवाह कहलाये

(2)  राजा भीम सिंह कछवाहा जी- भीमसिंह का [जन्म रानी बालाबाई उर्फ अपूर्वाकंवर की कोख से) आमेर के राजा भीम सिंह कछवाहा जी (1534-1537) हुए फिर राजा रतन सिंह कछवाह जी (1537-1548) ये राजा भीम सिंह कछवाहा जी के बेटे थे राजा भीम सिंह कछवाहा जी आमेर के राजा बने और उनके बेटे राजा रतन सिंह कछवाह जी भी इनके बाद में आमेर के राजा बने।

(3)   राजा भारमल सिंह कछवाहा जी - भारमल का [जन्म रानी बालाबाई उर्फ अपूर्वाकंवर की कोख से) आमेर के राजा भारमल सिंह कछवाहा जी (1548-1574) हुए आमेर के राजा बने।

(4)   जगमाल सिंह कछवाहा जी - जगमालजी का जन्म रानी बालाबाई उर्फ अपूर्वाकंवर की कोख से हुवा था] जगमालजी को दिग्गी और जोबनेर दो जागीर मिली थी, जगमालजी ने अपने पिता पृथ्वीराजसिंह से झगड़ा करके आमेर छिड़कर अमरकोट में रहने लगे, वंहाँ उन्होंने अमरकोट के राणा पहाड़सिंह की पुत्रि नेतकँवर से शादी करली। जगमालजी के पांच पुत्र हुए खंगारजी, सिंघदेवजी  [सिंघदेवजी की 1554  में एक लड़ाई में म्रत्यु होगयी], सारंगदेवजी [सारंगदेवजी की 1554 में एक लड़ाई में म्रत्यु होगयी ], जयसिंह 'रामचंदजी राणा पहाड़सिंह की म्रत्यु 1549.में हुयी। जो कछवाहों की बारह कोटड़ी में शामिल है। इनके वंशज जगमालोत - खगालोत कछवाह, डोगरा राजवंश कहलाये

(5)   सहसमल सिंह कछवाहा जी - अपुत्र मरे

(6)   सांगा सिंह कछवाहा जी - सांगासिंह कछवाहा जी का (जन्म रानी बालाबाई उर्फ अपूर्वाकंवर की कोख से, जिसने सांगानेर बसाया), जो कछवाहों की बारह कोटड़ी में शामिल है। आमेर के राजा रतन सिंह जी का साथ देते हुए युध में अपने पाण दे दिए थे

(7)   बलभद्र सिंह कछवाहा जी - बलभद्रसिंह का जन्म रानी बालाबाई उर्फ अपूर्वाकंवर की कोख से हुवा था, अचरोल ठिकाने के संस्थापक बलभद्रसिंह थे । बलभद्रसिंह के वंसज बालभदरोत कछवाह कहलाये जो कछवाहों की बारह कोटड़ी में शामिल है।

(8)   राममल सिंह कछवाहा जी - अपुत्र मरे

(9)   साईंदास सिंह कछवाहा जी - साईंदासजी के वंसज साईंदासोत कछवाह कहलाये, जो कछवाहों की बारह कोटड़ी में शामिल है। इनके वंशज बड़ोद में है

(10)  चतुर्भुज सिंह कछवाहा जी - चतुर्भुजसिंह का जन्म रानी बालाबाई उर्फ अपूर्वाकंवर की कोख से हुवा थाचतुर्भुजसिंह बगरू ठिकाने के संस्थापक थे। चतुर्भुजसिंह के वंसज चतुर्भुजोत कछवाह कहलाये जो कछवाहों की बारह कोटड़ी में में शामिल है

(11)          गोपाल सिँह कछवाहा जी - गोपालसिंह का (जन्म रानी बालाबाई उर्फ अपूर्वाकंवर की कोख से) गोपालसिंह को चोमू और समोद जागीर मिली, गोपालसिंह की शादी करौली के ठाकुर की पुत्रि सत्यभामा के साथ हुयी थी। जो कछवाहों की बारह कोटड़ी में शामिल है। गोपालजी के पुत्र नाथा जी के वंशज नाथावत कछवाह कहलाते है।

(12)          सुरतान सिँह कछवाहा जी - सुरतानसिंह का जन्म रानी बालाबाई उर्फ अपूर्वाकंवर की कोख से हुवा था, सुरतानसिंह सुरौठ ठिकाने के संस्थापक थे। जो कछवाहों की बारह कोटड़ी में शामिल है। सुरतान जी के वंशज सुलतानोत (सुलतानोता) कछवाह कहलाते है।

 

(13)          राम सिंह कछवाहा जी - जो कछवाहों की बारह कोटड़ी में शामिल है। रामसिंह के वंसज रामसिंगहोत कछवाह कहलाये

(14)          प्रताप सिंह कछवाहा जी - जो कछवाहों की बारह कोटड़ी में सामिल है। प्रतापसिंह (प्रताप जी) के वंशज प्रतापपोता कछवाह कहलाते है ।

(15)          कल्याण सिंह कछवाहा जी - कल्याणदास का जन्म सिसोदिया रानी की कोख से हुवा था, कल्याणदास को कालवाड़ जागीर मिली, कल्याणदास के वंसज कल्याणोत कछवाह कहलाये। जो कछवाहों की बारह कोटड़ी में शामिल है।

(16)          भीखा सिंह कछवाहा जी - भीकाजी के वंसज भिकावत कछवाह कहलाये भीकाजी जो निसंतान रहे, अपुत्र मरे

(17)          तेजसी सिंह कछवाहा जी - अपुत्र मरे

(18)          राजा पूरणमल सिंह कछवाहा जी - पूरणमल का [जन्म तंवर रानी की कोख से, दूसरा पुत्र] राजा पृथ्वीराजसिंह की 1527 में म्रत्यु के बाद राजा पूरणमल का जन्म 5 नवम्बर 1527 को तंवर रानी की कोख से हुवा था। राजा पूरणमल आमेर के नवें राजा थे जिनका शासनकल 1527 से 1534 तक रहा है।

(19)         रूप सिंह कछवाहा जी - रूपसिंह का [रूपसिंह का जन्म गोड़ रानी की कोख से हुवा था, रूपसिंह को दौसा की जागीर मिली थी। रूपसिंह के वंसज रुपसिंगहोत कछवाह कहलाये] रूपसिंह की म्रत्यु 4 नवम्बर 1562 को हुयी थी। अजमेर के पास रूप नगर इन्होने ही बसाया था

आमेर शासक राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह जी युद्ध में अधिक समय तक जीवित नहीं रहे और राणा सांगा की मृत्यु से दो महीने पहले 4 नवंबर 1527 को उनकी मृत्यु हो गई। बाद वाले की तरह, जिसे बाबर के साथ आगे के संघर्ष से बचने के लिए उसके अमीरों द्वारा जहर दे दिया गया था, इतिहासकार वीएस भटनागर का सुझाव है कि पृथ्वीराज की मृत्यु भी अप्राकृतिक हो सकती है।

इस तरह से आमेर के महाराज  पृथ्वीराज सिंह कछवाह जी के पुत्रों से कछवाहा राजवंश में 3 राजा, 12 खाप, 1 डोगरा राजवंश (जम्मू कश्मीर) का निर्माण हुआ। इस प्रकार से कुल 65 क्षत्रिय कछवाह राजपूत की खाप बनी थी  

क्षत्रिय कछवाह राजपूत की 12 खाप और 1 राजवंश का विवरण निम्न प्रकार से है।

(1) पिचानोत कछवाह

इस खाप का निर्माण पाचयण सिंह कछवाहा जी के नाम से हुआ था। इस लिए इनके वंशज अपने सर नाम के रूप में अपने पिता पाचयण सिंह कछवाहा जी के नाम के रूप में पिचानोत लगाने लगे। और ये आगे चलकर एक खाप बन गई। आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी ने अपने राज्य को 12 पुत्रो में बराबर विभाजित किया जिसे आज भी राजपूताना में 12 कोटडिया प्रसिद्ध हैं। उनी बारह कोटडियो में आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी का पुत्र पाचयण सिंह कछवाहा जी भी शामिल था जिन्होंने बीकानेर के राठौड राजा राव लुनकरण सिंह जी की बेटी अपूर्वा कवर या बाला बाई के गर्भ से जन्म लिया और उनके वंशज आगे चलकर पिचानोत कछवाह कहलाये, पाचयण सिंह कछवाहा जी के छह बेटे ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया। पाचयण सिंह कछवाहा जी के छह बेटे (1) किशनदास सिंह पिचानोत, (2) नरहरदास सिंह पिचानोत, (3) सांवलदास सिंह पिचानोत, (4) विट्ठलदास सिंह पिचानोत, (5) नारायणदास सिंह पिचानोत, (6) मुरारिदास सिंह पिचानोत ने जन्म लिया।

(1) किशनदास सिंह पिचानोत के कल्याणदास सिंह पिचानोत बेटे ने जन्म लिया और कल्याणदास सिंह पिचानोत के बेटे कान्ह सिंह पिचानोत, जयराम सिंह पिचानोत, भरत सिंह पिचानोत, राम सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

(2) नरहरदास सिंह पिचानोत के छीतरदास सिंह पिचानोत, बलकणृ सिंह पिचानोत, मुकुंददास सिंह पिचानोत, वंशीदास सिंह पिचानोत, गोविंददास सिंह पिचानोत, मोहनदास सिंह पिचानोत, जसकरण सिंह पिचानोत बेटे ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     छीतरदास सिंह पिचानोत (नरहरदास सिंह पिचानोत के पुत्र) के बेटे वृदाबनदास सिंह पिचानोत, नरसिहंदास सिंह पिचानोत, माधोदास सिंह पिचानोत बेटे ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया। और वृदाबनदास सिंह पिचानोत (छीतरदास सिंह पिचानोत के पुत्र) के बेटे  किशोरदास सिंह पिचानोत, परशुराम सिंह पिचानोत, सबलसिंह पिचानोत, सुदंरदास सिंह पिचानोत, शक्ति सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

किशोरदास सिंह पिचानोत (वृदाबनदास सिंह पिचानोत के पुत्र) के बेटे फतह सिंह पिचानोत, आनन्द सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

परशुराम सिंह पिचानोत (वृदाबनदास सिंह पिचानोत के पुत्र) के बेटे अजब सिंह पिचानोत, अभयराम सिंह पिचानोत, जुझार सिंह पिचानोत, शिवराम सिंह पिचानोत, किशन सिंह पिचानोत, सूर सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

सबल सिंह पिचानोत (वृदाबनदास सिंह पिचानोत के पुत्र)  के बेटे मोहकम सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

सुदंरदास सिंह पिचानोत (वृदाबनदास सिंह पिचानोत के पुत्र)  के बेटे किशन सिंह पिचानोत, रामचंद्र सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

शक्ति सिंह पिचानोत (वृदाबनदास सिंह पिचानोत के पुत्र)  के बेटे अजब सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

माधोदास सिंह पिचानोत (छीतरदास सिंह पिचानोत के पुत्र)  के बेटे हरनाथ सिंह पिचानोत, गिरधर सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     मुकुंददास सिंह पिचानोत (नरहरदास सिंह पिचानोत के पुत्र)  के बेटे चतरुभुज सिंह पिचानोत, वेणीदास सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     वंशीदास सिंह पिचानोत (नरहरदास सिंह पिचानोत के पुत्र) के बेटे राम सिंह पिचानोत, रामचंद्र सिंह पिचानोत, अनुपराम सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

(3) सांवलदास सिंह पिचानोत *******

(4) विट्ठलदास सिंह पिचानोत के बाघ सिंह पिचानोत, राधोदास सिंह पिचानोत, उदय सिंह पिचानोत, हरिदास सिंह पिचानोत, शामदास सिंह पिचानोत, सादूल सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     बाघ सिंह पिचानोत (विट्ठलदास सिंह पिचानोत के पुत्र) के बेटे हरराम सिंह पिचानोत, बुध सिंह पिचानोत, रामचंद्र सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     राधोदास सिंह पिचानोत (विट्ठलदास सिंह पिचानोत के पुत्र) के बेटे हरदयराम सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और हरदयराम सिंह पिचानोत के बेटे शाम सिंह पिचानोत, जयकष्ण सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     उदय सिंह पिचानोत (विट्ठलदास सिंह पिचानोत के पुत्र) के बेटे जगन्नाथ सिंह पिचानोत, सुजान सिंह पिचानोत, शिवराम सिंह पिचानोत, विजयराम सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

