कैरवाड़ा

 कैरवाड़ा का इतिहास

कैरवाड़ा ग्राम का इतिहास आमेर महाराज पृथ्वीराज कछवाहा से जुड़ा हुआ है। महाराज पृथ्वीराज कछवाहा के पुत्र राजा पाचयण सिंह कछवाहा का जन्म बीकानेर नरेश राव लूनकरण सिंह की पुत्री अपूर्वा कँवर (बाला बाई) के गर्भ से हुआ था।


आगे चलकर, इन्हीं राजा पाचयण सिंह के वंशजों को पिचानोत कछवाहा के नाम से जाना गया। कैरवाड़ा गाँव उस समय पिचानोत कछवाहाओं की विशेष चौकी (खास ठिकाना) के रूप में प्रसिद्ध हुआ।


सन् 1635 ईस्वी में मुगलों ने कैरवाड़ा पर आक्रमण किया। इस भीषण युद्ध में कैरवाड़ा और खेड़ली की खास चौकियाँ पूरी तरह नष्ट हो गईं। पिचानोत कछवाहा का संपूर्ण परिवार युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुआ। केवल खारेड़ा चौकी ही शेष रह गई।

मुगल आक्रमण के कारण न केवल पिचानोत कछवाहा राजपूत, बल्कि कैरवाड़ा की संपूर्ण जनता को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी। मुगलों ने गाँव को पूरी तरह उजाड़ दिया और कैरवाड़ा लंबे समय तक वीरान पड़ा रहा।

👑 पुनः जागीर वितरण – जय सिंह प्रथम (1635)

जयपुर महाराज जय सिंह प्रथम द्वारा 1635 में सामरिया व शहर (ताजिम ठिकानों) से पाँच वीर पुत्रों को कुल 40 घोड़े की जागीर प्रदान की गई। इन्होने मुगलों व अन्य आक्रांताओं को परास्त कर पुनः राज्य स्थापना की:

अनुक्रमठिकाना
घोड़े की जागीर  संस्थापक
1ढिगावड़ा,अलवर
  14 घोड़े-
2कैरवाड़ा,अलवर
  12 घोड़े- ठाकुर शिशराम सिंह पिचानोत
3खेड़ली पिचानोत,अलवर
   08 घोड़े-
4रूपवास,अलवर
  4.25 घोड़े-
5धोलापलाश,अलवर
  1.75 घोड़े-

                    कैरवाड़ा का पुनर्निर्माण और पिचानोत कछवाहाओं का पुनः उदय

सन् 1635 ईस्वी में जब मुगलों ने कैरवाड़ा व खेड़ली की खास चौकियों को उजाड़ दिया था, तब पिचानोत कछवाहा राजपूतों का पूरा परिवार वीरगति को प्राप्त हुआ और गाँव पूर्णतः नष्ट हो गया था।

इसी समय आमेर-जयपुर के महाराज जय सिंह प्रथम ने सामरिया व शहर (ताज़ीम ठिकाने) से पाँच वीर पुत्रों को कुल 40 घोड़े की जागीर प्रदान की।  ठाकुर साहब शिशराम सिंह पिचानोत जी को 12 घोड़े की जागीर मिली।

जागीर प्राप्त होते ही ठाकुर साहब शिशराम सिंह पिचानोत जी ने अपनी छोटी-सी सेना और पिचानोत कछवाहा राजपूतों की सहायता से कैरवाड़ा पर आक्रमण किया। इस भीषण संघर्ष में मुगल सेना कैरवाड़ा छोड़कर भाग गई। ठाकुर शिशराम सिंह ने उनका पीछा करते हुए बदोड़ा (मेव) से लेकर अलवर से आगे तक मारकर खदेड़ दिया।

इस विजयी युद्ध के बाद ठाकुर साहब शिशराम सिंह पिचानोत जी ने कैरवाड़ा में पुनः पिचानोत कछवाहा राजपूतों का साम्राज्य स्थापित किया। इसके लिए वे अपनी पिचानोत जागीर सामरिया व शहर से तीन विश्वसनीय जनों—

