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  कछवाहा क्षत्रिय वंश: पिचानोत शाखा की गौरवगाथा

क्षत्रिय कछवाहा वंश की परंपरा रही है कि वे अपने पूर्वजों के नाम को सरनेम (वंशनाम) के रूप में उपयोग करते रहे हैं। जैसे:

  • जब राजा सूर्यदेव हुए तो उनकी संतानों को सूर्यवंशी कहा गया।

  • राजा रघु के नाम से रघुकुल की परंपरा चली और आज भी "जय श्री रघुनाथ जी" का उद्घोष होता है।

  • श्रीराम के पुत्र कुश से कुशवाहा वंश चला।

  • फिर पाल शब्द आया और इसके पश्चात कछ नाम से कछवाहा उपनाम प्रचलन में आया।

इसके पश्चात, अनेक वंशजों ने वीरता, युद्धकौशल, और राज्यरक्षा में ऐसी पहचान बनाई कि उनके नाम भी वंश सरनेम में जुड़ते चले गए। इसी प्रकार, कछवाहा क्षत्रियों का समाज 53 तड़, 12 कोटड़ी और 65 खापों में संगठित हुआ।


🛡️ सनातन धर्म के रक्षक

कछवाहा राजपूतों ने सदैव सनातन धर्म, संस्कृति, समाज, स्त्री-रक्षा, राज्य और ठिकानों की रक्षा में अपने प्राण अर्पित किए हैं। इनकी वंशगाथा बलिदान, धर्मनिष्ठा और शौर्य की अमर गाथा है।



⚔️ गोनेर युद्ध (14 मई 1681) और सुजान सिंह पिचानोत का बलिदान

14 मई 1681 को मुगल सम्राट औरंगज़ेब स्वयं एक विशाल सेना लेकर गोनेर के श्री जगदीश मंदिर को तोड़ने आया। उस समय जागीरदार सुजान सिंह पिचानोत ने पूरे पिचानोत वंश सहित युद्ध में भाग लिया और मंदिर की रक्षा की।

युद्ध के दौरान, उनका सिर मंदिर से 1 किमी दक्षिण में कटकर गिरा, लेकिन उनका धड़ मुगलों से लड़ते हुए, उन्हें पीछे धकेलता हुआ गोनेर के बाहर 1 किमी उत्तर दिशा में तालाब की पाल तक पहुँच गया, जहाँ उन्होंने वीरगति प्राप्त की। इस युद्ध में ठाकुर साहब सुजान सिंह पिचानोत ने 300 मुगलों का सर कलम किया था और कुल 3000 से अधिक मुगलों को मारा था।

आज वहाँ उनकी विशाल छतरी बनी हुई है, और वे भौमिया जी के रूप में पूजे जाते हैं।




🏰 पिचानोत कछवाहा शाखा और उनकी जागीरें

उस समय पिचानोत कछवाहों की बारह कोटड़ी में प्रमुख जागीरें थीं:

  • नायला जागीर

  • गोनेर जागीर

  • ताजीम ठिकाने: सांभरियाँ (सामरिया), सहर (शहर)

इनके अंतर्गत आठ खास चौकियाँ थीं:

  1. कैरवाड़ा

  2. खारेड़ा

  3. खेड़ली (वर्तमान: खेड़ली पिचानोत)

  4. पिपलाई

  5. बरदाला

  6. उड़दीन

  7. अमरगढ़

  8. तलवाड़ा (गंगापुर सिटी) सात घोड़े की जागीर 

1635 के युद्ध में कैरवाड़ा और खेड़ली की खास चौकियाँ नष्ट हो गईं, पूरा परिवार युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ। केवल खारेड़ा चौकी ही बची।


👑 जय सिंह प्रथम द्वारा जागीरों का पुनर्गठन

इस वीरता को देखते हुए, जयपुर नरेश महाराजा जय सिंह प्रथम ने 1635 में सांभरियाँ और सहर से पांच भाइयों को 40 घोड़े की संयुक्त जागीर देकर नए ठिकानों की स्थापना की:

  1. ठिकाना ढिगावड़ा (14 घोड़े की जागीर)

  2. ठिकाना कैरवाड़ा (12 घोड़े की जागीर)ठाकुर शिशराम सिंह पिचानोत

  3. ठिकाना खेड़ली पिचानोत (08 घोड़े की जागीर)

  4. ठिकाना रूपवास (4.25 घोड़े की जागीर)

  5. ठिकाना धोलापलाश (1.75 घोड़े की जागीर)

इनमें से ठिकाना कैरवाड़ा के ठाकुर साहब सायब सिंह पिचानोत और ठाकुर साहब छीतर सिंह पिचानोत भी युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए और भौमिया जी के रूप में पूजनीय हुए।

ठिकाना जीरणा पिचाणौत का इतिहास

जीरणा गाँव पर प्रारंभ में धाकड़ जाति का नियंत्रण था। उन्होंने जयपुर कछवाहा राजवंश को कर (टैक्स) देना बंद कर दिया था, जिससे जयपुर दरबार नाराज हो गया। इस स्थिति में, सन् 1772 में मालूपाड़ा ठिकाने से जैत सिंह पिचाणौत जी अपनी माता के साथ मात्र 17 वर्ष की आयु में जीरणा गाँव आए। यहाँ उन्होंने देखा कि धाकड़ जाति ने गाँव पर कब्जा कर रखा है और कोई कर नहीं चुका रहा है।