सुजान सिंह पिचानोत (उदय सिंह पिचानोत के पुत्र) के बेटे बल्लू सिंह पिचानोत, सूरत सिंह पिचानोत, गज सिंह पिचानोत, परशुराम सिंह पिचानोत, बुधरथ सिंह पिचानोत, प्रेम सिंह पिचानोत, अजब सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

हरिदास सिंह पिचानोत  {विट्ठलदास सिंह पिचानोत के पुत्र} के बेटे गोयंददास सिंह पिचानोत, भोजराज सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

गोयंददास सिंह पिचानोत (हरिदास सिंह पिचानोत के पुत्र) के बेटे मथुरादास सिंह पिचानोत, गोकुलदास सिंह पिचानोत, कनक सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

भोजराज सिंह पिचानोत  {हरिदास सिंह पिचानोत के पुत्र} के बेटे भारमल सिंह पिचानोत, फतह सिंह पिचानोत, केसरी सिंह पिचानोत, देवी सिंह पिचानोत, सबल सिंह पिचानोत, सूर सिंह पिचानोत, शाम सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     विट्ठलदास सिंह पिचानोत के बेटे लाडखाँ सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और लाडखाँ सिंह पिचानोत के बेटे कुशल सिंह पिचानोत, किशन सिंह पिचानोत, अजब सिंह पिचानोत, अनोप सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     सादूल सिंह पिचानोत (विट्ठलदास सिंह पिचानोत के पुत्र) के बेटे सुदंरदास सिंह पिचानोत, दयालदास सिंह पिचानोत, कान्हदास सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

सुदंरदास सिंह पिचानोत (सादूल सिंह पिचानोत के पुत्र) के बेटे जोत सिंह पिचानोत, अनुप सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

दयालदास सिंह पिचानोत (सादूल सिंह पिचानोत के पुत्र) के बेटे जोध सिंह पिचानोत, फतह सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

कान्हदास सिंह पिचानोत (सादूल सिंह पिचानोत के पुत्र) के बेटे राज सिंह पिचानोत, गुमान सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

 (5) नारायणदास सिंह पिचानोत के सुदंरदास सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

(6) मुरारिदास सिंह पिचानोत के चतुर सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

साम्राज्य

आमेर राजा पृथ्वीराज कछवाहा जी ने आमेर को बारह हिस्सो मे अपने बारह पुत्रों के लिए बटवारा किया था जिसमें उनके पुत्र  पाचयण सिंह कछवाहा को बारह कोटड़ियो मे से नायला की जागीर मिली, फिर पाचयण सिंह कछवाहा ने सांभरियाँ (सामरिया) पर अपना अधिकार रखा और इने सांभरियाँ (सामरिया) के संस्थापक कहा जाता हैं। इन्होंने अपना आमेर जयपुर राजवंश के साथ साथ अपना अलग चिन्ह बनवाया। पाचयण सिंह कछवाहा जी ने अनेकों मुगलों को सरेआम कत्ल किया, अनेक युद्धों में विजय दिलवाई और मुगल खान हबीब से खोह की लड़ाई में वीरगति प्राप्त हुए इनके वंशजों ने अनेक मंदिर बनवाए, मुगलों से मंदिर बचाने में वीरगति प्राप्त हुए, अनेक युद्ध में जीत दर्ज कराई, लक्ष्मी जगदीश मंदिर गोनेर की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त हुए जिनकी छतरी गोनेर तालाब पाल पर सुजान सिंह पिचानोत जी के नाम से है। अनेक पिचानोत युद्ध में वीरगति प्राप्त कर भौमिया जी बने जिनके मंदिर, छतरी सभी ताजीम ठिकानों, जागीर में है।

बारह कोटड़ियो मे से नायला के बाद ताजीम ठिकाने सांभरियाँ (सामरिया), सहर (शहर), गोनेर जागीर, भासु जागीर, इसवानो जागीर, ढोगवाडे जागीर के साथ आठ खास चौकी कैरवाड़ा, खारेडा, खेड़ली (वर्तमान नाम खेड़ली पिचनोत) पिपलाई, बरदाला, उड़दीन, अमरगढ़, तलावड़ा थी लेकिन १६३५ के युद्ध में कैरवाड़ा,  खेड़ली खास चौकी पूरी तरह से नष्ट हो गई, पूरा परिवार युद्ध में काम आ गया और केवल खारेडा खास चौकी बची थी। फिर जयपुर राजा जय सिंह जी प्रथम ने १६३५ में ताजीम ठिकाने सांभरियाँ (सामरिया), सहर (शहर) से पांच पांच भाइयों को ४० घोड़े की जागीर देकर पहले बेटे ठिकाना - ढिगावड़ा, अलवर को (14 घोड़े की जागीर मिली।), दूसरे बेटे शिशराम सिंह पिचानोत ठिकाना - कैरवाड़ा, अलवर को (12 घोड़े की जागीर मिली।), तीसरे बेटे ठिकाना - खेड़ली पिचानोत, अलवर को (08 घोड़े की जागीर मिली।), चौथे बेटे ठिकाना - रूपवास, अलवर (4.25 घोड़े की जागीर मिली।), पाचवे बेटे ठिकाना - धोलापलाश, अलवर को (1.75 घोड़े की जागीर मिली।) और भी जागीर देकर अन्य ठिकाने बने वर्तमान ने कुल १२० से अधिक ठिकाने है।

(आठ खास चौकी कैरवाड़ा, खारेडा, खेड़ली (वर्तमान नाम खेड़ली पिचनोत) पिपलाई, बरदाला, उड़दीन, अमरगढ़, तलावड़ा)


सहर (शहर) के बारे में वर्णन

पाचयण सिंह कछवाहा के वंशजो को सहर (शहर) की जागीर मिली। शहर वर्तमान में नादौती ब्लॉक जिला करौली के अंतर्गत आता है। शहर का शाही परिवार कछवाहा पिचानोत राजपूत है, जो महाराजा पृथ्वीराज कछवाहा जी के पुत्र पाचयण सिंह कछवाहा जी वंशज हैं, जिसे 1500 ईस्वी में ठाकुर हरिदास सिंह पिचानोत जी ने बनाया था। पिचानोत के शहर का किला दिल्ली-जयपुर-आगरा के "स्वर्ण त्रिभुज" पर स्थित है। शहर किला के पास एक झील है और इसके घाट पर भित्तिचित्रों के साथ सजाए आठ बहुत ही कलात्मक रूप से तैयार किए गए "चतरियां" हैं। पिचानोत के शहर किले में शेहारा देवी को समर्पित एक प्राचीन मंदिर है। (इतिहास वंशावली के अनुसार - करौली जिले के तहसील नादौती के कस्बा शहर जो कि शहरा माता के नाम से गांव का नाम शहर पड़ा यहां पुराना इतिहास कई युद्घ का गवाह रहा है शहर का ऐतिहासिक दुर्ग। गौरतलब है कि होल्कर के युद्घ में पराक्रम दिखाते हुए राजा हुए भोमिया ठाकुर हुए। रघुनाथ सिंह पिचानोत ने 1767 ईस्वीं में किले में विजयी झंडा फहराया। यहां हुए कई युद्घ का गवाह रहा पिचानोत के शहर का ऐतिहासिक दुर्ग जिसका इतिहास बरसो पुराना है राजाओं ने यहां रियासत कालीन समय में ठिकाने के पांच गांव ओर आठ घोड़े की जागीरी का शहर ठिकाने ने राज किया है। इतिहास की वंशावली ये कहती है कि 1767 ईसवी में शहर के किले का निर्माण राजा रघुनाथ सिंह पिचानौत ने करवाया था। सामरिया ठिकाने के राजा अमान सिंह पिचानोत जी का वंशक्रम ही यहां इस किले की गद्दी पर अंतिम शासक जसवंत सिंह पिचानोत के रूप में चला है ओर जयपुर रियासत कालीन में सामरिया ठिकाने के राजा का निकास बताते हैं। पाचयण सिंह कछवाहा जी को सामरिया का संस्थापक कहा जाने लगा। भारमल सिंह पिचानोत हुए रघुनाथ सिंह पिचानोत ने अशरफ खां से युद्ध में शौर्य का परिचय देते हुए जीत हासिल कर किले में झंडा फहराया है। किले के इतिहास की किंवदंती ये है कि 1516 ईस्वी वर्ष पूर्व मुख्य प्रतिमा का उदभव हुआ यहां शहर के किले में राजा महाराजाओं ने ठिकानों के राज में यहां शहरा माता की स्थापना करवाई गई। भंवर मुन्नाजी ने बताया कि किले के निर्माण से पूर्व अकबर बादशाह जवाहर माधे सिंह के समय में यहां केवल पहाड़ी ही थी। यहां सामरिया ठिकाने के राजा का वंश चला है। आमेर जयपुर के राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाहा जी थे। उनके पुत्र पाचयण सिंह कछवाहा जी हुए पिचानोत के पौत्र विठठलदास सिंह पिचानोत के कनिष्ठ पुत्र हरिदास सिंह पिचानोत से शहर के जागीरदार शासकों को वंशक्रम चला है। ऐसे शिलालेख एवं चन्द्रकवि रचित कर्ण विलास नामक पुस्तक इतिहास काव्य में इन भारमल सिंह पिचानोत के द्वारा प्रदर्शित वीरता और पराक्रमकी गहती प्रशंसा की गई है। शहर के भारमल सिंह पिचानोत भौमिया पूजते है उन्होंने इसी वंश के दुर्जन सिंह पिचानोत अशरफ खां के साथ भीषण युद्घ हुआ उदय सिंह पिचानोत पुत्र जगन्नाथ सिंह पिचानोत पराक्रमी राजा होने के साथ युद्घ में वीर गति प्राप्त की एवं गढ़ पर होल्कर की सेना में 1767 ईसी. में रघुनाथ सिंह पिचानोत ने युद्घ में शौर्य का परिचय देते हुए यहां किले में झंडा फहराया एवं अंतिम शासक जयवंत सिंह पिचानोत जी रहे जिनके भोजराज सिंह पिचानोत हैं शहरा माता की प्रतिमा है किले की शान - शहरा माता की मूर्ति को राजाओं ने रियासतकाल में यहां किले में स्थापित करवाया गया है एवं शक्ति देवी के रूप मे शहरा माता की पूजा कर बड़ी बड़ी लड़ाई भी लड़ी है इसके बाद पिचानोत गौत्र के राजपूत जागीरदारों द्वारा किले के मध्य एक शिला पर मंदिर निर्माण के साथ ही शिल्पकारों के द्वारा शहरा माता की प्रतिमा गढ़ कर प्राण प्रतिष्ठा कराई गई। इस मंदिर में करीब ढाई तीन फीट की प्रतिमा यहां स्थापित है जिसे बाद में राजाओं के समय में किले निर्माण के बाद देवी शहरा माता की विशाल प्रतिमा स्थापित की गई जिसकी पुराने समय से ही छत्रिय राजा रानी विशेष पूजा अर्चना करते आए है।)