  • एक कुमार,

  • एक राणा,

  • और एक योगी

को अपने साथ लेकर आए, जिन्होंने कैरवाड़ा के पुनर्निर्माण और व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कैरवाड़ा की वर्तमान सीमा

वर्तमान समय में कैरवाड़ा ग्राम की भौगोलिक सीमाएँ निम्न प्रकार निर्धारित होती हैं—

  • उत्तर दिशा में – कैरवा जाट तक,

  • दक्षिण दिशा में – नंगली झामावत तक,

  • पूर्व दिशा में – हल्दीना के आधे हिस्से तक।

  • पश्चिम दिशा में –  इंदरगढ़ के आधे हिस्से तक।  तकिया  भी कैरवाड़ा का हिस्सा था और इसकी सीमा में सम्मिलित माना जाता था।

  • इस प्रकार यह पूरा क्षेत्र मिलाकर कुल 12 घोड़े की जागीर हुआ करता था।

ठाकुर साहब शिशराम सिंह पिचानोत जी ठिकाना कैरवाड़ा अस्थाई रुप से रहने लगे, और उनके बाद उनके बेटे ठाकुर साहब राज सिंह पिचानोत संवत १६९० से ठिकाना कैरवाड़ा में स्थाई रूप से निवास करने लगे।

ठाकुर साहब राज सिंह के पांच बेटे 1. ठाकुर साहब जोरावर सिंह पिचानोत, 2. ठाकुर साहब गुमान सिंह पिचानोत, 3. ठाकुर साहब धन सिंह पिचानोत, 4. ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत, 5. ठाकुर साहब संग्राम सिंह पिचानोत।

1. ठाकुर साहब जोरावर सिंह पिचानोत - ठाकुर साहब जोरावर सिंह पिचानोत का वंश आगे नही चला।

2. ठाकुर साहब गुमान सिंह पिचानोत - ठाकुर साहब गुमान सिंह पिचानोत के चार लड़के जिनमे देवी सिंह पिचानोत, राम सिंह पिचानोत, अखे सिंह पिचानोत, पंध सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     अखे सिंह पिचानोत जी के चार लड़के जिनमे गोविन्द सिंह पिचानोत, सावंत सिंह पिचानोत, विसल सिंह पिचानोत, सोहल सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     ठाकुर साहब गुमान सिंह पिचानोत के पोते (अखे सिंह पिचानोत के बेटे) सावंत सिंह पिचानोत के चार बेटे जिनमे बख्तावर सिंह पिचानोत, पिरथी सिंह पिचानोत, मान सिंह पिचानोत,और मोती सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

3. ठाकुर साहब धन सिंह पिचानोत - ठाकुर साहब धन सिंह पिचानोत का वंश आगे नही चला।

4. ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत (बड़ी छतरी ओर भोमिया जी महाराज) - ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत के दो बेटे धीरज सिंह पिचानोत, मोहन सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     ठाकुर साहब धीरज सिंह पिचानोत के बेटे जिनमे गुलाब सिंह पिचानोत, संगराम सिंह पिचानोत, सोहल सिंह पिचानोत, भूप सिंह पिचानोत, सालिम सिंह पिचानोत, नवल सिंह पिचानोत, विसन सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

1. (ठाकुर साहब धीरज सिंह पिचानोत जी का वंश)

(ठाकुर साहब धीरज सिंह पिचानोत के बेटे गुलाब सिंह पिचानोत जी का वंश)

     ठाकुर साहब धीरज सिंह पिचानोत के के बेटे गुलाब सिंह पिचानोत ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और चार बेटे मगल सिंह पिचानोत, हाकिम सिंह पिचानोत, छीतर सिंह पिचानोत (छोटी छतरी, भोमियाजी महाराज), रणजीत सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