जैत सिंह पिचाणौत जी ने धाकड़ों के खिलाफ युद्ध किया, जिसमें उन्होंने विजय प्राप्त की और जीरणा गाँव को पिचाणौत जागीर में शामिल कर लिया। इसके बाद जीरणा से कर पुनः जयपुर दरबार भेजा जाने लगा। इस योगदान और वीरता से प्रसन्न होकर जयपुर नरेश मान सिंह द्वितीय ने जैत सिंह जी को "रावले" की उपाधि प्रदान की और उन्हें 6200 बीघा भूमि की जागीर मिली थी।

वंशवृत्त:

  • जैत सिंह पिचाणोत जी के पुत्र थे तिलक सिंह पिचाणोत

  • तिलक सिंह जी के पुत्र हुए पुरुषोत्तम सिंह पिचाणोत, जिन्हें गाँव में भोमिया जी के रूप में पूजा जाता है।

  • वर्तमान में जीरणा ठिकाने में गुलाब सिंह पिचाणोत जी का वंश निवास कर रहा है।

जैरिणाग्रामे प्रथमे, धाकडाः शासनं कृतम्।
न दत्तं करमेकं अपि, कष्वाहानां च विस्मयम्॥
सप्तदशवर्षे बालः, मालूपाटात् स आगतः।
मातरं सह कृत्वा सः, धैर्येण जयसंयतः॥
युद्धे धाकडवैरिणः, जयंतं तमुपागतम्।
पिचाणोतकुले ग्रामः, यः पुनः संयतः स्वयम्॥
करः पुनः प्रेषितो, जयपुरे च प्रतिष्ठितः।
राज्ञा मानसिंहेन च, रावलेति समर्पितः॥
षट्सहस्रद्विशतबीघा, भूमिरूपा समर्पिता।
वीरस्य तस्य यशसां, कीर्तिरस्तु सतां सदा॥
जैतसिंहस्य तनयः, तिलकसिंहः प्रकीर्तितः।
सुतस्तस्य च भूयोऽभूत्, पुरुषोत्तमसंज्ञकः॥
भोमियत्वेन पूज्यश्च, ग्रामे तिष्ठति मंगलम्॥


तलवाड़ा का इतिहास

तलवाड़ा जागीर का इतिहास लगभग ढाई सौ वर्ष पूर्व से जुड़ा हुआ है, जब यह क्षेत्र पिचानोत ठाकुरों की जागीर हुआ करता था। उस समय गांव के पास की पहाड़ियों में एक विशाल किला स्थित था, जो ठाकुरों की रियासत का प्रमुख केंद्र था। यह किला आज भी गांव के पास मौजूद है और क्षेत्र के गौरवशाली अतीत की निशानी है। ये पिचानोत राजपूतों की सात घोड़े की जागीर थी। खास आठ चौकी में से भी ये एक चौकी थी।

समय के साथ जब ठाकुर परिवार पहाड़ों से उतरकर नीचे मैदान में आकर बसने लगे, तो लोग उन्हें 'तलेवाले' कहने लगे — अर्थात जो लोग "तल" यानी नीचे के स्थान पर बसे। चूंकि उन्होंने अपने घर तालाब के पास बनाए थे, इस कारण वे 'तलवाड़ा' के नाम से प्रसिद्ध हो गए।

धीरे-धीरे यह शब्द बोलचाल में बदलता गया और लोग इन्हें 'तलवाड़ा' कहने लगे। भाषाई बदलाव के साथ इस स्थान का नाम अंततः 'तलवाड़ा' पड़ गया।

तलवाड़ा की ऐतिहासिक पहचान न केवल इसके किले और ठाकुरों की रियासत से जुड़ी है, बल्कि यह गांव अपनी सांस्कृतिक विरासत, सुंदर चित्रकारी वाले मकानों और सामाजिक विकास के लिए भी जाना जाता है। इस जागीर के अंतिम जागीरदार ठाकुर गणपत सिंह पिचानोत जी थे। 


वर्तमान समय में पिचानोत वंश के 120 से अधिक ठिकाने विद्यमान हैं। इनमें से अनेक जागीरदार और सामंत युद्धों में वीरगति को प्राप्त होकर भौमिया जी बन गए।

🌿 पिचानोत वंश की उत्पत्ति

इस गौरवशाली पिचानोत वंश का मूल आरंभ आमेर महाराज पृथ्वीराज कछवाहा के पुत्र राजा पाचयण सिंह कछवाहा से होता है। पाचयण सिंह का जन्म बीकानेर नरेश राव लूनकरण सिंह की पुत्री अपूर्वा कँवर (बाला बाई) के गर्भ से हुआ था।

इन्हीं पाचयण सिंह के वंशजों को आगे चलकर पिचानोत कछवाहा के नाम से पहचाना गया।


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पिचानोत कछवाहा क्षत्रिय वंश की यह विरासत केवल इतिहास नहीं, बल्कि एक जीवंत उदाहरण है – धर्म की रक्षा, राष्ट्र की रक्षा, और वीरता के सर्वोच्च आदर्शों का। इनका त्याग और बलिदान आज भी समाज को प्रेरणा देता है।

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उद्देश्य:

  1. राजपूत समुदाय के कल्याण और प्रगति के लिए काम करना।
  2. राजपूतों की परम्परा, वीरता, त्याग और अनुशासन की भावना को बढ़ाना।
  3. प्रशिक्षण के लिए शैक्षिक एवं व्यावसायिक संस्थान स्थापित करना।
  4. राजपूत समुदाय के रीति-रिवाजों और परंपराओं में कुछ आवश्यक और स्वस्थ परिवर्तन लाना।
  5. अन्य सभी समुदायों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध को बढ़ावा देना।
  6. बालिकाओं में शिक्षा को बढ़ावा देना, सामाजिक बुराइयों से लड़ना, राष्ट्र के उत्थान के लिए सांप्रदायिक सद्भाव स्थापित करना।