गोनेर जागीर  के बारे में वर्णन

पिचानोत राजपूतों की गोनेर जागीर पर अधिकार रहा, किसी तरह की कोई समस्या नही आ रही थी सब मजे में अपना जीवन यापन कर रहे थे। लेकिन 1681 में जब जयपुर शासक रामसिंह जी प्रथम काबुल एक युद्ध अभियान पर गए थे तो उनके पीछे से 14 मई सन् 1681 को स्वयं मुगल औरंगजेब विशाल सेना लेकर गोनेर जगदीश मंदिर तोड़ने आया। जिसकी सूचना मिलने पर पूरा पिचानोत ठिकाने, जागीर गोनेर में इकट्ठा हो गए और मुगल सेना से बहुत भयकर युद्ध किया. युद्ध में लड़ते हुए सुजान सिंह पिचानोत का सिर गोनेर मंदिर से 1 km दक्षिण में कट कर गिर गया था और धड़ मुगलों से लड़ता, काटता, मुगल सेना को पिछे धकेलता हुआ गोनेर के बाहर उत्तर दिशा में तालाब की पाल पर, 1 किमी उत्तर दिशा में जाकर शाँत हुआ। उनकी एक विशाल छतरी बनी हुई है। जो भौमिया जी के नाम से प्रसिद्ध और पूजे जाते हैं। इस तरह से पिचानोत राजपूतों का बलिदान गोनेर के श्री लक्ष्मी जगदीश महाराज मंदिर को बचाने में काम आया, गोनेर की पाल पर सुजान सिंह पिचानोत भौमिया जी के नाम से प्रसिद्ध हुए। फिर गोनेर के मंदिर का निर्माण दुबारा से करवाया और पिचानोत राजपूतों ने अपने ताजीम ठिकाने सांभरियाँ (सामरिया) में पहले से बना सीता राम जी मन्दिर का डिजाइन लेकर उसी की तर्ज पर गोनेर में वापिस से जगदीश जी का मंदिर का निर्माण करवाया, दोनो मंदिरों का डिजाइन एक समान है इस तरह से पिचानोत राजपूतों ने अपनी गोनेर जागीर को और श्री लक्ष्मी जगदीश मंदिर के लिए बलिदान देकर फिर से खड़ा कर दिया, श्री लक्ष्मी जगदीश मंदिर को जयपुर का वृंदावन भी कहा जाता है यह प्रसिद्ध धामिक नगरी मानी जाती है

आठ खास चौकी के बारे में वर्णन

आठ खास चौकी कैरवाड़ा, खारेडा, खेड़ली (वर्तमान नाम खेड़ली पिचनोत) पिपलाई, बरदाला, उड़दीन, अमरगढ़, तलावड़ा थी लेकिन १६३५ के युद्ध में कैरवाड़ा, खेड़ली खास चौकी पूरी तरह से नष्ट हो गई, पूरा परिवार युद्ध में काम आ गया और केवल खारेडा खास चौकी बची थी। फिर जयपुर राजा जय सिंह जी प्रथम ने १६३५ में ताजीम ठिकाने सांभरियाँ (सामरिया), सहर (शहर) से पांच पांच भाइयों को ४० घोड़े की जागीर देकर ) पहले बेटे ठिकाना - ढिगावड़ा, अलवर को (14 घोड़े की जागीर मिली।), दूसरे बेटे शिशराम सिंह पिचानोत ठिकाना - कैरवाड़ा, अलवर को (12 घोड़े की जागीर मिली।), तीसरे बेटे ठिकाना - खेड़ली पिचानोत, अलवर को (08 घोड़े की जागीर मिली।), चौथे बेटे ठिकाना - रूपवास, अलवर (4.25 घोड़े की जागीर मिली।), पाचवे बेटे ठिकाना - धोलापलाश, अलवर को (1.75 घोड़े की जागीर मिली।)

ठिकाना कैरवाड़ा (12 घोड़े की जागीर)

ठिकाना कैरवाड़ा तीन बार नष्ट हो गया था, अंतिम बार ये पिचानोत राजपूतों की खास चौकी थी, जो सीधा जयपुर राजवंश के अधीन में थी उस समय पर आठ खास चौकी में से  कैरवाड़ा, खेड़ली खास चौकी पूरी तरह से नष्ट हो गई, पूरा परिवार युद्ध में काम आ गया और केवल खारेडा खास चौकी बची थी। तब जयपुर राजा जय सिंह जी प्रथम ने १६३५ में ताजीम ठिकाने सांभरियाँ (सामरिया), सहर (शहर) से पांच पांच भाइयों को ४० घोड़े की जागीर देकर फिर से कैरवाड़ा को बसाया.  इस तरह से १६३५ में फिर से पांच भाइयों ने मिलकर अनेक युद्ध में हिस्सा लिया और अपनी ४० घोड़े की जागीर को बचा कर रखा लेकिन जयपुर राजवंश की तरफ से युद्ध अभियान में लड़ते हुए अपने पिचानोत राजपूत भोमिया जी बने।

·         पहले बेटे ठिकाना - ढिगावड़ा, अलवर को (14 घोड़े की जागीर मिली।)

·         दूसरे बेटे शिशराम सिंह पिचानोत ठिकाना - कैरवाड़ा, अलवर को (12 घोड़े की जागीर मिली।)

·         तीसरे बेटे ठिकाना - खेड़ली पिचानोत, अलवर को (08 घोड़े की जागीर मिली।)

·         चौथे बेटे ठिकाना - रूपवास, अलवर (4.25 घोड़े की जागीर मिली।)

·         पाचवे बेटे ठिकाना - धोलापलाश, अलवर को (1.75 घोड़े की जागीर मिली।)

ठाकुर साहब शीशराम सिंह पिचानोत जी अपने साथ ताजीम ठिकाने सांभरियाँ (सामरिया), सहर (शहर) से अपने साथ में एक नाई, एक राणा और एक कुम्हार को लेकर आए थे उस समय कैरवाड़ा बिल्कुल वीरान उजड़ा नष्ट हो गया था इसलिए फिर वापस से कैरवाड़ा को १२ घोड़े की जागीर में बसाया

वर्तमान मै कैरवाड़ा ग्राम पंचायत, मालाखेड़ा तहसील (से 09 किलोमीटर की दूरी) के अलवर जिले से 14 किलोमीटर की दूरी ओर जयपुर से 142 किलोमीटर और दिल्ली से 150 किलोमीटर की दूरी पर बसा हुआ हैं। अभी कैरवाड़ा (अलवर) दिल्ली एनसीआर में हैं।

ठाकुर साहब शिशराम सिंह पिचानोत जी ठिकाना कैरवाड़ा अस्थाई रुप से रहने लगे, और उनके बाद उनके बेटे ठाकुर साहब राज सिंह पिचानोत संवत १६९० से ठिकाना कैरवाड़ा में स्थाई रूप से निवास करने लगे।

ठाकुर साहब राज सिंह के पांच बेटे 1. ठाकुर साहब जोरावर सिंह पिचानोत, 2. ठाकुर साहब गुमान सिंह पिचानोत, 3. ठाकुर साहब धन सिंह पिचानोत, 4. ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत, 5. ठाकुर साहब संग्राम सिंह पिचानोत।

1. ठाकुर साहब जोरावर सिंह पिचानोत - ठाकुर साहब जोरावर सिंह पिचानोत का वंश आगे नही चला।

2. ठाकुर साहब गुमान सिंह पिचानोत - ठाकुर साहब गुमान सिंह पिचानोत के चार लड़के जिनमे देवी सिंह पिचानोत, राम सिंह पिचानोत, अखे सिंह पिचानोत, पंध सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     अखे सिंह पिचानोत जी के चार लड़के जिनमे गोविन्द सिंह पिचानोत, सावंत सिंह पिचानोत, विसल सिंह पिचानोत, सोहल सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     ठाकुर साहब गुमान सिंह पिचानोत के पोते (अखे सिंह पिचानोत के बेटे) सावंत सिंह पिचानोत के चार बेटे जिनमे बख्तावर सिंह पिचानोत, पिरथी सिंह पिचानोत, मान सिंह पिचानोत,और मोती सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

3. ठाकुर साहब धन सिंह पिचानोत - ठाकुर साहब धन सिंह पिचानोत का वंश आगे नही चला।

4. ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत (बड़ी छतरी ओर भोमिया जी महाराज) - ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत के दो बेटे धीरज सिंह पिचानोत, मोहन सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     ठाकुर साहब धीरज सिंह पिचानोत के बेटे जिनमे गुलाब सिंह पिचानोत, संगराम सिंह पिचानोत, सोहल सिंह पिचानोत, भूप सिंह पिचानोत, सालिम सिंह पिचानोत, नवल सिंह पिचानोत, विसन सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

1. (ठाकुर साहब धीरज सिंह पिचानोत जी का वंश)

(ठाकुर साहब धीरज सिंह पिचानोत के बेटे गुलाब सिंह पिचानोत जी का वंश)

     ठाकुर साहब धीरज सिंह पिचानोत के के बेटे गुलाब सिंह पिचानोत ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और चार बेटे मगल सिंह पिचानोत, हाकिम सिंह पिचानोत, छीतर सिंह पिचानोत (छोटी छतरी, भोमियाजी महाराज), रणजीत सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

(ठाकुर साहब गुलाब सिंह पिचानोत के बेटे रणजीत सिंह पिचानोत जी का वंश)

     गुलाब सिंह पिचानोत के बेटे रणजीत सिंह पिचानोत ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और चार बेटे मोहन सिंह पिचानोत, सुल्तान सिंह पिचानोत, भीम सिंह पिचानोत (दुसरा नाम - दुर्जन सिंह), पध सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     रणजीत सिंह पिचानोत के बेटे मोहन सिंह पिचानोत ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और चार बेटे जीवन सिंह पिचानोत, नादरा सिंह पिचानोत, भगवंत सिंह पिचानोत, हरेनाथ सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     मोहन सिंह पिचानोत के बेटे भगवंत सिंह पिचानोत ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और तीन बेटे मलजी पिचानोत, ननुलाल सिंह पिचानोत, किशन सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     (ठाकुर साहब रणजीत सिंह पिचानोत के बेटे भीम सिंह पिचानोत (दुर्जन सिंह) जी का वंश)

     रणजीत सिंह पिचानोत के बेटे भीम सिंह पिचानोत (दुसरा नाम - दुर्जन सिंह) ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और सोहल सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     ठाकुर साहब भीम सिंह पिचानोत (दुसरा नाम - दुर्जन सिंह) के के बेटे सोहल सिंह पिचानोत ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और सोहल सिंह पिचानोत के बेटे रघुमान सिंह पिचानोत, बखतावार सिंह पिचानोत, इन्द्र सिंह पिचानोत, कानसिंह पिचानोत, अमृत सिंह पिचानोत, दोलत सिंह पिचानोत, सुजान सिंह पिचानोत, सहजमरण सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     सोहल सिंह पिचानोत के बेटे अमृत सिंह पिचानोत ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और तीन बेटे हाथी सिंह पिचानोत, फूल सिंह पिचानोत, चमन सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

 •     अमृत सिंह पिचानोत के बड़े बेटे हाथी सिंह पिचानोत ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और चार बेटे शिवप्रसाद सिंह पिचानोत, मेहताब सिंह पिचानोत, सुगन सिंह पिचानोत, गोविन्द सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     अमृत सिंह पिचानोत के दूसरे नंबर वाले बेटे फूल सिंह पिचानोत ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और सुगन सिंह जी को गोद लिया और अपना वंश सुगन सिंह जी को गोद लेकर बढ़ाया।

     हाथी सिंह पिचानोत के बेटे गोविन्द सिंह पिचानोत ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और दो बेटे भागीरथ सिंह पिचानोत, सीताराम सिंह पिचानोत को जन्म दिया।

     हाथी सिंह पिचानोत के सबसे बड़े बेटे शिवप्रसाद सिंह पिचानोत ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और शिवप्रसाद सिंह पिचानोत ने एक बेटे को जन्म दिया उनका नाम भवर सिंह पिचानोत रखा गया।

     ठाकुर साहब भवर सिंह पिचानोत ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और तीन बेटे तेज सिंह पिचानोत, उमेद सिंह पिचानोत, केहरि सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया। •      ठाकुर साहब केहरि सिंह पिचानोत के दो बेटे हैं धर्मेंद्र सिंह पिचानोत और पुरेन्द्र सिंह पिचानोत

     पुरेन्द्र सिंह पिचानोत के बेटे पार्थ सिंह पिचानोत ने जन्म लिया।

(ठाकुर साहब धीरज सिंह पिचानोत के बेटे संग्राम सिंह पिचानोत जी का वंश)

•     ठाकुर साहब धीरज सिंह पिचानोत के बेटे संग्राम सिंह पिचानोत जी ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और पदम सिंह जी को गोद लिया, पदम सिंह जी किशन सिंह जी के बेटे थे उनको  संग्राम सिंह पिचानोत जी ने गोद लेकर अपना वंश आगे बढ़ाया। इस प्रकार पदम सिंह के नाम से संग्राम सिंह पिचानोत जी का वंश आगे चला।