(ठाकुर साहब गुलाब सिंह पिचानोत के बेटे रणजीत सिंह पिचानोत जी का वंश)

     गुलाब सिंह पिचानोत के बेटे रणजीत सिंह पिचानोत ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और चार बेटे मोहन सिंह पिचानोत, सुल्तान सिंह पिचानोत, भीम सिंह पिचानोत (दुसरा नाम - दुर्जन सिंह), पध सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     रणजीत सिंह पिचानोत के बेटे मोहन सिंह पिचानोत ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और चार बेटे जीवन सिंह पिचानोत, नादरा सिंह पिचानोत, भगवंत सिंह पिचानोत, हरेनाथ सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     मोहन सिंह पिचानोत के बेटे भगवंत सिंह पिचानोत ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और तीन बेटे मलजी पिचानोत, ननुलाल सिंह पिचानोत, किशन सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     (ठाकुर साहब रणजीत सिंह पिचानोत के बेटे भीम सिंह पिचानोत (दुर्जन सिंह) जी का वंश)

     रणजीत सिंह पिचानोत के बेटे भीम सिंह पिचानोत (दुसरा नाम - दुर्जन सिंह) ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और सोहल सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     ठाकुर साहब भीम सिंह पिचानोत (दुसरा नाम - दुर्जन सिंह) के के बेटे सोहल सिंह पिचानोत ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और सोहल सिंह पिचानोत के बेटे रघुमान सिंह पिचानोत, बखतावार सिंह पिचानोत, इन्द्र सिंह पिचानोत, कानसिंह पिचानोत, अमृत सिंह पिचानोत, दोलत सिंह पिचानोत, सुजान सिंह पिचानोत, सहजमरण सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     सोहल सिंह पिचानोत के बेटे अमृत सिंह पिचानोत ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और तीन बेटे हाथी सिंह पिचानोत, फूल सिंह पिचानोत, चमन सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

 •     अमृत सिंह पिचानोत के बड़े बेटे हाथी सिंह पिचानोत ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और चार बेटे शिवप्रसाद सिंह पिचानोत, मेहताब सिंह पिचानोत, सुगन सिंह पिचानोत, गोविन्द सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     अमृत सिंह पिचानोत के दूसरे नंबर वाले बेटे फूल सिंह पिचानोत ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और सुगन सिंह जी को गोद लिया और अपना वंश सुगन सिंह जी को गोद लेकर बढ़ाया।

     हाथी सिंह पिचानोत के बेटे गोविन्द सिंह पिचानोत ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और दो बेटे भागीरथ सिंह पिचानोत, सीताराम सिंह पिचानोत को जन्म दिया।

     हाथी सिंह पिचानोत के सबसे बड़े बेटे शिवप्रसाद सिंह पिचानोत ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और शिवप्रसाद सिंह पिचानोत ने एक बेटे को जन्म दिया उनका नाम भवर सिंह पिचानोत रखा गया।

     ठाकुर साहब भवर सिंह पिचानोत ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और तीन बेटे तेज सिंह पिचानोत, उमेद सिंह पिचानोत, केहरि सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया। 

•      ठाकुर साहब केहरि सिंह पिचानोत के दो बेटे हैं धर्मेंद्र सिंह पिचानोत और पुरेन्द्र सिंह पिचानोत

(ठाकुर साहब धीरज सिंह पिचानोत के बेटे संग्राम सिंह पिचानोत जी का वंश)

•     ठाकुर साहब धीरज सिंह पिचानोत के बेटे संग्राम सिंह पिचानोत जी ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और पदम सिंह जी को गोद लिया, पदम सिंह जी किशन सिंह जी के बेटे थे उनको  संग्राम सिंह पिचानोत जी ने गोद लेकर अपना वंश आगे बढ़ाया। इस प्रकार पदम सिंह के नाम से संग्राम सिंह पिचानोत जी का वंश आगे चला।

(ठाकुर साहब धीरज सिंह पिचानोत के बेटे भूप सिंह पिचानोत जी का वंश)