(ठाकुर साहब धीरज सिंह पिचानोत के बेटे भूप सिंह पिचानोत जी का वंश)

     ठाकुर साहब  धीरज सिंह पिचानोत के के बेटे भूप सिंह पिचानोत जी ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया। भूप सिंह पिचानोत जी ने बेरीसाल सिंह और सुल्तान सिंह जी के बेटे चपरा सिंह जी को भी गोद लिया। अर्थात भूप सिंह पिचानोत जी ने बेरीसाल सिंह और चपरा सिंह जी को भी गोद लिया।

•     बेरीसाल सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और उनके बेटे गंगा सिंह पिचानोत जी, शिवचरन सिंह पिचानोत, सादुल सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     गंगा सिंह पिचानोत के बेटे गोवर्धन सिंह पिचानोत जी, जसवंत सिंह पिचानोत जी, बहादुर सिंह पिचानोत जी, उमराव सिंह पिचानोत जी, माधो सिंह पिचानोत जी, सम्पत सिंह पिचानोत जी ने जन्म लिया लेकिन गंगा सिंह पिचानोत जी के तीन बेटो की आस्मिक मृत्यु हो गयी उनमे से गोवर्धन सिंह पिचानोत जी, जसवंत सिंह पिचानोत जी, बहादुर सिंह पिचानोत जी ये तीन थे जिनकी आस्मिक मृत्यु हो गयी थी। गंगा सिंह पिचानोत जी के तीन बेटो की आस्मिक मृत्यु होने के कारण उन्होंने गोद लिया था। इस प्रकार गंगा सिंह पिचानोत जी का वंश आगे चला।

     शिवचरन सिंह पिचानोत जी के बेटे शिम्भू सिंह पिचानोत जी, माधो सिंह पिचानोत जी ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     शिम्भू सिंह पिचानोत जी के बेटे ग्यान सिंह पिचानोत जी, साधु सिंह पिचानोत जी, चाँद सिंह पिचानोत जी ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     चपरा सिंह पिचानोत जी के दो बेटो ने जन्म लिया उनमे से केसरी सिंह पिचानोत जी और बने सिंह पिचानोत जी थे इस प्रकार भूप सिंह पिचानोत जी का वंश चपरा सिंह पिचानोत ने बढ़ाया।

     माधो सिंह पिचानोत जी के बेटे भवर सिंह पिचानोत, सवाई सिंह पिचानोत, किशोर सिंह पिचानोत जी, भवानी सिंह पिचानोत, विकृम सिंह पिचानोत, कल्याण सिंह पिचानोत, अमर सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     सवाई सिंह पिचानोत के बेटे विजय सिंह पिचानोत पुराने कैरवाडा मे रहते हैं। भवानी सिंह पिचानोत के बेटे ओमकार सिंह पिचानोत, दशरथ सिंह पिचानोत, अशोक सिंह पिचानोत और विकृम सिंह पिचानोत के बेटे विनोद सिंह पिचानोत,

सुरेश सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

(ठाकुर साहब धीरज सिंह पिचानोत के बेटे विसन सिंह पिचानोत जी का वंश)

     ठाकुर साहब विसन सिंह पिचानोत जी के तीन बेटो ने जन्म लिया उनमे से जीवन सिंह पिचानोत जी, अर्जुन सिंह पिचानोत जी और चमन सिंह पिचानोत जी और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     जीवन सिंह पिचानोत जी ने गोद लिए केसरी सिंह जी और बने सिंह जी को और अपना वंश आगे बढ़ाया। केसरी सिंह जी और बने सिंह जी दोनों चंदर सिंह जी के बेटे थे जिने जीवन सिंह पिचानोत जी ने गोद ले लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     जीवन सिंह पिचानोत जी के बेटे केसरी सिंह पिचानोत जी ने अपना वंश आगे बढ़ाया और उनके बेटा शिम्भू सिंह पिचानोत जी ने जन्म लिया।

     अर्जुन सिंह पिचानोत जी ने अपना वंश आगे बढ़ाया और उनके बेटा हनुत सिंह पिचानोत जी और चंदर सिंह पिचानोत जी जो की गोद गए जीवन सिंह पिचानोत जी के इस प्रकार इनका वंश चला।

2. (ठाकुर साहब मोहन सिंह पिचानोत जी का वंश)

     ठाकुर साहब  मोहन  सिंह पिचानोत जी के बेटे माधो सिंह पिचानोत और रघुनाथ सिंह पिचानोत ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया।

5. ठाकुर साहब संग्राम सिंह पिचानोत - ठाकुर साहब संग्राम सिंह पिचानोत के गोद आये सुर्जन सिंह पिचानोत, दुर्जन सिंह पिचानोत, और बक्स सिंह पिचानोत जी, ये तीन बेटे ठाकुर साहब संग्राम सिंह पिचानोत ने गोद लिये थे।

ठिकाना कैरवाड़ा, अलवर (राजस्थान) कि एक विधवा यहा से चली गई उसके पेट में बच्चा रह गया और उसी बच्चे से गोविन्दगढ, अलवर (राजस्थान) मे कैरवाडा पिचानोत का वंश चल रहा है भवानी सिंह पिचानोत जी और उनको बताई पुरवजो के अनुसार अभी तक ठिकाना कैरवाड़ा, अलवर (राजस्थान) से निकास ले चुके पिचानोत परिवार के (1) गोविन्दगढ, अलवर (राजस्थान), (2) राजगढ, अलवर (राजस्थान), (3) ढिगावडा, अलवर (राजस्थान), (4) पावटा (खेडली के पास) अलवर (राजस्थान) के ठिकानो मे निवास कर रहे हैं जो ठिकाना कैरवाडा अलवर (राजस्थान) के पिचानोत परिवार के सदस्य है।


भोमिया शब्द

यह इतिहास बहुत पुराना है परन्तु उतना ही सच है। यह इतिहास ठिकाना कैरवाड़ा अलवर, राजस्थान का है। भोमिया शब्द जागीरदारों के लिए उपयोग किया गया राजस्थान के अंदर सर्वाधिक भोमिया पाए जाते हैं। जागीरदारों की मृत्यु के बाद पुरानी देवी देवताओं के दारा उनको देव योनी के अंदर प्रवेश लिया जाता है। और उन्हें कलयुग का देवता के रूप में लोगों की समस्या को हल करने के लिए उनकी आत्मा को एक मूर्ति के रूप में इस धरती पर प्रतिष्ठित करते हैं। राजस्थान के लगभग हर गांव में कई भोमियाजी है। उनके अंदर दैविक शक्ति होती है। जिससे वह लोगों की समस्याओं को हल करते हैं। वे संपूर्ण देव न होकर अर्द्ध देव कहलाते हैं।

श्री श्री १००८ श्री भौमिया जी ठिकाना कैरवाड़ा अलवर का इतिहास

ठाकुर साहब शिशराम सिंह पिचानोत जी  ठिकाना कैरवाड़ा  और उनके बाद उनके बेटे ठाकुर साहब राज सिंह पिचानोत संवत १६९० से ठिकाना कैरवाड़ा में स्थाई रूप से निवास करने लगे। ठाकुर साहब राज सिंह पिचानोत के पाँच बेटे उनमे से बेटे ठाकुर साहब जोरावर सिंह पिचानोत, ठाकुर साहब गुमान सिंह पिचानोत, ठाकुर साहब धन सिंह पिचानोत, ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत, ठाकुर साहब संग्राम सिंह पिचानोत। ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत शांत स्वभाव के थे। ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत के घर में दो बेटे ठाकुर साहब धीरज सिंह पिचानोत, ठाकुर साहब मोहन सिंह पिचानोत ने जन्म लिए, एक दिन ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत ने अपने दोनों बेटो को पास बुलाया और उनसे कहा की मेरी एक अंतिम इच्छा हैं कि मेरे मरने के बाद मेरे शरीर को अग्नि मत देना मुझे साधु, महात्माओ की तरह मिट्टी दे देना। और कुछ दिनों बाद फिर से युद्ध शुरु हो गया और ठाकुर साहब सायब सिह पिचानोत आमेर (जयपुर) की और से युद्ध भूमि में युद्ध करने गये ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत इस बार के युद्ध में बहुत साहस से लड़े थे। लेकिन उनको युद्ध में तलवार लग गयी। और इस प्रकार से ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत युद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए। और युद्ध में पराक्रम दिखाते हुए ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत हुए भोमिया ठाकुर हुए।

ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत का दाह संस्कार।

हिन्दू सनातन धर्म में पार्थिव शरीर को दाह संस्कार करने का नियम है। सनातन धर्म में साधु को समाधि और सामान्यजनों का दाह संस्कार किया जाता है। इसके पीछे कई कारण हैं। साधु को समाधि इसलिए दी जाती है। क्योंकि ध्यान और साधना से उसका शरीर एक विशेष उर्जा लिए हुए होता है। इसलिए उसकी शारीरिक ऊर्जा को प्राकृतिक रूप से विसरित होने दिया जाता है। और परिवार और समाज के लोगों ने ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत जी की अंतिम इच्छा को एक सिरे से खारिज कर दिया, और कहते हैं ना विधि के विधान को कोई नहीं बदल सकता है। और हिन्दू धर्म के अनुसार ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत जी की अर्थी तैयार की गयी ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत जी की अर्थी को अग्नि देने के लिए शमसान में ले आये और ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत जी को अग्नि देने के लिए लकडिया लगा दी गयी और पुरे विधि विधान के साथ अग्नि उनके बड़े बेटे धीरज सिंह पिचानोत जी पास में आ गये तभी एक आकाशवाणी हुई आसमान से आवाज आने लगी फूलो की बारिश होने लगी और तब तक आसमान से बहुत तेज आवाज के साथ एक सिला (बहुत बड़ा पत्थर) आकर पड़ा ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत जी का शव जमीन में अन्दर चला गया, इस प्रकार से ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत जी का शव समस्त लकड़ियों के साथ धरती में समा गया और केवल ऊपर सिला नजर आने लगी।

श्री श्री १००८ श्री भोमियाजी महाराज का चमत्कार

हाथरस (उत्तर प्रदेश) के पास कोई सेठ रहता था। उसके कोई संतान नहीं थी। तो श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी (ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत जी) ने उनको एक सपना दिया की कैरवाड़ा में जाकर वहा क्षत्रिय पिचानोत राजपूतो का एक शमसान घाट हैं। वहा पर जाकर मेरा मन्दिर बन जायेगा तो आपके संतान हो जाएगी। सेठ कैरवाड़ा में पहुंच गया। और अपना सपना गाव के लोगों को बताने लगा और वहा सेठ ने भोमियाजी का मंदिर तैयार करा दिया। और उस सेठ को संतान हो गयी। उसी सेठ ने श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी (ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत जी) का दूसरा मंदिर हाथरस में जाकर बनवाया जो कि घंटा घर के पास हाथरस में ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत जी (भोमिया जी) के नाम से जाना जाता हैं।

श्री श्री १००८ श्री भोमियाजी महाराज की मान्यता सभी जगह फैलने लग गयी और दूर दूर से भक्त गण आने लगे तो राजपूत समाज ने वहा राजपूत शमसान घाट बंद कर दिया और उस जगह पर बगीचा बना दिया जब सभी की मनोकामना पूर्ण होने लगी तो धीरे - धीरे यहा लोग यहा आने लगे।

हर साल यहा श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज का मेला लगता हैं। जब फसल कट जाती है। तब गर्मियों में पीपल पुणु का मेला भरता है मेले में अनेको दुकाने आती हैं। साथ में विशाल कुश्ती ढ़गल भी होता है कुश्ती में भाग लेने अनेको पहलवान आते है। पीपल पुणु को अभुज सावा होने के कारण भी भक्त आते है। श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज को प्रसाद चढ़ाते है। और कुश्ती एवम मेला का हिस्सा बनते हैं कुछ मन्नत मांगते हुए पेट के बल परिक्रमा लगाते हैं। और शादी होने के बाद जोड़े से लोग श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज का ढोक देने एवं प्रसाद चढ़ाने आते हैं। साथ में कुछ यहा अपने बच्चे का जडूला उतरवाने भी आते हैं। श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज की सेवा करने वाले मंदिर के साधु महंत भोलागिरी बताते है की भोमिया जी के प्रसाद रविवार और बृहस्पतिवार के साथ हर महीने की पुणु को चढ़ाया जाता हैं। श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज की दो छतरी हैं। जो सबसे बड़ी छतरी तो ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत जी की हैं। और छोटी छतरी ठाकुर साहब छीतर सिंह पिचानोत जी की हैं।

पीपल पुणु का मेला भरता है। मेले में अनेको दुकाने आती हैं। साथ में विशाल कुश्ती ढ़गल भी होता है कुश्ती में भाग लेने अनेको पहलवान आते है। पीपल पुणु को अभुज सावा होने के कारण भी भक्त आते है। श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज को प्रसाद चढ़ाते है। और कुश्ती एवम मेला का हिस्सा बनते हैं।

ठिकाना कैरवाड़ा के ठाकुर शीशराम सिंह पिचानोत जी ने जल संरक्षण के लिए बहुत अच्छा कार्य किया, कैरवाड़ा में 21 तालाबों का निर्माण करवाया जो की मालाखेड़ा तहसील के रिकॉर्ड में मौजूद हैं। इसके अलावा उनके वंशजों ने अनेक भूमि अपने साथ लेकर आए राणा, कुम्हार, नाईयो को दान में दी और उसके बाद में ठिकाना कैरवाड़ा में अनेक अन्य जातियों मीणा चौकीदार और जमींदार, नाथ, पंडित अन्य जातियों को भी भूमि दान में देकर बसाया। पिचानोत राजपूतों ने अपनी शमशान घाट की भूमि जहा पर ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत और ठाकुर साहब छीतर सिंह पिचानोत का मंदिर बना है अपनी उस शमसान भूमि का कुछ हिस्सा सरकारी स्कूल को दान देकर ठिकाना कैरवाड़ा में सरकारी स्कूल बनी, शेष 40 बीघा शमशान घाट की भूमि को भोमिया जी महाराज के मंदिर के लिए छोड़ दी जिसे भी कुछ लोगों ने कब्जा कर लिया और 40 बीघा का श्मशान भूमि घट कर केवल 2 बीघा रह गई है। सरकारी रिकॉर्ड तहसील मालाखेड़ा का अध्यन करने पर पता चलता है की 1952 तक केवल पिचानोत राजपूतों के नाम पूरी जमीन थी और ठाकुर साहब भवर सिंह पिचानोत जी ने 2 बीघा जमीन भौमिया जी मन्दिर के नाम दान की ओर नाथ जी के लिए महादेव मंदिर नाम से जमीन दान में दी इसके अलावा जो पहले नर सिंह जी का मंदिर था उसका निर्माण भी ठाकुर साहब भवर सिंह पिचानोत ने करवाया था और रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने ही वो जमीन नर सिंह जी मंदिर के लिए दान में दी थी, जिसकी मूर्ति चोरी हो जाने के कारण अब वहा पर गणेश जी मन्दिर है। कैरवाड़ा के अंर्तगत आज जो ये तकिया का बास, मीणा बास और घीवर बास गांव बने हैं वो कैरवाड़ा जागीर के छोटे छोटे टुकड़े थे।

 ठिकाना जीरणा पिचाणौत का इतिहास

जीरणा गाँव पर प्रारंभ में धाकड़ जाति का नियंत्रण था। उन्होंने जयपुर कछवाहा राजवंश को कर (टैक्स) देना बंद कर दिया था, जिससे जयपुर दरबार नाराज हो गया। इस स्थिति में, सन् 1772 में मालूपाड़ा ठिकाने से जैत सिंह पिचाणौत जी अपनी माता के साथ मात्र 17 वर्ष की आयु में जीरणा गाँव आए। यहाँ उन्होंने देखा कि धाकड़ जाति ने गाँव पर कब्जा कर रखा है और कोई कर नहीं चुका रहा है।

जैत सिंह पिचाणौत जी ने धाकड़ों के खिलाफ युद्ध किया, जिसमें उन्होंने विजय प्राप्त की और जीरणा गाँव को पिचाणौत जागीर में शामिल कर लिया। इसके बाद जीरणा से कर पुनः जयपुर दरबार भेजा जाने लगा। इस योगदान और वीरता से प्रसन्न होकर जयपुर नरेश मान सिंह द्वितीय ने जैत सिंह जी को "रावले" की उपाधि प्रदान की और उन्हें 6200 बीघा भूमि की जमींदारी दी।

वंशवृत्त:

  • जैत सिंह पिचाणोत जी के पुत्र थे तिलक सिंह पिचाणोत

  • तिलक सिंह जी के पुत्र हुए पुरुषोत्तम सिंह पिचाणोत, जिन्हें गाँव में भोमिया जी के रूप में पूजा जाता है।

  • वर्तमान में जीरणा ठिकाने में गुलाब सिंह पिचाणोत जी का वंश निवास कर रहा है।



जैरिणाग्रामे प्रथमे, धाकडाः शासनं कृतम्।
न दत्तं करमेकं अपि, कष्वाहानां च विस्मयम्॥
सप्तदशवर्षे बालः, मालूपाटात् स आगतः।
मातरं सह कृत्वा सः, धैर्येण जयसंयतः॥
युद्धे धाकडवैरिणः, जयंतं तमुपागतम्।
पिचाणोतकुले ग्रामः, यः पुनः संयतः स्वयम्॥
करः पुनः प्रेषितो, जयपुरे च प्रतिष्ठितः।
राज्ञा मानसिंहेन च, रावलेति समर्पितः॥
षट्सहस्रद्विशतबीघा, भूमिरूपा समर्पिता।
वीरस्य तस्य यशसां, कीर्तिरस्तु सतां सदा॥
जैतसिंहस्य तनयः, तिलकसिंहः प्रकीर्तितः।
सुतस्तस्य च भूयोऽभूत्, पुरुषोत्तमसंज्ञकः॥
भोमियत्वेन पूज्यश्च, ग्रामे तिष्ठति मंगलम्॥

       तलवाड़ा का इतिहास

तलवाड़ा जागीर का इतिहास लगभग ढाई सौ वर्ष पूर्व से जुड़ा हुआ है, जब यह क्षेत्र पिचानोत ठाकुरों की जागीर हुआ करता था। उस समय गांव के पास की पहाड़ियों में एक विशाल किला स्थित था, जो ठाकुरों की रियासत का प्रमुख केंद्र था। यह किला आज भी गांव के पास मौजूद है और क्षेत्र के गौरवशाली अतीत की निशानी है। ये पिचानोत राजपूतों की सात घोड़े की जागीर थी। खास आठ चौकी में से भी ये एक चौकी थी।

समय के साथ जब ठाकुर परिवार पहाड़ों से उतरकर नीचे मैदान में आकर बसने लगे, तो लोग उन्हें 'तलेवाले' कहने लगे — अर्थात जो लोग "तल" यानी नीचे के स्थान पर बसे। चूंकि उन्होंने अपने घर तालाब के पास बनाए थे, इस कारण वे 'तलवाड़ा' के नाम से प्रसिद्ध हो गए।

धीरे-धीरे यह शब्द बोलचाल में बदलता गया और लोग इन्हें 'तलवाड़ा' कहने लगे। भाषाई बदलाव के साथ इस स्थान का नाम अंततः 'तलवाड़ा' पड़ गया।

तलवाड़ा की ऐतिहासिक पहचान न केवल इसके किले और ठाकुरों की रियासत से जुड़ी है, बल्कि यह गांव अपनी सांस्कृतिक विरासत, सुंदर चित्रकारी वाले मकानों और सामाजिक विकास के लिए भी जाना जाता है। इस जागीर के अंतिम जागीरदार ठाकुर गणपत सिंह पिचानोत जी थे। 


(2) जगमालोत - खगालोत कछवाह और डोगरा राजवंश (जम्मू और कश्मीर राजघराने के संस्थापक)

राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह के बेटे जगमालजी का जन्म रानी बालाबाई उर्फ अपूर्वाकंवर की कोख से हुवा था] जगमालजी को दिग्गी और जोबनेर दो जागीर मिली थी, जगमालजी ने अपने पिता पृथ्वीराजसिंह से झगड़ा करके आमेर छिड़कर अमरकोट में रहने लगे, वंहाँ उन्होंने अमरकोट के राणा पहाड़सिंह की पुत्रि नेतकँवर से शादी करली। जगमालजी के पांच पुत्र हुए खंगारजी, सिंघदेवजी  [सिंघदेवजी की 1554  में एक लड़ाई में म्रत्यु होगयी], सारंगदेवजी [सारंगदेवजी की 1554 में एक लड़ाई में म्रत्यु होगयी ], जयसिंह 'रामचंदजी राणा पहाड़सिंह की म्रत्यु 1549.में हुयी। जो कछवाहों की बारह कोटड़ी में शामिल है। इनके वंशज जगमालोत - खगालोत कछवाह कहलाये  

खंगारोत कछवाह - राव खंगार जी के वंशज खंगारोत कछवाह कहलाते है। जगमालजी के पुत्र और राजा प्रथ्वीराज सिँह [प्रथम] के पोते, राव खंगार जी की 24 पत्त्नीयों से उतपन संतानें खंगारोत कछवाह कहलाते है। खंगारोत कछवाह, कछवाहोँ की बारह कोटङी मेँ शामिल है।

राव खंगार जी के 24 पत्त्नीयां थी जिन में से उन्नीस का ब्यौरा मिलता है जो इस प्रकार है-

01 - पहली शादी [जोधीजी] रानी सुजान कंवर, से जो मारवाड़ के राव नेमा की बेटी और के राव किशनजी की पोती थी । 02 - दूसरी शादी [मेड़तणीजी] रानी कल्याण कंवर, से जो मेड़ता के राव वीरमदेव की बेटी थी । 03 - तीसरी शादी [रडमलोतजी] रानी लाड कंवर,से जो रडमलोत ठाकुर साईंदास की बेटी थी । 04 - चौथी शादी [मंडलावतीजी] रानी आनंद कंवर,से जो बीकानेर में सारूण्डा के ठाकुर संग्राम सिंह की बेटी थी । 05 - पंचवीं शादी [राठौङीजी] रानी फैफकंवर, से जो ठाकुर राम सिंह बुटका [Buatka ] की बेटी थी । 06 - छटवीं शादी [चौहानीजी] रानी बोरांगड़े राव बालकरण की बेटी थी । 07 - सातवीं शादी [चौहानजी] रानी रंगदेकँवर ,जो ददेख [Dadekha ] के राव केसरी सिंह की बेटी थी । 08 - आठवीं शादी की, [चौहानजी] रानी नौरंगदे से, जो बूड़सू [Budsu ] के ठाकुर बिहारीदास की बेटी थी । 09 - नोवीं शादी की, [चौहानजी] रानी केसरदेकँवर से, जो चितावा [Chitawa ] के ठाकुर मानसिंहकी बेटी थी । 10 - दसवीं शादी [चौहानजी] रानी गुमानकंवर, से जो मकराना के ठाकुर भोजराज की बेटी थी । 11 -ग्यारवीं शादी [सोलंकीजी] रानी राजकंवार, से नगर नैनवा [Nagar Nainwa ] के राव बदनसिंह की बेटी थी । 12 - बारहवीं शादी [चौहानजी] रानी सौभागदेकँवर,से जो ठिकाना सेवा [Sewa] ठिकाने केठाकुर करणसिंह की बेटी थी।

13 - तेरहवीं शादी [सौलंकीजी] रानी बीजकंवर, के साथ जो गांवड़ी [Ganvdi] के ठाकुर करण सिंह की पुत्री थी। 14 - चौहदवीं शादी [सौलंकीजी] रानी चंद्रकंवर के साथ, जो टोडारायसिंह [Todaraisingh] ठिकाने के राव राज सिंह की बेटी थी। 15 पन्द्रवीं शादी [सौलंकीजी] रानी रामकंवर के साथ, जो रूपनगर के राव रामचंदकी बेटी थी। 16 सोलहवीं शादी [तंवराणीजी] रानी लाडकंवर के साथ, जो ठाकुर राव पहाडसिंह की बेटी बेटी थी। 17 सतरहवीं शादी [तंवराणीजी] रानी झूमकंवर के साथ, जो बागोली [बागोली] के राव सेसमल की बेटी थी। 18 अठारहवीं शादी [तंवराणीजी] रानी गुलाबकंवर से ,जो ठाकुर वुधसिंह की बेटी थी। 19, उन्नीसवीं शादी [चौहानजी] रानी लाडकंवर, से जो निरवान [Nirwan]ठाकुर मान सिंह की बेटीथी।