     ठाकुर साहब  धीरज सिंह पिचानोत के के बेटे भूप सिंह पिचानोत जी ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया। भूप सिंह पिचानोत जी ने बेरीसाल सिंह और सुल्तान सिंह जी के बेटे चपरा सिंह जी को भी गोद लिया। अर्थात भूप सिंह पिचानोत जी ने बेरीसाल सिंह और चपरा सिंह जी को भी गोद लिया।

•     बेरीसाल सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और उनके बेटे गंगा सिंह पिचानोत जी, शिवचरन सिंह पिचानोत, सादुल सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     गंगा सिंह पिचानोत के बेटे गोवर्धन सिंह पिचानोत जी, जसवंत सिंह पिचानोत जी, बहादुर सिंह पिचानोत जी, उमराव सिंह पिचानोत जी, माधो सिंह पिचानोत जी, सम्पत सिंह पिचानोत जी ने जन्म लिया लेकिन गंगा सिंह पिचानोत जी के तीन बेटो की आस्मिक मृत्यु हो गयी उनमे से गोवर्धन सिंह पिचानोत जी, जसवंत सिंह पिचानोत जी, बहादुर सिंह पिचानोत जी ये तीन थे जिनकी आस्मिक मृत्यु हो गयी थी। गंगा सिंह पिचानोत जी के तीन बेटो की आस्मिक मृत्यु होने के कारण उन्होंने गोद लिया था।गंगा सिंह पिचानोत जी के तीन पुत्रों (गोवर्धन सिंह, जसवंत सिंह और बहादुर सिंह) की असमय मृत्यु हो जाने के कारण उन्होंने अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए गोद लिया।

  • नाथू सिंह जी के पुत्र गणपत सिंह जी को गोद लिया।

  • जतन सिंह जी (Bhadoli) के पुत्र को गोद लिया।

  • भूर सिंह जी के पुत्र गिरवर सिंह जी को गोद लिया।

इस प्रकार गंगा सिंह पिचानोत जी का वंश गोद लिए गए पुत्रों के माध्यम से आगे चला। इस प्रकार गंगा सिंह पिचानोत जी का वंश आगे चला।

     शिवचरन सिंह पिचानोत जी के बेटे शिम्भू सिंह पिचानोत जी, माधो सिंह पिचानोत जी ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     शिम्भू सिंह पिचानोत जी के बेटे ग्यान सिंह पिचानोत जी, साधु सिंह पिचानोत जी, चाँद सिंह पिचानोत जी ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     चपरा सिंह पिचानोत जी के दो बेटो ने जन्म लिया उनमे से केसरी सिंह पिचानोत जी और बने सिंह पिचानोत जी थे इस प्रकार भूप सिंह पिचानोत जी का वंश चपरा सिंह पिचानोत ने बढ़ाया।

     माधो सिंह पिचानोत जी के बेटे भवर सिंह पिचानोत, सवाई सिंह पिचानोत, किशोर सिंह पिचानोत जी, भवानी सिंह पिचानोत, विकृम सिंह पिचानोत, कल्याण सिंह पिचानोत, अमर सिंह पिचानोत ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     सवाई सिंह पिचानोत के बेटे विजय सिंह पिचानोत पुराने कैरवाडा मे रहते हैं। भवानी सिंह पिचानोत और विकृम सिंह पिचानोत और अपना वंश आगे बढ़ाया।

(ठाकुर साहब धीरज सिंह पिचानोत के बेटे विसन सिंह पिचानोत जी का वंश)

     ठाकुर साहब विसन सिंह पिचानोत जी के तीन बेटो ने जन्म लिया उनमे से जीवन सिंह पिचानोत जी, अर्जुन सिंह पिचानोत जी और चमन सिंह पिचानोत जी और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     जीवन सिंह पिचानोत जी ने गोद लिए केसरी सिंह जी और बने सिंह जी को और अपना वंश आगे बढ़ाया। केसरी सिंह जी और बने सिंह जी दोनों चंदर सिंह जी के बेटे थे जिने जीवन सिंह पिचानोत जी ने गोद ले लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

     जीवन सिंह पिचानोत जी के बेटे केसरी सिंह पिचानोत जी ने अपना वंश आगे बढ़ाया और उनके बेटा शिम्भू सिंह पिचानोत जी ने जन्म लिया।

     अर्जुन सिंह पिचानोत जी ने अपना वंश आगे बढ़ाया और उनके बेटा हनुत सिंह पिचानोत जी और चंदर सिंह पिचानोत जी जो की गोद गए जीवन सिंह पिचानोत जी के इस प्रकार इनका वंश चला।

2. (ठाकुर साहब मोहन सिंह पिचानोत जी का वंश)

     ठाकुर साहब  मोहन  सिंह पिचानोत जी के बेटे माधो सिंह पिचानोत और रघुनाथ सिंह पिचानोत ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया।

5. ठाकुर साहब संग्राम सिंह पिचानोत - ठाकुर साहब संग्राम सिंह पिचानोत के गोद आये सुर्जन सिंह पिचानोत, दुर्जन सिंह पिचानोत, और बक्स सिंह पिचानोत जी, ये तीन बेटे ठाकुर साहब संग्राम सिंह पिचानोत ने गोद लिये थे।

ठिकाना कैरवाड़ा, अलवर (राजस्थान) कि एक विधवा यहा से चली गई उसके पेट में बच्चा रह गया और उसी बच्चे से गोविन्दगढ, अलवर (राजस्थान) मे कैरवाडा पिचानोत का वंश चल रहा है भवानी सिंह पिचानोत जी और उनको बताई पुरवजो के अनुसार अभी तक ठिकाना कैरवाड़ा, अलवर (राजस्थान) से निकास ले चुके पिचानोत परिवार के (1) गोविन्दगढ, अलवर (राजस्थान), (2) राजगढ, अलवर (राजस्थान), (3) पावटा (खेडली के पास) अलवर (राजस्थान) के ठिकानो मे निवास कर रहे हैं जो ठिकाना कैरवाडा अलवर (राजस्थान) के पिचानोत परिवार के सदस्य है।

भोमिया शब्द

यह इतिहास बहुत पुराना है परन्तु उतना ही सच है। यह इतिहास ठिकाना कैरवाड़ा अलवर, राजस्थान का है। भोमिया शब्द जागीरदारों के लिए उपयोग किया गया राजस्थान के अंदर सर्वाधिक भोमिया पाए जाते हैं। जागीरदारों की मृत्यु के बाद पुरानी देवी देवताओं के दारा उनको देव योनी के अंदर प्रवेश लिया जाता है। और उन्हें कलयुग का देवता के रूप में लोगों की समस्या को हल करने के लिए उनकी आत्मा को एक मूर्ति के रूप में इस धरती पर प्रतिष्ठित करते हैं। राजस्थान के लगभग हर गांव में कई भोमियाजी है। उनके अंदर दैविक शक्ति होती है। जिससे वह लोगों की समस्याओं को हल करते हैं। वे संपूर्ण देव न होकर अर्द्ध देव कहलाते हैं।