इन पंद्रह गांवों या जागीरों में राव खंगार जी के वंसज निवास करते हैं:-

राव खंगार जी के 24 पत्नियों से सोलह पुत्र थे, एक पुत्र की म्रत्यु बहुत ही छोटी उम्र में हो गयी थी, जिसका किसी प्रकार का कोई वंस नहीं चला बाकि बचे पंद्रह पुत्र इस प्रकार थे -:

01 - राघोदास [राघवदास ] - राघोदास को ‘धाना [Dhana] जागीर मिली थी ।

02 - बैरीसाल - बैरीसाल को ‘गुढा [Gudha] जागीर मिली थी।

03 - नारायणदास - नारायणदास को नरैना [Naraina] जागीर मिली थी।

04 - किसनदास - किसनदास को टूडेड [Tuded or Tuder] जागीर मिली थी।

05 - मनोहरदास [जोबनेर [jobner ] और नरैना [Naraina]जागीर मिली थी।

06 - अमरसिंह - अमरसिंह को पनव[Panaw] जागीर मिली थी।

07 - केशोदास - केशोदास को मोरङ [Morad] जागीर मिली थी।

08 - भाकरसिंह - भाकरसिंह को सांखू [SAKHOON] ठिकाना

09 - बाघसिंह - बाघसिंह को (कालख) [Kalakh] जागीर मिली थी।

10 - बुधसिंह

11 - हम्मीरसिंह - हम्मीरसिंह को बघोली [Bagholi] जागीर मिली थी।

12 - गोविन्ददास

13 - तिलोकसिंह - तिलोकसिंह को कामा [Kama] जागीर मिली थी।

14 - बिहारीदास

15 - सबलसिंह - सबलसिंह को सिलावट [Silawat] जागीर मिली थी।

इन गांवों और जागीरों के ठाकुर राव खंगारजी के वंसज बताए जाते हैं-:

दूदू [Dudu], हरसोली [Harsoli], दिग्गी [Diggi ],लाम्बिया [Lambia ], बचूं [Bachun ], बिचून [Bichoon ],बोराज [Boraj ], जाड़ावत [Jadawata ], बांसखोह [Banskhoh ], सवर्दा [Sawarda ], मंद [Manda], अटौली [Atoli ], पलरी [Palri ], झाड़ोली [Jhadoli ], मेहंदवास [Mehndwas ].

कश्मीर में कछवाहा वंश के संस्थापक रामचंद्र खंगारोत ने कुलदेवी जमवाय माता के नाम पर जम्मू शहर बसाकर जमवाय माता का मंदिर बनाया।

आमेर के कछवाहा वंश से निकली खंगारोत शाखा के रामचंद्र ने जम्मू कश्मीर में शासन कायम किया था। 565 रियासतों में जम्मू कश्मीर को सबसे बड़ी रियासत होने का सौभाग्य मिला । कश्मीर के सुल्तान यूसुफ खान ने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की थी । तब अकबर ने आमेर के कच्छावा नरेश भगवंतदास के नेतृत्व में सेना को कश्मीर भेजा था। 28 मार्च 1586 में भगवंतदास ने यूसुफ खान को गिरफ्तार कर अकबर के सामने पेश कर दिया ।

उस युद्ध में भगवान दास के साथ रामचंद्र खंगारोत भी गया था । रामचंद्र ने वीरता का परिचय दिया तब रामचंद्र को कश्मीर का मनसबदार बना दिया गया ।कश्मीर में कच्छावा वंश के संस्थापक रामचंद्र खंगारोत ने कुलदेवी जमवाय माता के नाम पर जम्मू शहर में जमवाय माता का मंदिर बनवाया। जम्मू के पश्चिम में भारत-पाक सीमा पर रामगढ़ गांव बसाया। रामचंद्र के पिता आमेर नरेश पृथ्वीराज के पुत्र जगमालजी थे । डोगरा प्रदेश होने से आमेर के कछवाहा वहां डोगरा कहलाए ।रामचंद्र के बाद में संग्राम देव, हरिदेव ,पृथ्वी सिंह गजे सिंह, सूरत सिंह ,जोरावर सिंह, किशोर सिंह ,गुलाब सिंह महाराजा रहे ।सिक्ख महाराजा रणजीत सिंह की गुलाब सिंह से मित्रता के कारण उनका एक भाई पंजाब का दीवान बना । गुलाब सिंह के बाद रणवीर सिंह, प्रताप सिंह ,हरि सिंह व वर्तमान महाराजा करण सिंह है। आजादी के बाद कर्णी सिंह को कश्मीर का सदरे रियासत बनाया गया। कश्मीर के महाराजाओं का जयपुर के राजाओं से संपर्क बना रहा । कश्मीर महाराजा हरि सिंह जोबनेर आए तब रावल नरेंद्र सिंह के साथ एक थाली में भोजन किया था। बोराज ठिकाने के रिकॉर्ड के मुताबिक राव खंगार का एक पोता गोपीनाथ जम्मू कश्मीर में गोद गया था ।महाराजा गुलाब सिंह के पुत्र रणबीर सिंह ने कश्मीर के लिए दंड संहिता कानून बनाया ।कश्मीर में उनकी दंड संहिता आज भी प्रचलन में है। अंतिम शासक हरि सिंह 1947 तक कश्मीर के महाराजा रहे । उन्होंने विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए थे । हरि सिंह सवाई मानसिंह के राजतिलक में महाराजा सवाई माधव सिंह के निमंत्रण पर जयपुर आए थे। पर्यटन अधिकारी गुलाब सिंह मीठड़ी के पास मौजूद दस्तावेजों के मुताबिक जम्मूवाल,मनकोटिया, जसरोटिया, बनियाल, नारायणी आदि गोत्र के कछवाह कश्मीर के इलाकों में बसे हुए हैं।

 

(3) सांगा सिंह कछवाहा जी  राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह के बेटे सांगासिंह कछवाहा जी का (जन्म रानी बालाबाई उर्फ अपूर्वाकंवर की कोख से, जिसने सांगानेर बसाया), जो कछवाहों की बारह कोटड़ी में शामिल है। आमेर के राजा रतन सिंह जी का साथ देते हुए युध में अपने पाण दे दिए थे

सांगानेर का नाम पुराना नाम संग्रामपुरा था। जयपुर बसने के दो सौ साल पहले आमेर नरेश पृथ्वीराज ने अपने 19 पुत्रों में से एक सांगा सिंह कछवाहा जी को संग्रामपुरा का सामंत बनाया था। अविवाहित रहे सांगा बाबा (सांगा सिंह कछवाहा जी) ने सांगानेर बसाने के पहले बकरे की बलि दी थी। इसके बाद महल, बाग के साथ सुरक्षा के लिए नगर के चारों तरफ परकोटा बनवाया।

सांगानेर में बने चार दरवाजे आमेर, मालपुरा, चाकसू व दौसा दरवाजों के नाम से जाने जाते हैं। शराब के आदि बने आमेर नरेश रतन सिंह कछवाहा जी की कमजोरी का लाभ उठाकर जब मोजमाबाद के सामंत करमचंद व जयमल नरुका ने आमेर रियासत के ४० गांवों को जबरन दबा लिया तो सांगा ने ननिहाल बीकानेर के राव जैतसिंह की सेना को सांगानेर में बुलाकर मोजमाबाद पर हमला किया। इस युद्ध में जयमल व करमचंद नरुका मार गिराए गए। मोजमाबाद के नरुका सामंतों की  सांगा सिंह कछवाहा जी के हाथों हुई हत्या से नाराज मोजमाबाद के स्वामी भक्त चारण काना आढ़ा ने सांगा सिंह कछवाहा जी से बदला लेने की ठान ली। गुप्त तरीके से सांगोनर के महलों में प्रवेश कर काना आढा ने सांगा को कटार से मार दिया। नाथावतों के इतिहास में लिखा है कि काना आढ़ा ने सांगासिंह कछवाहा जी को मारने के बाद खुद भी छुरी से अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। सांगा सिंह कछवाहा जी बहुत बलशाली राजा था। सांगा सिंह कछवाहा जी ने एक बार आमेर के रायमल को दबाया, जिससे उसके शरीर की हड्डियां टूट गई। नि:संतान मरे सांगा सिंह कछवाहा जी के बाद में उनका छोटा भाई भारमल पृथ्वीराजोत सांगानेर का राजा बना।

(4) बालभदरोत कछवाह

राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह के बेटे बलभद्रसिंह का जन्म रानी बालाबाई उर्फ अपूर्वाकंवर की कोख से हुवा था, अचरोल ठिकाने के संस्थापक बलभद्रसिंह थे । बलभद्रसिंह के वंसज बालभदरोत कछवाह कहलाये जो कछवाहों की बारह कोटड़ी में शामिल है।

 

(5) साईंदासोत कछवाह

साईंदासजी के वंसज साईंदासोत कछवाह कहलाये, जो कछवाहों की बारह कोटड़ी में शामिल है। इनके वंशज बड़ोद में है

(6) चतुर्भुजोत कछवाह

राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह के बेटे चतुर्भुजसिंह का जन्म रानी बालाबाई उर्फ अपूर्वाकंवर की कोख से हुवा था, चतुर्भुजसिंह बगरू ठिकाने के संस्थापक थे। चतुर्भुजसिंह के वंसज चतुर्भुजोत कछवाह कहलाये जो कछवाहों की बारह कोटड़ी में सामिल है । ठाकुर चतुर्भुजसिंह के पुत्र हुवा कीरतसिंह जो चतुर्भुजसिंह के बाद बगरू के ठाकुर बने। जो कछवाहों की बारह कोटड़ी में शामिल है।

(7) नाथावत कछवाह

राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह के बेटे गोपालसिंह का (जन्म रानी बालाबाई उर्फ अपूर्वाकंवर की कोख से) गोपालसिंह को चोमू और समोद जागीर मिली, गोपालसिंह की शादी करौली के ठाकुर की पुत्रि सत्यभामा के साथ हुयी थी। जो कछवाहों की बारह कोटड़ी में शामिल है। गोपालजी के पुत्र नाथा जी के वंशज नाथावत कछवाह कहलाते है।

(8) सुलतानोत (सुलतानोता) कछवाह

राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह के बेटे सुरतानसिंह का जन्म रानी बालाबाई उर्फ अपूर्वाकंवर की कोख से हुवा था, सुरतानसिंह सुरौठ ठिकाने के संस्थापक थे। जो कछवाहों की बारह कोटड़ी में शामिल है। सुरतान जी के वंशज सुलतानोत (सुलतानोता) कछवाह कहलाते है।

(9) रामसिंगहोत कछवाह

जो कछवाहों की बारह कोटड़ी में शामिल है। राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह के बेटे रामसिंह के वंसज रामसिंगहोत कछवाह कहलाये

(10) प्रतापपोता कछवाह

जो कछवाहों की बारह कोटड़ी में सामिल है। राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह के बेटे प्रतापसिंह (प्रताप जी) के वंशज प्रतापपोता कछवाह कहलाते है ।

(11) कल्याणोत कछवाह

राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह के बेटे कल्याणदास का जन्म सिसोदिया रानी की कोख से हुवा था, कल्याणदास को कालवाड़ जागीर मिली, कल्याणदास के वंसज कल्याणोत कछवाह कहलाये। जो कछवाहों की बारह कोटड़ी में शामिल है। जिस में पदमपुरा, लोटवाड़ा और कालवाड़ आदि गांव सामिल है।

(12) भिकावत कछवाह

राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह के बेटे भीकाजी के वंसज भिकावत कछवाह कहलाये भीकाजी जो निसंतान रहे, अपुत्र मरे