श्री श्री १००८ श्री भौमिया जी ठिकाना कैरवाड़ा अलवर का इतिहास




ठाकुर साहब शिशराम सिंह पिचानोत जी  ठिकाना कैरवाड़ा  और उनके बाद उनके बेटे ठाकुर साहब राज सिंह पिचानोत संवत १६९० से ठिकाना कैरवाड़ा में स्थाई रूप से निवास करने लगे। ठाकुर साहब राज सिंह पिचानोत के पाँच बेटे उनमे से बेटे ठाकुर साहब जोरावर सिंह पिचानोत, ठाकुर साहब गुमान सिंह पिचानोत, ठाकुर साहब धन सिंह पिचानोत, ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत, ठाकुर साहब संग्राम सिंह पिचानोत। ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत शांत स्वभाव के थे। ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत के घर में दो बेटे ठाकुर साहब धीरज सिंह पिचानोत, ठाकुर साहब मोहन सिंह पिचानोत ने जन्म लिए, एक दिन ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत ने अपने दोनों बेटो को पास बुलाया और उनसे कहा की मेरी एक अंतिम इच्छा हैं कि मेरे मरने के बाद मेरे शरीर को अग्नि मत देना मुझे साधु, महात्माओ की तरह मिट्टी दे देना। और कुछ दिनों बाद फिर से युद्ध शुरु हो गया और ठाकुर साहब सायब सिह पिचानोत आमेर (जयपुर) की और से युद्ध भूमि में युद्ध करने गये ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत इस बार के युद्ध में बहुत साहस से लड़े थे। लेकिन उनको युद्ध में तलवार लग गयी। और इस प्रकार से ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत युद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए। और युद्ध में पराक्रम दिखाते हुए ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत हुए भोमिया ठाकुर हुए।

ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत का दाह संस्कार।

हिन्दू सनातन धर्म में पार्थिव शरीर को दाह संस्कार करने का नियम है। सनातन धर्म में साधु को समाधि और सामान्यजनों का दाह संस्कार किया जाता है। इसके पीछे कई कारण हैं। साधु को समाधि इसलिए दी जाती है। क्योंकि ध्यान और साधना से उसका शरीर एक विशेष उर्जा लिए हुए होता है। इसलिए उसकी शारीरिक ऊर्जा को प्राकृतिक रूप से विसरित होने दिया जाता है। और परिवार और समाज के लोगों ने ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत जी की अंतिम इच्छा को एक सिरे से खारिज कर दिया, और कहते हैं ना विधि के विधान को कोई नहीं बदल सकता है। और हिन्दू धर्म के अनुसार ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत जी की अर्थी तैयार की गयी ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत जी की अर्थी को अग्नि देने के लिए शमसान में ले आये और ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत जी को अग्नि देने के लिए लकडिया लगा दी गयी और पुरे विधि विधान के साथ अग्नि उनके बड़े बेटे धीरज सिंह पिचानोत जी पास में आ गये तभी एक आकाशवाणी हुई आसमान से आवाज आने लगी फूलो की बारिश होने लगी और तब तक आसमान से बहुत तेज आवाज के साथ एक सिला (बहुत बड़ा पत्थर) आकर पड़ा ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत जी का शव जमीन में अन्दर चला गया, इस प्रकार से ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत जी का शव समस्त लकड़ियों के साथ धरती में समा गया और केवल ऊपर सिला नजर आने लगी।

श्री श्री १००८ श्री भोमियाजी महाराज का चमत्कार

हाथरस (उत्तर प्रदेश) के पास कोई सेठ रहता था। उसके कोई संतान नहीं थी। तो श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी (ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत जी) ने उनको एक सपना दिया की कैरवाड़ा में जाकर वहा क्षत्रिय पिचानोत राजपूतो का एक शमसान घाट हैं। वहा पर जाकर मेरा मन्दिर बन जायेगा तो आपके संतान हो जाएगी। सेठ कैरवाड़ा में पहुंच गया। और अपना सपना गाव के लोगों को बताने लगा और वहा सेठ ने भोमियाजी का मंदिर तैयार करा दिया। और उस सेठ को संतान हो गयी। उसी सेठ ने श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी (ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत जी) का दूसरा मंदिर हाथरस में जाकर बनवाया जो कि घंटा घर के पास हाथरस में ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत जी (भोमिया जी) के नाम से जाना जाता हैं।

श्री श्री १००८ श्री भोमियाजी महाराज की मान्यता सभी जगह फैलने लग गयी और दूर दूर से भक्त गण आने लगे तो राजपूत समाज ने वहा राजपूत शमसान घाट बंद कर दिया और उस जगह पर बगीचा बना दिया जब सभी की मनोकामना पूर्ण होने लगी तो धीरे - धीरे यहा लोग यहा आने लगे।