(13) रुपसिंगहोत कछवाह

रूपसिंह का [रूपसिंह का जन्म गोड़ रानी की कोख से हुवा था, रूपसिंह को दौसा की जागीर मिली थी। रूपसिंह के वंसज रुपसिंगहोत कछवाह कहलाये] रूपसिंह की म्रत्यु 4 नवम्बर 1562 को हुयी थी। अजमेर के पास रूप नगर इन्होने ही बसाया था

 

राजा पूरणमल सिंह कछवाहा (ये राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह के बेटे है।) (1527-1534) (पीढ़ी २७६)  और पूरणमलोत कछवाह

पूरणमल का [जन्म तंवर रानी की कोख से, दूसरा पुत्र] राजा पृथ्वीराजसिंह की 1527 में म्रत्यु के बाद राजा पूरणमल का जन्म 5 नवम्बर 1527 को तंवर रानी की कोख से हुवा था। राजा पूरणमल आमेर के नवें राजा थे जिनका शासनकल 1527 से 1534 तक रहा है। राजा पूरणमल को निमेरा की जागीर मिली थी, राजा पूरणमल की शादी एक राठौड़ रानी से हुयी थी जिससे उत्पन संतानें पूरणमलोत कछवाह कहलाये जो कछवाह राजपरिवार की बारह कोटड़ी में  शामिल है। पूरनमल भारमल के ज्येष्ठ भाई थे, राजा पूरनमल, मुग़ल बादशाह हुमायूं के पक्ष में लड़ाई कर बयाना के किले पर अधिकार कराने में सहायता करते हुए 1534 में मंडरायल की लड़ाई में मारे गए। उसका सूरजमल या सूजासिंह नाम का बेटा था। लेकिन उस समय सूजासिंह [सुजामल] उम्र में बहुत छोटे थे । उसे राजा नहीं बनने दिया और पूरनमल के छोटे भाई भीम सिंह को आमेर का सिंहासन दे दिया गया। भीम सिंह के बाद उसके बेटे राजा रतन सिंह और बाद में सन 1548, में राजा भारमल को राजा बना दिया गया था। [वर्तमान मे मंडरायल' राजस्थान राज्य के करौली जिले का एक क़स्बा है जो जयपुर से 160 किमी दूर है]

राजा भीम सिंह कछवाहा (ये भी राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह के बेटे है।) (1534-1537) (पीढ़ी २७७)

भीमसिंह का [जन्म रानी बालाबाई उर्फ अपूर्वाकंवर की कोख से) आमेर के राजा भीम सिंह कछवाहा जी (1534-1537) हुए फिर राजा रतन सिंह कछवाह जी (1537-1548) ये राजा भीम सिंह कछवाहा जी के बेटे थे राजा भीम सिंह कछवाहा जी आमेर के राजा बने और उनके बेटे राजा रतन सिंह कछवाह जी भी इनके बाद में आमेर के राजा बने।


राजा रतन सिंह कछवाह (ये राजा भीम सिंह कछवाहा के बेटे है।) (1537-1548) (पीढ़ी २७८)

राजा भारमल सिंह कछवाहा (ये भी राजा पृथ्वीराज सिंह कछवाह के बेटे है।) (1548-1574) (पीढ़ी २७९)

भारमल का [जन्म रानी बालाबाई उर्फ अपूर्वाकंवर की कोख से) आमेर के राजा भारमल सिंह कछवाहा जी (1548-1574) हुए आमेर के राजा बने। भारमल कछवाह जी का [जन्म रानी बालाबाई उर्फ अपूर्वाकंवर की कोख से,चौथा पुत्र] राजा पृथ्वीराजसिंह कछवाह जी के पुत्र और आमेर के सातवें राजा चन्द्रसेन कछवाह जी के पोते थे। भारमल कछवाह जी ने बहुत सी शादियाँ कि थी, भारमल कछवाह जी कि पहली शादी रानी बदन कँवर से हुयी थी।, दूसरी शादी -चम्पावत कँवर से हुयी थी जो सोलंकी राजा राव गंगासिँह की पुत्री थी।  भारमल कछवाह जी के ग्यारह पुत्र व एक पुत्री थी, भारमल कछवाह जी की म्रत्यु 27 जनवरी 1574 को हुयी थी। भारमल जी का शासन 1 जून 1548 से 27 जनवरी 1574 तक बताया जाता है।

भारमल जी के ग्यारह पुत्र व एक पुत्री थी, जिन में से केवल पांच पुत्रों को ही पूर्ण पुत्रों का दर्जा प्राप्त था बाकि सात पुत्र -पुत्रि केवल दासी पुत्र-पुत्रि थे ।

     01 -भगवानदास जी - भगवानदास जी (भगवानदास जी जन्म रानी बदन कँवर से) इन को ठिकाना लावन मिला तथा अकबर ने इनकी बहादूरी से खुश होकर "बाँके राजा" की उपाधी दि थी।

     02 -भगवंतदास जी - भगवंतदास जी (भगवंतदास जी जन्म रानी बदन कँवर से)

     03 -जगन्नाथसिह - जगन्नाथसिह (जन्म रानी सोलंकी से जिनकी म्रत्यु 1585 मेँ हुयी थी)

     04 – सार्दूलजी,  05 - सलेँदीजी -

उपरोक्त पांच मूल पुत्रों के अलावा भारमलजी की सन्तानों में ये सात दासी पुत्र-पुत्रि इस प्रकार थे

     06 - सुन्दरदास जी - दासी पुत्र, 07 - प्रथ्वीदीप - दासी पुत्र, 08 - रुपसिह उर्फ रुपचंन्द - दासी पुत्र,  09 - महेशदास - दासी पुत्र,  10 - भोपत - दासी पुत्र,  11 - परसुराम - दासी पुत्र

बांकावत कछवाह

राजा भारमल जी (बिहारी मल) के छोटे पुत्र भगवानदास जी के वंशज बांकावत कछवाह कहलाये हैँ, क्योँकि भगवानदास जी को लावन (लवान ग्राम दौसा जिले राजस्थान मेँ, दौसा से 18 किलोमीटर दुरी पर है) की जागीर मिली थी। तथा वहाँ पर मुगल बादशाह ने लङाई मेँ वीरता दिखाने पर "बांके राजा" की उपाधी दी गयी थी। इसलिये बांकावत नाम पङा। राजा भगवानदास की मृत्यु हो जाने पर (उनका दत्तक पुत्र) राजा मानसिंह जयपुर के सिंहासन पर बैठा।

 

राजा भगवन्तदास सिंह कछवाहा (1574-1589) (ये राजा भारमल सिंह कछवाहा के बेटे है।) 

आमेर के राजा भारमल कछवाह जी के बड़े पुत्र राजा भगवंतदास कछवाह जी के वंशज राजावत कछवाह कहलाते है। जो अपने उप नाम मेँ राजावत शब्द का उपयोग करते है। राजा भगवंतदास कछवाह जी की म्रत्यु 10 दिसम्बर 1589 को हुयी थी राजा भगवंतदास कछवाह जी के पांच पुत्र और एक पुत्रि थी - 01 - राजा मानसिंह कछवाह [प्रथम]  [रानी भगवती की कोख से जन्म], 02 - ठाकुर माधोसिंह कछवाह - [माधोसिंह की म्रत्यु 1585.में हुई थी] का पुत्र हुवा छतरसिंह कछवाह, ठाकुर छतरसिंह कछवाह - [ठाकुर छतरसिंह कछवाह की म्रत्यु मार्च 1630 में हुई] के दो पुत्र हुए- (A) कुंवर भीमसिंह कछवाह - [भीमसिंह कछवाह की म्रत्यु मई 1630 ], (B) कुंवर आनंदसिंह कछवाह - [आनंदसिंह कछवाह की म्रत्यु मई1630] 03 - ठाकुर चंद्रभानसिंह कछवाह[रायसल भाटी की पुत्रि की कोख से जन्म] चंद्रभानसिंह कछवाह की शादी गिदौर [Gidhaur] जिया मुंगेर [Monghyr] राज्य बिहार के राजा पूरणमल कछवाह जी [चंदेल] की पुत्रि के साथ हुयी थी।, 04 - ठाकुर सूरजसिंह कछवाह [1580], 05 - ठाकुर प्रतापसिंह कछवाह [रानी भगवती की कोख से जन्म], 06 - राजकुमारी मानकुंवर.

राजावत कछवाह खाप

आमेर के राजा भारमल कछवाह जी के बड़े पुत्र राजा भगवंतदास कछवाह जी के वंशज राजावत कछवाह कहलाते है। जो अपने उप नाम मेँ राजावत शब्द का उपयोग करते है।

लेकिन आधुनिक युग में जो राजा भगवंतदास कछवाह जी के वंशज नही है वो भी शौक के तौर पर राजावत सर नाम का उपयोग करने लगे हैं। ऐसा करना गलत है। जब आप उनके वंशज हो नही तो फिर क्यू उनका सर नाम चुरा कर लगा रहे हों। राजा भारमल जी (बिहारी मल) के बड़े पुत्र राजा भगवंतदासजी के वंशज राजावत कछवाह कहलाते है। जो अपने उप नाम (सर नेम) मेँ राजावत शब्द का उपयोग करते है।

राजावत कछवाहों की 9 उपशाखाएँ हैं -:

        01 - कीर्तसिंहोत राजावत कीर्तसिंहोत राजावत आमेर के राजा मानसिंह के प्रपौत्र मिर्जा राजा जयसिंह के पुत्र कीर्ति सिंह के वंशज हैं.

        02 - जुझार सिंहोत राजावत  आमेर के राजा मानसिंह के पुत्र कुंवर जगत सिंह हुए. जगत सिंह के दूसरे पुत्र जुझार सिंह थे. जुझार सिंह के वंशज जुझारसिंहोत राजावत के नाम से जाने जाते हैं.

        03 - दुर्जनसिंहोत राजावत कुंवर दुर्जन सिंह राजा मान सिंह के चौथे पुत्र थे. इनकी माता का नाम सहोद्रा गौड़ था. यह अत्यंत ही साहसी और पराक्रमी योद्धा थे. कुंवर दुर्जन सिंह के वंशजों को दुर्जनसिंहोत राजावत के नाम से जाना जाता है.

        04 - शक्तिसिंहोत राजावत शक्तिसिंहोत राजावत राजा मान सिंह के पुत्र शक्ति सिंह के वंशज हैं.

        05 - कल्याण सिंहोत राजावत मान सिंह के पुत्र कल्याण सिंह के वंशज कल्याणसिंहोत राजावत कहलाते हैं.

        06 - हिम्मत सिंगोत राजावत राजा मानसिंह के पुत्र हिम्मत सिंह हुए. हिम्मत सिंह बहुत ही साहसी और बहादुर थे. बंगाल और बिहार के के युद्धों में उन्होंने अपने वीरता का परिचय दिया था. बंगाल के ही एक युद्ध में यह वीरगति को प्राप्त हुए थे. इनके वंशज हिम्मतसिंहोत राजावत के नाम से जाने जाते हैं.

        07 - सूरजसिंहोत राजावत सूरजसिंहोत राजावत आमेर के राजा भगवंत दास के पुत्र सूरज सिंह के वंशज हैं.

        08 - बनमाली दासोत राजावत आमेर के राजा भगवंत दास के पुत्र बनमाली दास के वंशज बनमालीदासोत राजावत कहलाते हैं.

        09 - माधोसिंहोत राजावत आमेर के राजा भगवंत दास के एक पुत्र माधो सिंह हुए. माधो सिंह के वंशज ही माधोसिंहोत राजावत के नाम से जाने जाते हैं.