हर साल यहा श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज का मेला लगता हैं। जब फसल कट जाती है। तब गर्मियों में पीपल पुणु का मेला भरता है मेले में अनेको दुकाने आती हैं। साथ में विशाल कुश्ती ढ़गल भी होता है कुश्ती में भाग लेने अनेको पहलवान आते है। पीपल पुणु को अभुज सावा होने के कारण भी भक्त आते है। श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज को प्रसाद चढ़ाते है। और कुश्ती एवम मेला का हिस्सा बनते हैं कुछ मन्नत मांगते हुए पेट के बल परिक्रमा लगाते हैं। और शादी होने के बाद जोड़े से लोग श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज का ढोक देने एवं प्रसाद चढ़ाने आते हैं। साथ में कुछ यहा अपने बच्चे का जडूला उतरवाने भी आते हैं। श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज की सेवा करने वाले मंदिर के साधु महंत भोलागिरी बताते है की भोमिया जी के प्रसाद रविवार और बृहस्पतिवार के साथ हर महीने की पुणु को चढ़ाया जाता हैं। श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज की दो छतरी हैं। जो सबसे बड़ी छतरी तो ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत जी की हैं। और छोटी छतरी ठाकुर साहब छीतर सिंह पिचानोत जी की हैं।

पीपल पुणु का मेला भरता है। मेले में अनेको दुकाने आती हैं। साथ में विशाल कुश्ती ढ़गल भी होता है कुश्ती में भाग लेने अनेको पहलवान आते है। पीपल पुणु को अभुज सावा होने के कारण भी भक्त आते है। श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज को प्रसाद चढ़ाते है। और कुश्ती एवम मेला का हिस्सा बनते हैं।

ठिकाना कैरवाड़ा के ठाकुर शीशराम सिंह पिचानोत जी ने जल संरक्षण के लिए बहुत अच्छा कार्य किया, कैरवाड़ा में 21 तालाबों का निर्माण करवाया जो की मालाखेड़ा तहसील के रिकॉर्ड में मौजूद हैं। इसके अलावा उनके वंशजों ने अनेक भूमि अपने साथ लेकर आए राणा, कुम्हार, नाईयो को दान में दी और उसके बाद में ठिकाना कैरवाड़ा में अनेक अन्य जातियों मीणा चौकीदार और जमींदार, नाथ, पंडित अन्य जातियों को भी भूमि दान में देकर बसाया। पिचानोत राजपूतों ने अपनी शमशान घाट की भूमि जहा पर ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत और ठाकुर साहब छीतर सिंह पिचानोत का मंदिर बना है अपनी उस शमसान भूमि का कुछ हिस्सा सरकारी स्कूल को दान देकर ठिकाना कैरवाड़ा में सरकारी स्कूल बनी, शेष 40 बीघा शमशान घाट की भूमि को भोमिया जी महाराज के मंदिर के लिए छोड़ दी  और 40 बीघा का श्मशान भूमि घट कर केवल 2 बीघा रह गई है। सरकारी रिकॉर्ड तहसील मालाखेड़ा का अध्यन करने पर पता चलता है की 1952 तक केवल पिचानोत राजपूतों के नाम पूरी जमीन थी और ठाकुर साहब भवर सिंह पिचानोत जी ने 2 बीघा जमीन भौमिया जी मन्दिर के नाम दान की ओर नाथ जी के लिए महादेव मंदिर नाम से जमीन दान में दी इसके अलावा जो पहले नर सिंह जी का मंदिर था उसका निर्माण भी ठाकुर साहब भवर सिंह पिचानोत ने करवाया था और रिकॉर्ड के अनुसार उन्होंने ही वो जमीन नर सिंह जी मंदिर के लिए दान में दी थी, जिसकी मूर्ति चोरी हो जाने के कारण अब वहा पर गणेश जी मन्दिर है।