राजा मान सिंह कछवाहा प्रथम (1589-1614) 

राजा मान सिंह कछवाहा प्रथम ने काबुल, बल्ख, बुखारा, बंगाल और मध्य और दक्षिणी भारत में सड़सठ महत्वपूर्ण लड़ाइयाँ लड़ीं। वह आमेर के राजा भगवंत दास और उनकी पत्नी भगवती के पुत्र थे । उनका जन्म रविवार, 21 दिसंबर 1550 को हुआ था। आमेर (अंबर) के झंडे को "कचनार" (सफेद आधार में हरा पर्वतारोही) से बदलकर "पचरंगा" (पांच रंग) कर दिया गया। जयपुर राज्य के भारत में विलय तक इस ध्वज का प्रयोग जारी रहा। उन्होंने पुरी, उड़ीसा के जगन्नाथ मंदिर की पुनर्स्थापना, काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी, वृंदावन, बंगाल, बिहार, काबुल, कंधार, आमेर की शिलादेवी, चांदपोल स्थित हनुमान मंदिर, हर की पौड़ी (हरिद्वार) में मां गंगा का मंदिर सहित पूरे भारत में मंदिरों का निर्माण व जीर्णोद्धार करवाया। वाराणसी दशाश्वमेध घाट और अपने ईष्ट विश्वनाथ भगवान शिव का भव्य मन्दिर बनवाया, जिसे मान मंदिर और मान घाट से दुनिया में पहचान मिली है। इस मंदिर का उल्लेख जहांगीर ने अपने आत्मचरित में भी किया है।

राजा भावसिंह कछवाहा (1614-1621)अपुत्र रहे 

हनुमान शर्मा (जयपुर का इतिहास, 1937) के अनुसार महाराजा मानसिंह के पीछे उनके बड़े बेटे जगतसिंह आमेर के राजा होते किंतु इनका असमय में अंत हो जाने से आमेर के सामन्तों की इच्छा से जगतसिंहजी के बड़े बेटे महासिंह दक्षिण में और मानसिंह के छोटे बेटे भावसिंह आमेर में राजा हुए। इस प्रकार एक साथ राजा होने का अपूर्व अवसर था और दोनों के लिए शाही सिरोपाव भेजा गया। भावसिंह सन् 6 जुलाई 1614 ई. को आमेर की राजगद्दी पर बैठा, महासिंह को प्रसन्न करने के लिए उसे मांडू की जागीर व मनसब में वृद्धि कर दी। महासिंह 1617 तक दक्षिण में ही रहा और वहीं मई, 1617 में उसका देहान्त हो गया।

राजा जय सिंह कछवाहा प्रथम (1621-1667) (राजा भावसिंह कछवाहा के छोटे भाई महासिंह कछवाहा के बेटे) 

आमेर के शासक भावसिंह की मृत्यु के बाद जयसिंह (महासिंह का पुत्र) 23 दिसम्बर, 1621 ई. को 11 वर्ष की आयु में आमेर के राजा बने। जयपुर के कछवाहा वंश में इन्होने सर्वाधिक अवधि 46 वर्ष तक शासन किया।

पुरन्दर की संधि:- 11 जून, 1665 ई. को शिवाजी और जयसिंह के बीच सन्धि हुई जिसे पुरन्दर की संधि कहते हैं।

राजा रामसिंह कछवाहा प्रथम (1667-1688) 

राजा विशनसिंह कछवाहा (1688-1699) 

राजा जय सिंह कछवाहा द्वितीय (1699-1743) 

सन १७२७ में आमेर से दक्षिण छः मील दूर एक बेहद सुन्दर, सुव्यवस्थित, सुविधापूर्ण और शिल्पशास्त्र के सिद्धांतों के आधार पर आकल्पित नया शहर 'सवाई जयनगर', बाद में (जयपुर) बसाने वाले नगर-नियोजक के बतौर उनकी ख्याति भारतीय-इतिहास में अमर है। काशी, दिल्ली, उज्जैन, मथुरा और जयपुर में, अतुलनीय और अपने समय की सर्वाधिक सटीक गणनाओं के लिए जानी गयी वेधशालाओं के निर्माता, सवाई जयसिह एक नीति-कुशल महाराजा और वीर सेनापति ही नहीं, जाने-माने खगोल वैज्ञानिक और विद्याव्यसनी विद्वान भी थे। उनका संस्कृत , मराठी, तुर्की, फ़ारसी, अरबी, आदि कई भाषाओं पर गंभीर अधिकार था। भारतीय ग्रंथों के अलावा गणित, रेखागणित, खगोल और ज्योतिष में उन्होंने अनेकानेक विदेशी ग्रंथों में वर्णित वैज्ञानिक पद्धतियों का विधिपूर्वक अध्ययन किया था और स्वयं परीक्षण के बाद, कुछ को अपनाया भी था। देश-विदेश से उन्होंने बड़े बड़े विद्वानों और खगोलशास्त्र के विषय-विशेषज्ञों को जयपुर बुलाया, सम्मानित किया और यहाँ सम्मान दे कर बसाया। उन्होंने अपनी राजधानी जयपुर सहित भारत के कई स्थानों पर जंतर मंतर वेधशालाओं का निर्माण किया। उनके पास यूक्लिड के "एलीमेंट्स ऑफ़ ज्योमेट्री" का संस्कृत में अनुवाद था

अश्वमेध भारतवर्ष के एक प्रख्यात प्राचीनकालीन यज्ञ का नाम है । 'सार्वभौम राजा' अर्थात् एक चक्रवर्ती नरेश ही अश्वमेध यज्ञ करने का अधिकारी माना जाता था, सवाई जयसिंह (द्वितीय) ने अश्वमेध यज्ञ भी करवाया था। ये यज्ञ कलयुग का पहला और संसार का आखिरी अश्वमेध यज्ञ कहलाया और इस वजह से राजा को धर्मराज युधिष्ठिर का अवतार कहा जाने लगा। सवाई जयसिंह ने यज्ञ करवाने के लिए गुजरात के विशेष पंडितों को यहाँ बुलाया और इन्हीं पंडितों को हवेली, कुआं और गाय भेंट करके ब्रह्मपुरी में बसाया गया। शहर की नींव रखने में आमेर खजाने के करीब 1084 रुपए खर्च हुए थे। वहीं जिन सम्राट जगन्नाथ ने जयपुर की नींव रखी थी उनको खुशी में 8 बीघा जमीन दी गई थी। वर्तमान समय में ये जगह अजमेर रोड के पास हथरोई गढ़ी के नाम से जानी जाती है। कलयुग में हुए इस महायज्ञ को लेकर ये बात कही जाती है कि जयपुर की नींव लगाने के 7 साल बाद 18 अप्रैल 1734 को यज्ञ कराने के लिए काशी सहित देश के विद्वानों ने यज्ञ की व्यवस्था में 5 साल लगा दिए थे। परशुरामद्वार के पीछे डूँगरी पर विष्णु स्वरूप बिरद भगवान की स्थापना के बाद ढोल नगाड़ों से ढूँढाड़ राज्य में घोषणा हुई थी कि आमेर नरेश विष्णुसिंह के पुत्र जयसिंह द्वितीय अश्वमेध करवा रहे हैं। इस यज्ञ के लिए जयसिंह ने स्वर्ण व रत्नों की ढेरियाँ लगाने के साथ यज्ञ सामग्री एकत्रित करवाई। फिर यज्ञ मंडपों को चांदी के पत्तरों से ढका गया। पूर्णाहुति के बाद करीब 250 पशु-पक्षी आजाद किए गए। फिर यज्ञ से पहले परशुराम द्वारा, काला हनुमानजी, शाहपुरा बाग, काला महादेवजी व यज्ञशाला की बावड़ियाँ बनीं। इस यज्ञ के लिए महाराजा ने तीन करोड़ ब्राह्मणों को भोजन कराने का संकल्प किया और कुरुक्षेत्र में सप्त स्वर्ण सागर और काशी में हाथी घोड़े दान किए। मथुरा में चांदी का तुला दान कर करीब 33 करोड़ रुपए पुण्य में खर्च किए। सियाशरण लश्करी कहते हैं कि यज्ञ करीब सवा साल चला था और अपने संकल्प के मुताबिक राजा ने इस यज्ञ के पूरे होने तक लोगों को भोजन करवाया। यज्ञ में जो मिट्टी के गणेश बनाए गए उन्हें बाद में किला बनाकर स्थापित किया गया और आज सब उन्हें गढ़ गणेश के नाम से जानते हैं। ऐसे ही यज्ञ में भगवान विष्णु की मूर्ति की पूजा हुआ वो जलमहल के सामने स्थित है। शिव जी की मूर्ति ब्रह्मपुरी में है और जलमहल के सामने काले हनुमान जी का मंदिर है। यज्ञ के लिए नाहरगढ़ किले के नीचे एक प्रधानकुंड बना और वहीं एक बावड़ी बनी। यज्ञ के लिए इस बावड़ी को घी से भरा गया। इस जगह को आज यज्ञ शाला की बावड़ी के नाम से जाना जाता है।

राजा ईश्वरी सिंह कछवाहा (1743-1750) 

राजा माधो सिंह कछवाहा प्रथम (1750-1768) 

राजा पृथ्वी सिंह कछवाहा (1768-1778)  

राजा प्रताप सिंह कछवाहा (1778-1803) 

राजा जगत सिंह कछवाहा द्वितीय (1803-1818)  

राजा जयसिंह कछवाहा तृतीया (1818-1835)  

राजा रामसिंह कछवाहा द्वितीय (1835-1880) 

महाराजा रामसिंह द्वितीय जो १८४३ ईस्वी में मात्र १६ वर्ष की उम्र में जयपुर के राजा बने थे। इन्होंने अपने शासनकाल के दौरान जयपुर में कई महत्वपूर्ण सुधार किए। उन्होंने एक आधुनिक नगरपालिका सरकार और एक पुलिस बल की स्थापना की, और उन्होंने अल्बर्ट हॉल संग्रहालय और सवाई मान सिंह टाउन हॉल सहित कई महत्वपूर्ण सार्वजनिक भवनों का निर्माण किया। इनके समय में सन् १८४५ में जयपुर में महाराजा कॉलेज तथा संस्कृत कॉलेज का निर्माण हुआ था।

राजा माधोसिंह कछवाहा द्वितीय (1880-1922) 

सवाई रामसिंह के निःसंतान मर जाने से उनके गोद लिए हुए श्री माधोसिह जी-द्वितीय जयपुर के सिंहासन पर बैठे। इन्होंने अपनी 9 दासियों के लिए जयपुर के नाहरगढ़ में 9 एक जैसे महलों का निर्माण करवाया था। इन्होंने बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी (Banaras Hindu University- B.H.U.) की स्थापना के लिए महन मोहन मालवीय को 5 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी थी। 1904 ई. में सवाई माधोसिंह द्वितीय ने जयपुर में डाक व्यवस्था की शुरुआत की थी। राजस्थान में पहली बार डाक व्यवस्था की शुरुआत माधोसिंह द्वितीय के द्वारा ही शुरू की गई थी। अर्थात् सवाई माधोसिंह द्वितीय के द्वारा शुरू की गई डाक व्यवस्था राजस्थान की किसी भी रियासत में पहली बार शरू की गई डाक व्यवस्था थी। सवाई माधोसिंह द्वितीय ने जयपुर में मुबारक महल का निर्माण करवाया था और उन्होंने जयपुर में रामबाग पैलेस और सवाई मान सिंह संग्रहालय सहित कई महत्वपूर्ण इमारतों का निर्माण किया।

राजा एवं राजप्रमुख मान सिंह कछवाहा द्वितीय (1922-1949) 

मान सिंह जी द्वितीय (कुंवरजी मोर मुकुट सिंह) कछवाहा राजवंश जयपुर के अंतिम महाराजा थे। उन्होंने 1922 से लेकर राज्य के भारत में विलय (1949) तक शासन किया। इसके बाद उन्होंने 1949 से लेकर 1956 तक राजस्थान के राजप्रमुख के रूप में कार्य संभाला। बाद के सालों में इन्होंने स्पेन में भारत के राजदूत के रूप में कार्य किया।

भवानी सिंह कछवाहा (1931 –2011) 

ब्रिगेडियर सवाई भवानी सिंह जयपुर के कछवाहा राजवंश के अंतिम शासक थे। वह एक प्रतिष्ठित सैनिक थे और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान भारतीय सेना में कार्यरत थे। सेना से अपनी सेवानिवृत्ति के बाद, ब्रिगेडियर सवाई भवानी सिंह ने जयपुर की विरासत को संरक्षित करने के लिए अपना समय समर्पित किया।

 

(यतो धर्मस्ततो जय - "जहां धर्म है, वहां जीत है)

जय रघुनाथजी की